आज मुस्लिम लीडर तो बहुत हैं मुसलमानों का कोई लीडर नहीं....
आज मुस्लिम लीडर तो बहुत हैं मुसलमानों का कोई लीडर नहीं....
आज मुस्लिम लीडर तो बहुत हैं मुसलमानों का कोई लीडर नहीं....
आज मौलाना अबुल कलाम आजाद का जन्मदिन है
Today is Maulana Abul Kalam Azad's Birthday
मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का भारतीय राजनीति में योगदान
विभाजन के कट्टर विरोधी, मुजाहिद-ए-आज़ादी, हिन्दू-मुस्लिम एकता के सबसे बड़े पैरोकार, जिनके लिए आज़ादी से ज़्यादा ज़रूरी हिन्दू- मुस्लिम एकता थी, भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद का आज जन्म दिन है।
आज जब मुस्लिम क़यादत का फुक़दान (कमी) है.. तो मौलाना आज़ाद की याद बहुत शिद्दत से आई है। उनकी कमी शायद इतनी कभी महसूस नहीं हुई। मौलाना आज़ाद के बाद कोई ऐसा लीडर ही नहीं हुआ, जिनके पीछे हुजूम चलता था। आज मुस्लिम लीडर तो बहुत हैं मुसलमानों का कोई लीडर नहीं.....
ये स्पीच है मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की, जो 1947 में बकरीद के मौके पर दिल्ली की जामा मस्जिद में दी। उन्होंने आज़ादी मिलने पर मुसलमानों को उस वक़्त ख़िताब किया, लेकिन उनकी ये बातें पढ़कर ऐसा लगता है जैसे अभी के लिए कही हैं।
“अज़ीज़ों, तब्दीलियों के साथ चलो। ये न कहो इसके लिए तैयार नहीं थे, बल्कि तैयार हो जाओ। सितारे टूट गए, लेकिन सूरज तो चमक रहा है। उससे किरण मांग लो और उस अंधेरी राहों में बिछा दो। जहां उजाले की सख्त ज़रूरत है। अज़ीज़ों मेरे पास कोई नया नुस्ख़ा नहीं है, वही चौदह सौ बरस पहले का नुस्ख़ा है। वो नुस्ख़ा जिसको क़ायनात का सबसे बड़ा मोहसिन (मोहम्मद साहब) लाए थे। और वो नुस्ख़ा है क़ुरान का ये ऐलान, ‘बददिल न होना, और न गम करना, अगर तुम मोमिन हो, तो तुम ही ग़ालिब होगे....अपने दिलों को मज़बूत बनाओ और अपने दिमागों को सोचने की आदत डालो. और फिर देखो ये तुम्हारे फैसले कितने फायदेमंद हैं।
आखिर कहां जा रहे हो? और क्यों जा रहे हो? ये देखो मस्जिद की मीनारें तुमसे उचक कर सवाल कर रही हैं कि तुमने अपनी तारीख के सफ़हात को कहां गुम कर दिया है? अभी कल की बात है कि यही जमुना के किनारे तुम्हारे काफ़िलों ने वज़ू किया था और आज तुम हो कि तुम्हें यहां रहते हुए खौफ़ महसूस होता है। हालांकि देल्ही तुम्हारे खून की सींची हुई है।
अज़ीज़ों! अपने अंदर एक बुनियादी तब्दीली पैदा करो। जिस तरह आज से कुछ अरसे पहले तुम्हारे जोश-ओ-ख़रोश बेजा थे। उसी तरह से आज ये तुम्हारा खौफ़ बेजा है। मुसलमान और बुज़दिली या मुसलमान और इश्तआल एक जगह जमा नहीं हो सकते। सच्चे मुसलमान को कोई ताक़त हिला नहीं सकती है। और न कोई खौफ़ डरा सकता...मैं तुम्हें ये नहीं कहता कि तुम हाकिमाना इक्तेदार के मदरसे से वफ़ादारी का सर्टिफिकेट हासिल करो।
मैं कहता हूं कि जो उजले नक्श-ओ-निगार तुम्हें इस हिंदुस्तान में माज़ी की यादगार के तौर पर नज़र आ रहे हैं, वो तुम्हारा ही काफ़िला लाया था। उन्हें भुलाओ नहीं। उन्हें छोड़ो नहीं। उनके वारिस बनकर रहो। और समझ लो तुम भागने के लिए तैयार नहीं तो फिर कोई ताक़त तुम्हें नहीं भगा सकती। आओ अहद (क़सम) करो कि ये मुल्क हमारा है। हम इसी के लिए हैं और उसकी तक़दीर के बुनियादी फैसले हमारी आवाज़ के बगैर अधूरे ही रहेंगे।
आज ज़लज़लों से डरते हो? कभी तुम ख़ुद एक ज़लज़ला थे। आज अंधेरे से कांपते हो। क्या याद नहीं रहा कि तुम्हारा वजूद ख़ुद एक उजाला था। ये बादलों के पानी की सील क्या है कि तुमने भीग जाने के डर से अपने पायंचे चढ़ा लिए हैं। वो तुम्हारे ही इस्लाफ़ थे जो समुंदरों में उतर गए। पहाड़ियों की छातियों को रौंद डाला। आंधियां आईं तो उनसे कह दिया कि तुम्हारा रास्ता ये नहीं है। ये ईमान से भटकने की ही बात है, जो शहंशाहों के गिरेबानों से खेलने वाले आज खुद अपने ही गिरेबान के तार बेच रहे हैं। और ख़ुदा से उस दर्जे तक गाफ़िल हो गये हैं कि जैसे उसपर कभी ईमान ही नहीं था।“
(बुशरा खानम फहाद, चर्चित टीवी पत्रकार हैं। इस समय वे ज़ी सलाम उर्दू समाचार चैनल में सीनियर एंकर हैं।)
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