हमारे नए नायकों की विडंबना यह है कि वे सत्याग्रह और स्टिंग एक साथ चलाना चाहते हैं। वे भूल जाते हैं कि सत्याग्रह में जानी दुश्मन के खिलाफ भी न तो साजिश की जाती है न ही उस पर अविश्वास किया जाता है और स्टिंग तो कतई नहीं।
भारत बनाम भ्रष्टाचार के सत्याग्रह और संघर्ष से निकली आम आदमी पार्टी आजकल होली के हास्य सम्मेलन की पार्टी बन गई है। पार्टी के वरिष्ठ नेता, राजनीतिशास्त्री और आजकल बागी बन चुके योगेंद्र यादव का कहना ठीक ही है कि हमने होली के मौके पर पिछले दिनों खूब फाग खेली, कुछ रंग और अबीर चले और कुछ कीचड़ भी चले और अब हमें नहा धोकर काम पर लग जाना चाहिए। लेकिन आप की फाग पार्टी रुकने का नाम ही नहीं ले रही है। लगता है किसी ने ज्यादा भांग चढ़ा ली और किसी ने ज्यादा बोतल। इसलिए(सत्ता और प्रसिद्धि का) नशा उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है।
दिल्ली विधानसभा के चुनावों में असाधारण बहुमत के साथ सत्ता में आई आप पार्टी को राजकाज संभाले चंद दिन भी नहीं हुए कि पार्टी में जूतम पैजार शुरू हो गई। निश्चित तौर पर हर राजनीतिक विवाद की वजहें होती हैं और उसमें सिद्धांत और सत्ता संघर्ष दोनों पक्ष होते हैं। वैसा यहां भी है। पार्टी के जिन दो धड़ों में इस समय संघर्ष छिड़ा हुआ है उसमें हर पक्ष अपनी कमीज को ज्यादा उजली बताते हुए दूसरे को साजिशी बता रहा है। पर सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि इस पूरी लड़ाई में उस व्यक्ति की छवि सबसे ज्यादा खराब हुई है जिसकी छवि और संघर्ष को आधार बनाकर दिल्ली की जनता ने पार्टी को असाधारण बहुमत दिया और आगे जिससे एक जिम्मेदार विपक्ष बनने की उम्मीद पूरा देश लगाए हुए है। इसमें कोई दो राय नहीं कि योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण को राजनीतिक मामलों की समिति से निकाले जाने के बाद योगेंद्र यादव का कद अरविंद केजरीवाल के बराबर पहुंच गया है। पीएसी में भी उनके पक्ष में जिस तरह का समर्थन दिखा और दिल्ली के अलावा देश के अन्य राज्यों से जिस प्रकार की प्रतिक्रियाएं आ रही हैं वे बता रही हैं अरविंद केजरीवाल अपने इर्द गिर्द कुछ सत्ता लोभी और छोटे लोगों से घिर गए हैं और वे नहीं चाहते कि पार्टी में राष्ट्रीय प्रतिष्ठा के लोग रहें और उनकी बात मानी जाए। लेकिन सबसे ज्यादा लोग इस बात से दुखी और चिंतित हैं कि जिस प्रशांत भूषण ने पार्टी को कानून की तलवार और ढाल प्रदान करने से लेकर पार्टी को कवच- कुंडल और कोश सब कुछ प्रदान किया आज उन्हीं को साजिशी बताकर निकालने की तैयारी है। उससे भी बड़ी दिक्कत यह है कि पार्टी के संयोजक और सबसे बड़े नेता अरविंद केजरीवाल बीमारी के बिना पर उन लोगों से संवाद ही नहीं कर रहे हैं और एक भ्रष्ट व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष करने निकली पार्टी अपने ही साथियों के खिलाफ स्टिंग आपरेशन में फंस गई है।
पर उससे भी ज्यादा दुखद स्थिति यह है कि इस पूरे झगड़े में योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की तरफ से भी सिद्धांत और रणनीति के बजाय सिर्फ कार्यनीति (टैक्टिस) जैसी बातें निकल कर आ रही हैं, जिनसे न तो आप का भला होना है न ही समाज का। कहते हैं कि यह भी योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की रणनीति है कि इस लड़ाई में कोई सैद्धांतिक मतभेद होता न दिखे। तभी तो पार्टी के एक और नेता आशुतोष की तरफ से सैद्धांतिक विवाद की दिशा में फेंके गए पांसे को किसी ने लपकने की कोशिश नहीं की। आशुतोष ने कहा था कि यह विवाद कुछ अतिवामपंथी और कुछ व्यावहारिक सिद्धांत में यकीन करने वालों का टकराव है। पर योगेंद्र या प्रशांत ने अतिवामपंथ तो क्या अपने को वामपंथी और समाजवादी रूप में भी प्रस्तुत करना गवारा नहीं समझा। उन्होंने इसे महज अरविंद का पर्सनालिटी कल्ट, हाई कमान कल्चर और नैतिकता व पारदर्शिता का मुद्दा बनाकर ही पेश किया। दिलचस्प बात यह है कि दूसरी तरफ के लोग ही नहीं मीडिया भी इसे पारदर्शिता और नैतिकता का मुद्दा बनाकर पेश कर रहा है। इस दौरान मयंक गांधी और अंजलि दमानिया समेत दूसरे नेता जो या तो ब्लाग लिख रहे हैं या इस्तीफा दे रहे हैं वे भी या तो साजिश की बात उठा रहे हैं या फिर शालीनता की कमी और नैतिकता के पतन का सवाल उठा रहे हैं।
