जुगनू शारदेय

‘ धोबीघाट ‘ के जमाने में कहां किसी को याद रहती है ‘ महल ‘ की । यह भी नहीं याद रहता कि कभी देखा था ‘ एक महल सपनों का ।‘ यह महल दिखाता है तरक्की का । महल भी नहीं झांकी । इसमें दिखलाया जाता है फौज की ताकत । आसमान में उड़ते विमान । धरती पर तोप का मुंह । और भी बहुत कुछ तरक्की वाला । पर नहीं दिखलाया जाता है महंगाई का खिलखिलाता चेहरा । कोई नहीं दिखाता भ्रष्टाचार का नूरानी चेहरा । एक के बाद कोई तरक्की सामने आती रहती है । दूर कहीं कोई गाती रहती है – आएगा आने वाला !

कौन गाती है । तरक्की के लिए कौन गुनगुनाती है । कौन तरसाती है । मामला स्त्री से जुड़ा है । राष्ट्रपति भी अभी स्त्री हैं और अनआफिसियल सी आफिसियल राष्ट्रमाता भी स्त्री हैं । यह सब कितने परेशान रहती हैं । मंत्रिमंडल में प्रधानमंत्री भी स्त्रीनुमा पुरूष दिखते हैं । अगर स्त्री का एक मतलब कमजोर है तो । इस अर्थ में वह भी अपनी कमजोर बोली - भाषा में ही गुनगुनाती है – आएगा आने वाला !

कौन है आने वाला । हमें तो कोई भी आने वाला नहीं दिख रहा है । बोफोर्स देव क्वाट्रची आ सकते हैं क्या । किसकी हिम्मत है कि उन्हें ले आए । नाम तक छिपाने की शर्त रखने वाले विदेशी बैंकों के देशवाले क्या काला धन भेज सकते हैं । काला धन भी नहीं आने वाला । तो कौन है आने वाला । महंगाई न जाने कब की आ चुकी है । प्रधानमंत्री की बात पर भरोसा करें तो वह भी मार्च तक जाने वाली है । शायद ऐसे ही वादों पर चचा गालिब ने कहा था ‘तेरे वादे पर जिए तो जान ये झूठ जाना , के खुशी से मर जाते जो गर एतबार होता । ‘ फिर कौन है आने वाला कि भारत मातानुमा औरत गाते –गुनगुनाती रहती है – आएगा आने वाला !

भ्रष्टाचार जी के पीछे हाथ धो कर पड़े हैं न जाने कितने लोग । वह कहता है कि हम नहीं जाने वाले । लाख तुम भगाओ , हम तो बैठे रहेंगे जैसे बैठी रहती है गरीबी । बड़ी ऊंची चीज है यह गरीबी । इसे भी न जाने कब से हटाया जा रहा है । हटाने के लिए न जाने कितने पापड़ बेले जाते हैं । तरह तरह की परिभाषा और व्याख्या तय की जाती है । यह कहती है कि तुम जब जब आंकड़ों की अमीरी बढ़ाओगी , मैं बिना आंकड़ों के बढ़ती रहूंगी । तुम तो यह भी नहीं तय कर पाते कि मेरी गरीबी रेखा के पार कितने लोग हैं । इस पार प्रिय दरिद्रता है , उस पार प्रिय गरीबता है । गरिबी है कि मिटती नहीं । यह भी तो गाती – गुनागुनाती है – आएगा आने वाला !

कोई कहता है कि आएगा संविधान वाला । कहीं कर्नाटका बन कर , कहीं विश्वविद्यालय का कुलाधिपति बन कर । यह कभी झगड़ेगा उससे जिसने जनता का वोट पाया । तभी तो मुख्य मंत्री बन पाया । पर यह मुख्य मंत्री भी नहीं बता पाता कि कौन आएगा विश्वविद्यालय में कुलपति बन कर । उच्च शिक्षा भी गाती – गुनगुनाती है – आएगा आने वाला !

कौन आएगा इस देश में , जहां सब रहते हों अपने अपने मुलुक में । मुलुक छोड़ झंडा फहराने का नाटक करेंगे अपने देश के प्रदेश में । एक दिन आ जाता है गणतंत्र वाला , नहीं दिखता जहां कोई गण है , गाहे बगाहे दिखलाने के लिए दिख भी गया तो उसके माथे पर तना रक्षा का गन है । फिर भी उसे उम्मीद है , तभी तो गाती – गुनगुनाती है – आएगा आने वाला !