कृष्ण दलित और वंचितों का नायक नहीं हो सकते हैं।
'राम चरित्र मानस' को छोड़कर 'गीता' की ओर क्यों मुड़ी सरकार ? संघ-सरकार और संस्कार के जानकार इस बात की भलीभांति जानकारी रखते हैं कि संघ यूं ही नहीं तुक्का फेंकता है ? उसके पीछे एक गहरी योजना होती है। यह दो मुंह वाला सांप की तरह है जो किसी तरफ से आक्रमण कर सकता है।
संघ वैचारिक-स्खलन के दौर से गुजर रहा है। कथित मर्यादित प्रचारकों की भर्ती अब बंद हो गयी है। पहले प्रभु 'राम की कसम ' से ही दिन की शुरुआत होती ? संघ-प्रचारक वनवासी की तरह ही दिखते थे। इस 'दिखने'शब्द पर अभी यहाँ बहस नहीं करूँगा।
'संघम् शरणम् गच्छामि' जैसे मन्त्र को समाप्त करने में संघ को 75 वर्ष लग गए। आज संघ की शरण में सरकार और कथित समाज है। बुद्धम् शरणम् गच्छामि के मन्त्र ख़ारिज हो गए हैं। संघ की शरण तो ठीक है पर अगर 'बुद्ध'की शरण में गए तो आपकी खैर नहीं ?
संघ शतायु होने वाला है। संघ 2025 में सौ साल का हो जायेगा। सात-आठ साल तक संघ अपनी स्थापना के सौ साल मनाने की तैयारी में होगा। इन वर्षों में समय के साथ संघ भी बदलेगा। इनके संस्कार और सिद्धांत बदलेंगें।
राम के कारण संघ बेमतलब का शुचितावाद में उलझ रहा था। राम के पास होने के कारण 'साध्य और साधन' के डिबेट में संघ यूँ ही फंसता ?
इस कारण राम से संघ को मुक्ति अभी नहीं चाहिए। केवल राम-मुक्त संघ का होना इस समय की एक जरूरी जरूरत है।
कृष्ण एक स्पेस देता है। अच्छे लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए कृष्ण छलिया होना भी सिखाता है। झूठ को सैद्धांतिक-आधार देने में कृष्ण की कोई तुलना नहीं है।
हिन्दू-राष्ट्र से भी बात आगे की है कि संघराष्ट्र की स्थापना किस तरह हो ? नरेन्द्र मोदी किस तरह 2025 तक कम से कम पीएम पद पर टिके रहें। इसी बीच संघ को अपना एजेंडा लागू करवा लेना है।
वैसे कृष्ण चुम्बन-आन्दोलन के करीब के भगवान हैं।
यहाँ प्रेम है, पुकार और प्रतीक्षा है। राम बचपन से ही धनुष टांगे रहे। धनुष वाधक है इश्क का। राम की मर्यादा मोहब्बत को डराती, धमकाती रही। काश ! राम एक बार कृष्ण की तरह किसी राधा संग रास रचाए होते तो संघ द्वारा यह दुर्गति और उपेक्षा नहीं होती !
नयी पीढ़ी के लिए 'गीता' आदर्श है। मैं सुषमा स्वराज वाली उस गीता की नहीं, गीता रोषमरे की बात कर रहा हूँ, जिन्होंने भारत में चुम्बन-आन्दोलन की अगुआई की है। इस रोषमरे ने ही भागवत-धाम झंडेवालान में आजाद औरत के कारनामे दिखाए थे। मोहन भागवत को 'गीता' ज्ञान हो गया है। दुनिया का युवा देश जहाँ इश्क और सेक्स न हो तो फिर काहे का युवा भारत ?
सौ स्मार्ट शहर को सेक्स की भी जरूरत होगी। इस जरूरत की भरपाई किस तरह होगी यह संघ के लिए चिंता का विषय है। स्वयंसेवक 'लालन कालेज' से 'लाल किला' तक आ गए। कृष्ण की गीता और गीता रोषमरे के अन्तर्सम्बन्ध को समझना जरूरी है ?
गीता को राष्ट्रीय-ग्रन्थ बनायें या फिर उनकी रासलीला को 'राष्ट्रीय-लीला' घोषित कर दें पर बहुजन नादान नहीं है। वह इस खेल को देख समझ रहा है।
वर्णाश्रम धर्म के पैरोकार कृष्ण भारत के प्रवक्ता नहीं हो सकते हैं। मुरली मनोहर हों या मोहन सभी वर्णाश्रम धर्म के सवर्धन और संरक्षण में लगे हैं। कृष्ण दलित और वंचितों का नायक नहीं हो सकते हैं।
अब तक वंचित समाज के साथ जो हुआ वह अच्छा नहीं हुआ और जो हो रहा है वह भी अच्छा नहीं हो रहा है और जो होगा वह भी अच्छा नहीं होगा। शूद्र क्या लाया था जो खो गया। जो लिया यही से लिया । जो दिया यही दिया। क्या खो गया जो शूद्र मनुवाद के खिलाफ हो रहे है ?
गीता कभी भी क्रांति पैदा होने नहीं देगी। गीता पढ़कर शुद्र स्थितप्रज्ञ ही होंगें ? साक्षी - भाव में डूबे रहने को अभिशप्त होंगें? समता नहीं, समभाव और और समरसता ही इनके जीवन का आधार होगा ?
गीता रोषमरे भी इन्हीं 'गीतावादियों' का दूसरा छोर है। एक चुम्बन हम सरकार से उधार ले लें बदले में अपना संसार दे दें। इन 'गीताओं' का ज्ञान जरूरी है तभी हम भागवत की 'गीता' को समझ पायेंगें। राधे राधे !
O- बाबा विजयेंद्र
बाबा विजयेंद्र, लेखक स्वराज्य खबर के संपादक हैं।
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