तनवीर जाफरी

देश की आर्थिक राजधानी कही जाने वाली महानगरी मुंबई को मानवता के दुश्मन आतंकवादियों ने गत 13जुलाई की शाम को एक बार फिर अपनी कायरता पूर्ण कार्रवाई का निशाना बनाया। इस बार आतंकवादियों ने अपनी नापाक कार्रवाई मुंबई के दादर,झावेरी बाज़ार तथा ओपेरा हाऊस जैसे भीड़भाड़़ वाले इला$के में की। इन श्रृंखलाबद्ध बम धमाकों में 20 बेगुनाह लोगों को अपनी जानें गंवानी पड़ीं जबकि 23 व्यक्ति गम्भीर रूप से घायल हुए हैं। कुल घायलों की सं या 123 बताई जा रही है। 26/11 को मुंबई पर हुए आतंकवादी हमले के बाद गत 13 जुलाई को मुंबई पर हुआ यह पहला बड़ा आतंकी हमला था। हमले की गम्भीरता को देखते हुए केन्द्रीय गृहमंत्री पी.चिदंबरम 13 जुलाई को ही रात मुंबई पहुंच गये तथा अगले दिन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व यूपीए अध्यक्षा सोनिया गांधी ने भी मुंबई पहुंचकर आतंकी हमलों से प्रभावित पीडि़तों से उनके स्वास्थय की जानकारी ली। बहरहाल मानवता के इन दुश्मनों की इस राक्षसीय कृ त की जितनी भी निंदा की जाए वह कम है। संयुक्त राष्ट्र संघ से लेकर,अमेरिका,ब्रिटेन व रूस सहित कई देशों ने मुंबई धमाकों की निंदा की है तथा भारत के प्रति सहानुभूति जताई है। इन हमलों के संर्दभ में केन्द्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने एक महत्वपूर्ण बयान देते हुए यह कहा है कि इन हमलों को सुरक्षा एजेंसियों की नाकामी नहीं माना जाना चाहिये। गृहमंत्रीके इसी बयान के साथ ही साथ कांगे्रस महासचिव राहुल गांधी ने भी अपने भुवनेश्वर दौरे के दौरान अपनी 'स्पष्टवादिताÓ का एक बार फिर से परिचय देते हुए यह कह दिया कि 'हर आतंकवादी हमले को रोक पाना बहुत मुश्किल है। हमें आतंकवाद से स्थानीय स्तर पर लडऩा होगा। हमने इसमें बहुत सुधार किया है, लेकिन इसे हर बार रोक पाना असंभव हैÓ।

ज़ाहिर है वक्तव्यों की संवेदनशीलता तथा वक्तव्य दिये जाने के नाज़ुक समय को गऩीमत जानकर कई विपक्षी दलों ने राहुल गांधी को निशाने पर ले लिया। कई नेताओं ने राहुल गांधी के बयान को अपनी राजनीति का हथियार बनाने की कोशिश की। परन्तु राहुल के बयान से यह बहस तो ज़रूर छिड़ गई है कि क्या वास्तव में आतंकवादी घटनाओं को शत-प्रतिशत रोक पाने के लिये सुरक्षा बलों या गुप्तचर एजेंसियों की कार्रवाईयां या इनकी मात्र चौकसी पर्याप्त है? और यदि ऐसा है तो राहुल गांधी के ही दिये गये उदाहरण के अनुसार इराक व अफग़ानिस्तान में आतंकी घटनाएं क्यों नहीं रोकी जा पा रही हैं? जिन राजनैतिक दलों के नेता आज राहुल गांधी के वक्तव्य को गलत ठहरा रहे हैं उन्हें यह बताना चाहिए कि आखिर संसद से अधिक सुरक्षित देश का दूसरा कौन सा स्थान हो सकता है?और आत्मघाती हमलावरों ने देश की उस संसद की सर्वोच्च सुरक्षा ,कैमरों व सभी सुरक्षा बाधाओं को भी भेद कर संसद पर हमला कर दिया। फिर देश के साधारण लोगों की सुरक्षा कर पाना तथा पूरे देश के चप्पे-चप्पे पर नज़र रख पाने की सुरक्षा व गुप्तचर एजेंसियों से उ मीद करना आखिर कितना मुनासिब है?

