राजेन्द्र कुमार पर आरोप पत्र दाखिल न करके सीबीआई ने साबित किया कि वह गृह मंत्रालय की गुलाम है- रिहाई मंच
धरने के 44 वें दिन क्रमिक उपवास पर अरुण वर्मा बैठे
लखनऊ, 4 जुलाई। मौलाना खालिद मुजाहिद के हत्यारे पुलिस अधिकारियों की गिरफ्तारी, निमेष आयोग की रिपोर्ट पर तत्काल अमल करने और आतंकवाद के नाम पर कैद बेगुनाह मुस्लिम नौजवानों को छोड़ने की माँग के साथ चल रहा रिहाई मंच का अनिश्चितकालीन धरना आज 44 वें दिन भी जारी रहा। आज उपवास पर अरुण वर्मा बैठे।

कचहरी धमाकों के आरोप में फँसाये गये तारिक कासमी के चचा हाफिज फैयाज आजमी ने कहा कि मुख्यमन्त्री अखिलेश यादव ने कहा था कि वो मानसून सत्र में आरडी निमेष कमीशन की रिपोर्ट को एक्शन रिपोर्ट के साथ लायेंगे पर अब तक जिस तरीके से मानसून सत्र ही नहीं बुलाया गया उसकी वजह से मेरे बेगुनाह बेटे की रिहाई सम्भव नहीं हो पा रही है। ऐसे में मैं सरकार से माँग करता हूँ कि जल्द से जल्द मानूसन सत्र बुलाकर आरडी निमेष कमीशन की रिपोर्ट पर सरकार एक्शन ले।

इंडियन नेशनल लीग के राष्ट्रीय अध्यक्ष मोहम्मद सुलेमान और अवामी काउंसिल के महासचिव असद हयात ने कहा कि कुछ दिन पूर्व गृह मंत्रालय भारत सरकार द्वारा यह विवाद खड़ा किया गया कि सरकार को अधिकार है कि वह किसी भी लोक सेवक के विरुद्ध तैयार किये गये आरोप पत्र का अध्ययन करे और यह देखे कि उस कृत्य को जिसे जाँच एजेंसी द्वारा अपराध बताया जा रहा है और जिसके लिये आरोप पत्र तैयार किया गया है, क्या वह कृत्य उस लोक सेवक द्वारा अपने पद पर रहते हुये पद से जुड़ी जिम्मेदारियों और कर्तव्य के अनुपालन में हुआ है। गृह मंत्रालय का यह विवाद व्यर्थ है और आईबी के अधिकारी राजेन्द्र कुमार व अन्य को बचाने का एक कुत्सित प्रयास है। सीबीआई द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि उसके पास इन अधिकारियों के विरुद्ध पर्याप्त साक्ष्य हैं कि इन अधिकारियों द्वारा साजिश में शामिल होकर फर्जी मुठभेड़ करके इशरत सहित अन्य की हत्या की गयी। किसी भी व्यक्ति की हत्या करना और इसकी साजिश रचना किसी भी लोक सेवक की पद से जुड़ी जिम्मेदारी और कर्तव्य नहीं है। उसके विरुद्ध जो साक्ष्य हैं उन पर केवल न्यायालय द्वारा ही विचारण किया जा सकता है। यदि प्रशासनिक अधिकारी और सरकारें ऐसे साक्ष्यों का विचारण करके यह निर्णय देने लगें कि किसी लोक सेवक पर मुकदमा चलाने के लिये पर्याप्त साक्ष्य है अथवा नहीं तो यह लोकतन्त्र के लिये घातक है और न्यायपालिका के क्षेत्र में अतिक्रमण भी है। सीबीआई को गृह मंत्रालय की अनदेखी करते हुये इन अधिकारियों के विरुद्ध आरोप पत्र दाखिल करना चाहिये था। न्यायालय स्वतः ही यह निर्णित कर देता कि पर्याप्त साक्ष्य हैं अथवा नहीं और हत्या तथा फर्जी मुठभेड़ के मामले में गृह मन्त्रालय से मंजूरी मिलना आवश्यक है अथवा नहीं। परन्तु ऐसा न करके सीबीआई द्वारा एक ओर जहाँ अपने कर्तव्य से मुँह मोड़ा गया है वहीं उसने यह भी साबित किया है कि वह गृह मन्त्रालय की गुलाम है और यह लोकतन्त्र के लिये घातक है।

रिहाई मंच के अध्यक्ष मोहम्मद शुएब ने कहा कि जिस तरह इशरत जहां फर्जी मुठभेड़ में दाखिल सीबीआई की चार्जशीट में यह बताया गया है कि इशरत समेत मारे गये लोगों के पास से बरामद हथियार खुद आईबी ने रखे थे उससे यह सवाल उठना लाजमी है कि क्या जो आईबी ऐसे हथियार निर्दोषों को फँसाने के लिये दिखा सकती है वह उन हथियारों का इस्तेमाल करते हुये देश में आतंकी घटनाएं नहीं करा सकती। लिहाजा यह जरूरी हो जाता है कि देश की सुरक्षा के लिये तमाम आतंकी घटनाओं और उनसे जुड़ी गिरफ्तारियों में आईबी की भूमिका की जाँच तो हो ही आईबी को तत्काल प्रभाव से भंग करते हुये उसकी जगह किसी दूसरी एजेन्सी को जिसमें सेक्यूलर मानसिकता के अधिकारी हों, को गठित किया जाये।

