आज की कविता- ये ऐलान, ये हिमाक़त मारे जाओगे गुलफाम
आज की कविता- ये ऐलान, ये हिमाक़त मारे जाओगे गुलफाम
आज की कविता – प्रतिनिधि स्वर, सपना चमड़िया की कविताएं - II
गतांक से आगे...
आज जब फ़ासिस्ट ताक़तें पूरे सांस्कृतिक बोध को ही विकृत करने में लगी हैं, तब ये पंक्तियाँ और भी अर्थवान हो जाती हैं। और जब पूंजीवाद सामंतवाद से गठजोड़ करते हुए दमन की प्रक्रिया को और गहन बनाता जा रहा है, यह चीज़ों को उनकी संबद्धता में देख-समझ लेने की दृष्टि देती है। इसी तरह ‘रहमत ख़ान’ कविता में जरूरी सहजता और सार्थक नाटकीयता है। यह नाटकीयता ‘वस्तु’ को लिजलिजी भावुकता से उबार कर उसे विडंबनात्मक बना देती है-
“गले में रुमाल
आँखों में सुरमा
यहाँ तक तो फ़िर भी
ठीक था
पर कमबख्त
क्या जरूरत थी
लिखवाने की
बड़े-बड़े अक्षरों में
रहमत ख़ान का रिक्शा
ये ऐलान, ये हिमाक़त
मारे जाओगे गुलफाम”।
यह कैसा समाज है जहाँ नाम से अपराध तय हो जाता है! इस कविता में नारेबाजी के बजाए चीर देने वाला ठंडापन है।
वैश्विक पूजी-तंत्र हिंसा का ‘महीन सूत्र’ बुन रहा है। हर चीज़ इन सत्ताओं की गिरफ़्त में है। पर ये सूत्र इतने सूक्ष्म और उलझे हैं कि अक्सर हमारे साधारण समझ की जद से छूट जाते हैं। इसने भयंकर विस्थापन को जन्म दिया है। सपना जी का ‘कश्मीर का लड़का’ विस्थापितों की विडम्बना का सशक्त रूपक है। ‘वह अपनी जड़ों से कटे और सफाचट मैदान में पहुँचा दिये गए लोग’ हैं। वह ऐसे लोगों से जुड़ता है जिनके जंगल राजनीतिक कुर्सी के पाए और पूजीपतियों के नेमप्लेट बन गए। इस कविता की अंतिम पंक्तियाँ बहुत ही अर्थगर्भित हैं –
“कि जो अपना हिमालय छोड़ेगा
वह इसी तरह
सफाचट मैदान में मारा जाएगा”।
यहाँ ‘हिमालय’ भूदृश्य से ज़्यादा अपनी माटी व जातीय स्मृतियाँ है। आज की उत्तर आधुनिक परिस्थितियों में ‘विश्लेषित स्मृतियाँ’ ही प्रतिरोध बन सकती हैं।
जारी....
आज की कविता – प्रतिनिधि स्वर, सपना चमड़िया की कविताएं – I