इसमें भी कोई शक नहीं कि हमारे देश में आतंकी हादसों को नियंतित्र रखने में भी देश की गुप्तचर एजेंसियों व सुरक्षा एजेंसियों का महत्वपूर्ण योगदान है। देश के सुरक्षाबल आए दिन किसी न किसी ऐसे शातिर आतंकी को पकड़ते रहते हैं जो किसी न किसी आतंकी योजना का हिस्सा होता है। पंरतु निश्चित रूप से दुर्गम, भौगालिक व विषम राजनैतिक परिस्थितियोंवश इस समय तमाम ऐसे हालात का समाना देश को करना पड़ रहा है जिनके परिणामस्वरूप आतंकी घटनाओं को शत-प्रतिशत रोक पाना असंभव ही कहा जा सकता है। उदाहरण के तौर पर हमारे प्रमुख पड़ोसी देश चीन द्वारा भारत से लगने वाली लगभग 3488 किलोमीटर लंबी सीमाओं में से कई सीमाओं पर उसके द्वारा बार-बार की जाने वाली घुसपैठ प्राय: हमारे देश की चिंताओं का कारण बनती रहती है। उधर हमारे दूसरे पड़ोसी देश नेपाल की लगभग 1751 किलोमीटर की सीमाएं पूरी तरह खुली हुई हैं। किसी भी देश का कोई भी व्यक्ति काठमांडू आकर बेरोक-टोक सड़क के रास्ते भारत में प्रवेश कर सकता है। कंधार विमान अपहरण हादसे में काठमांडू हवाई अड्डे का भरपूर उपयोग आतंकवादियों द्वारा आखिरकार किया ही गया। उधर 4096 किलोमीटर लंबी भारत बंगलादेश सीमा,बावजूद इसके कि सीमासुरक्षा बलों की निगरानी के हवाले है परंतु फिर भी वहां के कई दुर्गम क्षेत्र ऐसे हैं जहां 24 घंटे चौकसी रख पाना क़तई संभव नहीं हो पाता। और कई दूर-दराज़ के सीमांत गांवों में तो सीमाएं पूरी तरह खुली होने तक की खबरें भी आती रहती हैं। इधर हमारे 'परम पड़ोसी पाकिस्तान की तकरीबन 3323 किलोमीटर की विशाल सीमा का तो हाल ही क्या कहना। कारगिल घुसपैठ से लेकर कश्मीर में फैले आतंकवाद को समर्थन देने तक का सारा जि़ मा ही हमारे पड़ोसी पाकिस्तान का ही है जो वह आमतौर पर इन्हीं सीमाओं के माध्यम से निभाता है। यहां इस बात का उल्लेख करना एक बार फिर प्रासंगिक है कि इस्लाम के नाम पर भारत से अलग हुए इस पाकिस्तान के शासक,यदि इस्लाम धर्म में बताए गए पड़ोसी के प्रति अपने कर्तव्यों तथा अधिकारों की व्या या को देख व समझ लेते तो भी, शायद उनकी आंखें खुल जातीं। परंतु यह तो ठहरे आंखें खोल कर सोने वाले रहबर-ए-पाकिस्तान, इन्हें आखिऱ कौन जगा सकता है।

बहरहाल, यह तो है हमारी विशाल सीमाओं का खस्ता हाल व इनसे पैदा होने वाली नकारात्मक व असुरक्षित परिस्थितियां। इन्हीं का लाभ आतंकियों ने 26/11 के हमले में भी उठाया था जबकि यह समुद्री रास्ते से चलकर कराची से मुंबई पहुंच गए थे। गोया यदि हमें विदेशी आतंकी घुसपैठ रोकनी है तो सर्वप्रथम हमें अपने देश की सीमाओं को पूर्णतया 'फूल प्रूफ बनाना होगा। अब यह लिखना,कहना तथा सोचना तो सरल है परंतु क्या इस विशाल चौतरफा सुरक्षा व्यवस्था को अमली जामा पहना पाना संभव है? यदि असंभव नहीं है तो शायद संभव भी नहीं है। जहां विश्व में चीन का बढ़ता आर्थिक व सामरिक दबदबा तथा भारत की शांतिपूर्ण विदेश नीति भारत को चीन के प्रति आक्रामक रुख तैयार करने की इजाज़त नहीं देती वहीं भारत व नेपाल के मध्य के राजनैतिक संबंध भारत-नेपाल सीमा की सीमाबंदी की इजाज़त नहीं देते। इसी प्रकार भारत व पाकिस्तान तथा बंगलादेश के प्राकृतिक व मौसम संबंधी हालात हमारी सीमाओं की हर समय सुरक्षा करने की इजाज़त नहीं देते। गोया फिलहाल की सूरत तो यही है कि भारत की सीमाओं की इन्हीं कमज़ोरियों का लाभ उठाकर यह आतंकी किसी न किसी रास्ते से हमारे देश में प्रवेश कर ही जाते हैं।

