हरी शंकर शाही

उत्तर प्रदेश के बहराइच जनपद के सीमा क्षेत्र में आने वाले कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र के मूर्तिहा वन रेंज कार्यालय को इस वन क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले गांव के लोगो ने 31 जनवरी की प्रातः से घेर लिया। इस पूरे घेराव को प्रशासन स्तर पर कोई खास महत्व नही दिया गया और ना ही हमेशा हल्ला मचाने वाली इलेक्ट्रानिक मीडिया ने इस ओर ध्यान नही दिया। गांव वालो ने मूर्तिहा रेंज को पूरे 5 घंटे घेरे रक्खा तथा इस पूरे रेंज क्षेत्र में आवसीय परिसर में मौजूद अधिकारियो को भी नजरबंद कर दिया। इस पूरे मामले के दौरान मुख्य बात यह थी यह ग्रामीण वन विभाग के अधिकारियो के द्वारा जंगल से फूस और लकडी लाने पर जुर्माना लगाने के कारण नाराज थे। वन विभाग के अधिकारी दलील देते है कि संरक्षित वन क्षेत्र से लकडी और फूस लाने पर पाबंदी होती है जिसके कारण इन पर जुर्माना लगाया जाता है। इस पर वन क्षेत्र के गांव वालो का कहना है कि चूंकी हमारे घर ज्यादातर फूस से बने होते है, साथ ही ईधन की जरूरत भी इन्ही जंगलो से पूरी होती है, इसीलिए यह जुर्माना गलत है और वन क्षेत्र से सिर पर गठ्ठर बनाकर फूस और लकडी लाने पर पाबंदी नही होती है।

इस सारे खींचतान के पीछे मूल उद्देश्य यह है कि वन विभाग लोगो को जंगलो में जाने से रोकना चाहता है। क्योकि इसी कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र से लगाातार बडे शिकारी बिल्लियों जैसे बाघ और तेंदुओ के मनुष्यों को शिकार बनाने के मामलो का लगातार सामने आते रहनां हैं। अधिकारिक रूप से प्राप्त आंकडो के अनुसार पिछले वर्ष 2010 के दौरान बाघ/तेंदुओ के मानवो पर हमले के करीब 21 मामले हुए है, जिनमे 8 लोगो को अपनी जान से हाथ धोना पडा है। इसी प्रकार पिछले 10 वर्षो के आंकडो के अनुसार करीब 110 बार इन बडे शिकारी जानवरो का सामना लोगो से हुआ है जिसमे कई बार लोगो की जानें भी गई है। इस साल की शुरूआत के जनवरी माह में ही तीन लोगो के बाघो के द्वारा मारे जाने के मामले ने प्रदेश में खलबली मचा दी थी। जिसमें 3 जनवरी को कतरर्नियाघाट वन रेंज के बेलहनपुरवा गांव के सालिकराम को बाघ ने अपना शिकार बनाया। इसी प्रकार 8 जनवरी को इसी वन रेंज के कारीकोट गांव के जगमल और मात्र दो दिन के बाद 10 जनवरी को निशानगाढा वन क्षेत्र के बगुलिहा केन्द्रीय बीज फार्म पर सीमावर्ती जनपद खीरी के दुर्गागौढी गांव के दूबर को भी बडी शिकारी बिल्लियों ने अपना शिकार बनाया। इन लगातार घटी घटनाओ ने जहाँ पीडित परिवारो के गांवो में आक्रोश भर दिया हैं। वहीं दूसरी ओर इन लोगों के अनुसार वन विभाग की उदासीनता जख्मो पर नमक छिडकने का कार्य करती है।

