ग्लैडसन डुंगडुंग
24 जून, 2013, देश के आदिवासियों के लये और एक काला दिन बना। बिहार के पश्चिम चम्पारण जिलान्तर्गत नौरंगिया थाना क्षेत्र के अमवा-कटहरवा गाँवके पास पुलिस ने तीन बच्चों सहित आठ आदिवासियों की गोली मारकर हत्या कर

दी। पुलिस कहती है कि सात सौ आदिवासी लोग उग्र हो गये थे और पत्थरों से उन पर हमला कर दिया, जिससे बचने के लये उन्होंने आत्मरक्षा में गोली चलायी।

राज्य प्रायोजित इस ‘बगहा गोलीकाण्ड’ में छह लोगों की मौत घटनास्थल पर एवम् दो लोगों की मौत अस्पताल में इलाज के दौरान हुयी। 25 लोग घायल हैं, जिसमें 12 की हालत गम्भीर तथा दो की हालत अति नाजुक है जो शायद जिन्दा रहने पर भी आम इंसान की तरह नहीं जी पायेंगे। अब इस मुद्दे पर बड़े पैमाने पर राजनीति हो रही है लेकिन सवाल यह है कि क्या दोषियों को सजा मिलेगी?

इसमें ममला इतना सा था ही कि थरथरी गाँव निवासी चन्देश्वर काजी नामक व्यक्ति का अपहरण हुआ था, जिसे अपहरणकर्त्ताओं से मुक्त करने के लिये गाँव वाले पुलिस से माँग कर रहे थे। और जब उन्होंने पुलिस पर दबाव बनाया तो पुलिस आदिवासी महिलाओं के साथ ही बदसलूकी पर उतर आयी, जिससे लोग और ज्यादा आक्रोशित हो गये और पुलिस पर पत्थर चलाना शुरू कर दिया और बदले में पुलिस ने उनके ऊपर गोली बरसायी। इस तरह से विपक्षी पार्टी खासकर जदयू द्वारा सरकार से वनवास भेज दिये गये भाजपा को मुफ्त में एक मुद्दा मिला और उसने सरकार पर हमला तेज कर दिया, जिससे बचने के लये मुख्यमन्त्री नीतीश कुमार ने ‘पुलिस जाँच’ और बाद में न्यायिक जाँच के आदेश दिये। लेकिन क्या सही में बिहार सरकार आदिवासियों को न्याय देना चाहती है? क्या इनकी नीयत दोषियों को सजा देना या विपक्ष का मुँह बन्द करना भर है?

इसमें चौंकाने वाली बात यह है कि अभी जाँच भी पूरी नहीं हुयी है और जाँच टीम के सदस्य आदिवासियों को दोषी और हत्यारी पुलिस को पाक-साफ बता रहे हैं। जाँच टीमें के सदस्य ए.डी.जी., एस.के. भारद्वाज ने कहा कि स्थिति ऐसी थी कि पुलिस के पास गोली चलाने के अलावा कुछ नहीं बचा था। वहीं राज्य के पुलिस महानिदेशक अभयानन्द कहते हैं कि पुलिस अपनी जान बचाने के लये भाग रही थी। यहाँ सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब पुलिस जान बचाने के लये भाग रही थी तो कैसे आठ आदिवासी मारे गये और कई गम्भीर रूप से घायल हैं। लेकिन एक भी पुलिस कर्मी मरना तो दूर गम्भीर रूप से घायल भी नहीं है? क्या ये दो बड़े पुलिस अधिकारी हत्यारी पुलिस को बचाने की कोशिश में नहीं जुटे हैं? आदिवासी लोग इनसे न्याय की उम्मीद कैसे कर सकते हैं? इनकी जाँच रिपोर्ट से क्या उम्मीद लगायी जा सकती है? क्या वरीय पुलिस अधिकारी संविधान के प्रति जवाबदेह नहीं हैं?

आदिवासियों की निर्मम हत्या सिर्फ बिहार की बात नहीं है अपितु पूरे देश में आदिवासियों के साथ यही हो रहा है। पुलिस और अर्द्धसैनिक बल आदिवासियों की लगातार हत्या कर रहे हैं और सरकारें उनकी लाश खरीद रही हैं। छत्तीसगढ़ में आदिवासियों को माओवादी बोल कर, ओडि़सा में विकास विरोधी बताकर, तो झारखंड में नक्सली का जामा पहनाकर और बिहार में पुलिस बल पर हमला करने का आरोप लगाकर पुलिस उनकी लाश बिछा रही हैं। और जब पुलिस खुद को निर्दोष साबित नहीं कर पाती है और आदिवासी लोग निर्दोष निकल जाते हैं तो सरकार मुआवजा और नौकरी देकर मामला को रफा-दफा कर देती है और हत्यारे बच निकलते हैं। छत्तीसगढ़ के बीजापुर नरसंहार, उडि़सा का कलिंगनगर हत्या कंड, झारखंड का बढ़नियां फर्जी मुठभेड़ या बिहार का बगहा हत्याकांड को मिला दें तो इन हत्याकाण्डों में पुलिस और अर्द्धसैनिक बलों ने 57 निर्दोष आदिवासियों की हत्या की। लेकिन क्या कोई मुझे बता सकता है कि इतने निर्दोष लोगों की हत्या के एवज में किस-किस पुलिस अधिकारियों को सजा मिली है जबकि हमारे देश का संविधान सभी लोगों को कानून के सामने बराबरी के अधिकार की गारंटी देता है? क्यों आदिवासियों के मुद्दों में इतनी सम्वेदनहीनता है?

यहाँ गौर करने वाली बात यह भी है कि जब भी पुलिस कोई हत्या काण्ड को अंजाम देती है तब आम जनता के क्रोध को ठण्डा करने के लये सरकारें सस्पेंड-सस्पेंड, ट्रांस्फर-ट्रांस्फर और जाँच-जाँच का खेल खेलती हैं। क्या निर्दोष आदिवासियों की हत्या का सजा सिर्फ सस्पेंड और ट्रांस्फर है? क्या हमें यह पता नहीं है कि पुलिस वाले सुबह को सस्पेंड होते हैं और शाम को डयूटी पर लौट आते हैं? आदिवासियों को इस सवाल का जवाब चाहिये कि जब संविधान के अनुच्छेद 46 में कहा गया है कि स्टेट आदिवासियों को सामाजिक अन्याय और सभी तरह के अत्याचारों से सुरक्षा प्रदान करेगा तो उनके हत्यारों को सजा क्यों नहीं मिलती? यहाँ सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब स्टेट ही आदिवासियों की हत्या करने में जुटा हुआ है तो आदिवासियों को न्याय कौन देगा? फिर आदिवासियों का संवैधानिक अधिकार, कानूनी सुरक्षा और विशेष अधिकार कहाँ गये? आदिवासी लोग किस पर विश्वास करे?

- ग्लैडसन डुंगडुंग मानवाधिकार कार्यकर्ता और झारखंड ह्यूमन राईट्स मूवमेंट के महासचिव हैं।