आधार आधारित केंद्रीकृत ऑनलाइन डेटाबेस : कांग्रेस-भाजपा के बीच गठबंधन से देश के संघीय ढांचे को खतरा
आधार आधारित केंद्रीकृत ऑनलाइन डेटाबेस : कांग्रेस-भाजपा के बीच गठबंधन से देश के संघीय ढांचे को खतरा
गोपाल कृष्ण
कल 26 अप्रैल को सुप्रीम कोर्ट की न्यायामूर्ति अरुण कुमार सिकल के अध्यक्षता वाली दो जजों की पीठ ने बायोमीट्रिक अनुवर्ती पहचान/आधार संख्या से मोलिक अधिकारी के उलंगन के मामले की सुनवाई कर फैसला देंगे।
यह संगत मुहदमा मेजर जनरल (भूतपूर्व) सुधीर वोमबात्केरे, सफाई कर्मचारी आनंदलाल के नेता बेज्वाड़ा विल्सन और केरल के पूर्व मंत्री बिनॉय विस्वम द्वारा अलग-अलग दायर किए गए हैं।
21 अप्रैल को न्यायामूर्ति सिकीरी ने अटॉर्नी जनरल से पूछा था कि आप अदालत के आदेश के बावजुद अनूठा पहचान/आधार संख्या को अनिवार्य क्यों कर रहे हैं। अटॉर्नी जनरल ने जवाब दिया कि क्योंकि आधार कानून, 2016 लागू हो गया है अदालत के आदेश का अब कोई महत्व नहीं रह गया है।
मौजूदा कानून के संदर्भ में 10 अप्रैल को कानून मंत्री ने संदस को और 21 अप्रैल को अटॉर्नी जनरल ने सुप्रीम कोर्ट को गुुमराह करते हुए यह कहा कि आधार कानून, 2016 के 12 सितम्बर, 2016 से लागू होने के कारण संदिधा पी का आधार अब कानूनी नहीं रहा। दोनों ने बड़ी ही बे शर्मी से सुप्रीम कोर्ट के सितम्बर 14, 2016 के फैसले के बारे में अनभिज्ञ रहने का स्वांग रचा। ये बात संदिधा में भी सरकार को बताई गई है और जल्द ही कोर्ट भी भी यह निर्णय सुनाएगा कि सुप्रीम कोर्ट के संदिधान पी का आखिरी फैसला ही देश का कानून है और वह सर्वोपरी है क्योंकि वह आधार कानून के लागू होने के बाद आया है।
तथ्य यह है कि सितम्बर 14, 2016 के न्यायामूर्ति गोपालाल गोधा और आदर्श कुमार गोयल की खंडपीठ ने 5 जजों के संदिधान पी के 15 अक्टूबर 2015 के आदेश को सावधानी से यह कहते हुए दोहराया कि यूनीक आधार संख्या किसी भी कार्य के लिए जरूरी नहीं बनाया जा सकता है। इस मामले की सुनवाई को सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश टी.एस. ठाकुर, न्यायाधीश ए.ए. कादरी, न्यायाधीश रंजन गोगोई, न्यायाधीश कुरियन जोसेफ और न्यायाधीश दीपक गुप्ता के समक्ष 14 सितम्बर 2016 को पूरी की गई थी।