रिहाई मंच के अध्यक्ष ने कहा कि इशरत जहां और सादिक जमाल मेहतर फर्जी मुठभेड़ काण्ड से यह साबित हो गया है कि सरकारें अपने सियासी फायदे के लिये आईबी जैसी एजेन्सियों का गलत इस्तेमाल करते हुये निर्दोषों की हत्यायें कराती हैं और इसीलिये सारी पार्टियाँ आईबी को बचाने में लग जाती हैं जैसा कि इशरत जहाँ केस में हो रहा है।

रिहाई मंच के प्रवक्ता शाहनवाज आलम और राजीव यादव ने कहा कि कई स्वतन्त्र जाँच संगठनों और मानवाधिकार संगठनों की तरफ से इण्डियन मुजाहिदीन के अस्तित्व पर लगातार सवाल उठाये जाते रहे हैं कि यह एक कागजी संगठन है जिसे आईबी ने निर्दोष मुसलमनों को फँसाने के लिये बनाया है। इशरत की हत्या समेत लियाकत शाह, तारिक-खालिद प्रकरण और इण्डियन मुजाहिदीन के कुछ रहस्यमयी कमाण्डरों का जिनकी तस्वीरें और हुलिया तो सरकारों के पास रहता है पर जो खुद तो कभी नहीं पकड़े जाते लेकिन उनके जानने वाले पकड़ लिये जाते हैं, से यह दावा और मजबूत हो जाता है कि आईबी ही इंडियन मुजाहिदीन नाम के फर्जी संगठन को संचालित करवा रही है और उसके नाम पर देश भर में विस्फोट करवाकर अपने राजनीतिक आकाओं को सियासी फायदा पहुँचा रही है। इसलिये हम माँग करते हैं कि केन्द्र सरकार आईएम पर श्वेतपत्र लाये।

इस दौरान सोशलिस्ट फ्रंट ऑफ इण्डिया के मोहम्मद आफाक ने दर्जनों कार्यकर्ताओं के साथ गृहमन्त्री सुशील कुमार शिंदे पर इशरत जहाँ फर्जी मुठभेड़ काण्ड में आईबी अधिकारियों को बचाने का आरोप लगाते हुये विधान सभा के सामने शिंदे का पुतला फूंका।

भारतीय एकता पार्टी के सैयद मोईद अहमद, एहसानुल हक मलिक, हाजी फहीम सिद्दीकी, इंडियन नेशनल लीग के मो0 समी ने कहा कि खालिद की हत्या हो या इशरत जहाँ की हत्या इन सभी हत्याओं के पीछे आईबी की मुख्य भूमिका है। ऐसे में रिहाई मंच का विधान सभा लखनऊ के सामने चल रहा यह धरना आईबी के खिलाफ पूरे जन समुदाय में जो रोष है उसको अभिव्यक्त करने का मंच बन गया है। 10 जुलाई को इस अनिश्चितकालीन धरने के पचास दिन पूरे होने के साथ ही यह एक तारीखी धरना होगा जो कि देश की उस एजेन्सी पर सवाल खड़ा करता है जिस पर हुकूमत के डर की वजह से अब तक चुप्पी थी। यहाँ पर जिस तरह से खुलेआम आईबी का पुतला दहन हुआ उसने इस कातिल एजेन्सी का डर आम जनता से दूर कर दिया है। आजमगढ़ से आये रिहाई मंच के प्रभारी मसीहुद्दीन संजरी ने कहा कि दो साल पहले आजमगढ़ समेत यूपी के बेगुनाह लड़के जो आतंकवाद के नाम जिन्हें सरकारों ने अपना शिकार बनाया उन लड़कों के पक्ष में इशरत जहाँ की माँ शमीमा कौसर संजरपुर आजमगढ़ आयी और कई दिनों रहीं और जिस तरीके से उन्होंने कहा कि इंसाफ की हर जँग में वो शामिल रहेंगी, ऐसे में हम उस हौसले के साथ खड़े हैं और जब तक कि इशरत के असली गुनहगार नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को सजा नहीं होती हम इशरत के इंसाफ की लड़ाई चलाते रहेंगे।

रिहाई मंच के धरने का संचालन रिहाई मंच के नेता हरेराम मिश्र ने किया। धरने में पूर्व सांसद इलियास आजमी, सोशलिस्ट फ्रंट के मो0 आफाक, जैद अहमद फारुकी, रिजवान अहमद, पिछड़ा महासभा के एहसानुल हक मलिक, भारतीय एकता पार्टी के सैयद मोइद अहमद, वकारुल हसनैन, डा0 हारिस सिद्किी, डॉ0 अनीस, जुबैर जौनपुरी, शुऐब, मकसूदुल हक, आदिल सिद्दीकी, प्रबुद्ध गौतम, असदुल्ला, फैज, शमीम वारसी, शाहनवाज आलम शामिल रहे।