उधर भारत की भीतरी स्थिति भी आतंकवादियों को उनके नापाक इरादों में सफल बनाती है। 121 करोड़ की घनी आबादी का विशाल जनसं या तथा विशाल क्षेत्रफल वाला हमारा देश। घनी आबादी के महानगर व कस्बे, एयरपोर्ट व रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड,ट्रेन, बाज़ार, सिनेमा हाल, दफ्तर , अस्पताल,स्कूल-कॉलेज आदि जहां भी ।जाईए भीड़ ही भीड़। यानी चारों ओर 24 घंटे सिर्फ इंसानों का हुजूम ही हुजूम दिखाई देता है। इनमें तमाम ऐसे प्रमुख स्थानों पर जिन्हें सरकार संवेदनशील या अतिसंवेदशील समझती है वहां सुरक्षा चौकसी के माकूल इंतज़ाम भी किए जाते हैं। इनकी सुरक्षा चौकसी के परिणामस्वरूप तमाम शातिर आतंकी व अपराधी सुरक्षा एजेंसियों की गिरफ्त में भी आते हैं। और इस प्रकार कई बड़े हादसे होने से भी टल जाते हैं। परंतु इन्हीं सुरक्षा एजेंसियों से देश के चप्पे-चप्पे की 24 घंटे की सुरक्षा की उम्मीद करना तो इनसे कुछ ज़्यादा ही उम्मीद लगाने जैसा है।

हां राहुल गांधी के इस वक्तव्य में भी काफी दम है कि 'आतंकवाद से स्थानीय स्तर पर लडऩा होगा अर्थात् सुरक्षा एजेंसियों पर निर्भर रहने के बजाए हमें स्वयं जागरुक होना होगा तथा सुरक्षित रहने के सभी उपाय स्वयं करने होंगे। उदाहरण के तौर पर लुटेरों द्वारा ट्रेन यात्रियों को कोई ज़हरीली वस्तु किसी खाने-पीने के सामान में मिलाकर खिलाने तथा फिर बेहोश होने पर उसे लूट लेने की घटनाएं इस समय लगभग पूरे देश के अधिकांश रेल यात्रियों को पता चल चुकी हैं। परिणमस्वरूप अब प्राय: रेल यात्री अपनी यात्रा के दौरान किसी अपरिचित व्यक्ति द्वारा दी गई किसी भी वस्तु को खाने से परहेज़ करते हैं। यात्रियों की इस जागरूकता के लिए रेल विभाग ने का$फी लंबे समय से एक विज्ञापन युद्ध छेड़ रखा है। रेलवे स्टेशन पर भी इस आशय का उद्घोष समय-समय पर होता रहता है। इसी उद्घोष व विज्ञापन के साथ ही रेल मंत्रालय जनता को यह भी सचेत करता रहता है कि-'किसी लावारिस वस्तु को मत छुएं और संदिग्ध वस्तु के विषय में पुलिस को सूचित करें आदि। परंतु अफसोस की बात तो यह है कि अपनी व्यक्ति तगत् चौकसी तथा अपने सामान की सुरक्षा के लिए तो समाज के विशेषकर रेल पर यात्रा करने वाले कुछ 'जागरूक लोग तो चौकस हो गए परंतु अपने राष्ट्र की संपत्ति को बचाने, अन्य देशवासियों की रक्षा करने तथा देश में कहीं भी आतंकवादी घटना घटित न होने देने के संकल्प जैसे जज़्बे हमारे दिल में शायद अभी तक पैदा नहीं हो सके।

जिस दिन हमने अपनी आंखें खोल ली , हम चौकस व जागरूक हो गए, प्रत्येक राष्ट्रभक्त व्यक्ति जिस दिन किसी भी अंजान व्यक्ति की संदिग्ध गतिविधियों पर नज़र रखने लगा या संदिग्ध स्थिति में दिखाई देने वाली लावारिस वस्तुओं पर नज़र रखने लगा उस दिन निश्चित रूप से आतंकी हमलों में काफी कमी आ जाएगी और पूरे भारतीय समाज में जहां इस प्रकार की जागरुकता मुहिम सरकार को मीडिया व अन्य विज्ञापन माध्यमों के द्वारा लगातार छेडऩी चाहिए वहीं सामाजिक,शैक्षणिक, पारिवारिक व धार्मिक स्तर पर भी इस प्रकार के आतंकवाद संबंधी जागरुकता अभियान का छिडऩा बहुत ज़रूरी है। हर जगह इस प्रकार की मनादी होनी चाहिए कि 'जागते रहो, हमारे देश की सीमाओं में सेंधकर देश के दुश्मन हमारी एकता व सौहाद्र्र को भंग करना चाहते हैं। अत: इनके सभी नापाक मंसूबों को नाकाम किए जाने की ज़रूरत है। साथ ही साथ ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण कार्रवाईयों के समय कुछ अवसरवादी नेताओं द्वारा दिए जाने वाले वक्तव्यों को भी बहुत $गौर से समझना चाहिए कि आखिर वे कब और कौन सा बयान अपने किस राजनैतिक स्वार्थपूर्ति के मद्देनज़र दे रहे हैं।