इस पूरे कतर्नियाघाट वन क्षेत्र में लगभग 26 राजस्व गांव और 6 वन ग्राम आते है। इन गांवो की ज्यादातर आबादी अपनी हर छोटी बडी जरूरत के लिए जंगलो पर ही र्निभर है। लगातार घटी मानव शिकार की घटनाओ से मची अफरा-तफरी से अपनी नाकामी पर पर्दा डालने के लिए वन विभाग इन गा्राम निवसियो को ही रोकने पर जुटी है। जबकि वन विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार के कारण ही पूर्व में जंगल के आस-पास के गांवो में बसे लोगो को जंगल में जाने से रोकने के लिए बनी सुधारपरक योजनाये दम तोड चुकी है। विश्व बैंक के सहयोग से चलनंे वाली एक योजना जिसमें इन गांवो में ईको विकास समितियो का गठन किया गया था। जिसमें एक समिति बनती थी जिसका प्रमुख गांव का व्यक्ति होता था और सचिव एक वन विभाग का कर्मचाारी। इस समिति का कार्य गांव के परिवारो को गैस सिलेण्डर, प्रेशर कुकर और उनके व्यवसायिक आय के लिए ऋण उपलब्ध कराना होता था। इस योजना के तहत संरक्षित वन क्षेत्र के कतर्निया रेंज के आमा, विशुनपुर, थारूनपुर इत्यादि व निशानगाढा वन रेंज के रमपुरवा, फकीरपुरी, कारीकोट इत्याादि तथा मूर्तिहा वन रेंज के घुमनाबारू सेनारी मारू इत्यादि गांवो में इस योजना की शुरूआत हुई। इस योजना में इतनी धांधली हुई की इस योजना में बांटने के लिए 1250 गैस सिलेण्डर करीब 3000 प्रेशर कुकर जाने कहां केवल कागजो में ही बंटकर रह गये। इसी प्रकार इस योजना में बंटने वाले ऋण को लेकर काफी खेल हुआ, चंूकी सारा लेन-देन कैश के रूप में सीधे वन विभाग से होता था जिसका फायदा उठाते हुए, इन ईको विकास समितियों के सचिव रूप में काम करने वाले वन विभाग के लोगो ने गांव वालो के नाम पर कजर््ा लेकर, स्वंय रख लिया।

कतर्नियाघाट संरक्षित वन्य क्षेत्र के गांवो के बीच समाज सेवा करने वाले तथा सूचना का अधिकार के कार्यकर्ता और ‘‘देहात‘‘ नामक एन0जी0ओ0 के निदेशक डा0 जितेन्द्र चर्तुवेदी कहते हैं कि इन समितियो से बिना लोन प्राप्त किये भी लोगो केा आज भी वसूली के लिए नोटिस आते है। वह आगे बताते है कि यह भ्रष्टाचार केवल यहीं तक नहीं है बल्कि हर ओर है। पूरे जंगल के आस पास के क्षेत्र में खाई खोदने के नाम पर आने वाला सारा पैसा विभाग के भ्रष्ट अधिकारी लोग खा जाते है। फिर जब इस प्रकार की घटना होती है तो अपना पल्ला झाडने के लिए गांव के लोगो जंगलो के अन्दर जाने का दोषी ठहराने लगते है। डा0 चर्तुवेदी कहते है कि सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी के अनुसार टाइगर कंर्जवेशन सोसाइटी की ओर हर वर्ष जंगलो में नमक के डोले टांगने के लिए लाखो रूपये आते है परन्तु नमक की जगह सारा पैसा भ्रष्टाचार में जाता है। उनसे प्राप्त जानकारी के अनुसार वर्ष 2003-04 में 93.82 लाख, वर्ष 2004-05 में 57.87 लाख, वर्ष 2005-06 में 79.87 लाख, वर्ष 2006-07 में 68.72 लाख, वर्ष 2007-08 में 70.62 लाख रूप्ये नमक के लिए प्राप्त हुए।

इस सारे मामले पर कतर्नियाघाट संरक्षित वन क्षेत्र के प्रभागीय वनाधिकारी राम कृष्ण सिंह जो अपनी जंगल की प्रति निष्ठा के प्रति विश्वसनीय है। उन्होने बताया कि यह ईको विकास समितियो का सारा मामला उनके समय के पूर्व का है इसिलिए उन्हे ज्यादा कुछ मालूम नही है। उनका कहना है कि उन्होने इन समितियो के द्वारा दिये गये ऋण के मामले में जांच कराने की कोशिश की है, परन्तु लोग अपनी बात सामने लाते ही नही है, तो कैसे मामले निस्तारित किये जा सकते है। प्रभागीय वनाधिकारी कहते है कि टाइगर कंर्जवेशन सोसाइटी से नमके के लिए मिलने वाले फंड की बात गलत है काफी समय से यह फंड प्राप्त भी नही हुआ है।

इन सारे मामलो को लेकर चाहे जो कहा और सुना जाये परन्तु एक बात तो तय है कि जंगल में भ्रष्टाचार का जा जानवर घूम रहा है उसे भी रोकना जरूरी है। जंगल के पास के गांवो के लोगो को जागरूक करने की जरूरत है ना की उन पर तानाशाही हुक्म चलाकर उनके जीने के अधिकार को ही सीमीत कर देना। आखिर वह बेचारे कहां जायेंगे