शायद मीडिया भी यही चाहता है कि साजिश, भ्रष्टाचार, खरीद फरोख्त, और मेरी ताकत बनाम तेरी ताकत, मेरी जागीर बनाम तेरी जागीर जैसे मुद्दों पर आप खड़ी हो और उसी पर उसमें झगड़ा हो और उसी पर समझौता भी हो। क्योंकि मीडिया और उसका दर्शक, पाठक और श्रोता वर्ग बहुत ज्यादा सिद्धांत और नीति में यकीन नहीं करता। खासकर वह बीसवीं सदी के किसी राजनीतिक सिद्धांत पर बहस और यकीन करने से भागता है। यही कारण है कि आप पार्टी के आइडियोलाग और आजकल बागी बन चुके योगेंद्र यादव जब आप पार्टी में आए थे तो उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा था कि हमें बीसवीं सदी की किसी विचारधारा का भार नहीं ढोना है क्योंकि उससे इक्कीसवीं सदी में काम नहीं चलने वाला है। यही बात अरविंद केजरीवाल और उनके मंडल विरोधी मित्र भी चाहते थे। अरविंद केजरीवाल और उनके करीबी साथी कहा करते हैं कि वे किसी समस्या का हल विचारधारा के बजाय तात्कालिक तथ्यों के आधार पर करते हैं। ध्यान देने की बात है कि जिस समय केजरीवाल का आंदोलन चरम पर था उसी समय समाजवादी जनपरिषद के नेता सुनील भाई ने एक पुस्तिका निकाली थी जिसका शीर्षक था—भ्रष्टाचार को कैसे समझें-। लेकिन उस समय केजरीवाल के साथियों ने रामलीला मैदान में उस पुस्तिका को बंटने नहीं दिया था। क्योंकि उस पुस्तिका का कहना था कि मौजूदा नवउदारवादी व्यवस्था के चलते हुए भ्रष्टाचार का हंगामा भले मचाया जा सकता है लेकिन उसे दूर नहीं किया जा सकता। उनका कहना था कि पूंजीवाद का मानवीय चेहरा नहीं हो सकता।
सुनील भाई कोई और नहीं योगेंद्र यादव के आदर्श थे और योगेंद्र यादव ने किशन पटनायक जैसे समाजवादी की प्रेरणा से सुनील और उनसे जैसे तमाम समाजवादी साथियों के साथ न सिर्फ राजनीतिक काम किया बल्कि 'सामयिक वार्ता’ जैसी पत्रिका भी प्रकाशित की। योगेंद्र की यही पूंजी उन्हें राजनीतिक बनाती है जिसके कारण देश भर के आंदोलनकारी उनसे जुड़ते और उनका सम्मान करते हैं, लेकिन उन दिनों योगेंद्र यादव और उनके जैसे सुनील के तमाम साथियों को अरविंद केजरीवाल के आंदोलन के हिमालय से राजनीतिक गंगा निकलती दिख रही थी और उन्होंने सुनील की सूखी फाल्गू नदी को समाजवादी पिंडदान के लिए छोड़ दिया।
स्टिंग, सनसनी और निजी तू-तू मैं-मैं में यकीन करने वाले मीडिया को शायद ही यह मालूम हो कि योगेंद्र यादव महज चुनाव विश्लेषक ही नहीं देश में समाजवाद की सैद्धांतिक धारा के हिस्से रहे हैं। इतना ही नहीं आप में आज जो लोग उनका साथ दे रहे हैं, वे भी समाजवादी पृष्ठभूमि के हैं। प्रोफेसर आनंद कुमार हों या अजीत झा यह सब समाजवाद के सिद्धांत को आगे ले जाने का बार-बार संकल्प लेते रहे हैं। लेकिन आप पार्टी ने उन तमाम लोगों को अराजनीतिक बनाने का काम किया है। विडंबना यह है कि वे लोग आप को राजनीतिक नहीं बना पाए। कोई वजह नहीं है उन्होंने ऐसा अपने राजनीतिक कैरियर के अलावा किसी और इरादे से किया हो।
आप पार्टी खड़ी होने के पीछे एक वजह यह भी रही है कि यूपीए सरकार के भ्रष्टाचार से परेशान मध्यवर्ग को राजनीतिक ढांचे से अलग मिस्र और ट्यूनीशिया जैसे देशों की तर्ज पर नायकों की तलाश थी। उस तलाश में कुछ अन्ना आंदोलन ने मदद की और कुछ मीडिया ने। लेकिन इस दौरान तमाम ऐसे लोग नायक बन गए जिनका कद सचमुच बहुत छोटा था और जो बाहर देश को उपदेश देना चाहते थे और भीतर माल पर निगाह लगाए थे। इस आंदोलन से जो कुछ अच्छे और योग्य लोग जुड़े उन्हें अपने त्याग और बलिदान का अहंकार होता चला गया। अगर ऐसा न होता तो वे बार-बार यह न कहते कि अरे हम यही करने(संयोजक बनने या पीएसी का सदस्य बनने या मुख्यमंत्री बनने) आए थे। दूसरी ओर इसी दौरान जनता नरेंद्र मोदी के रूप में 'लोकनायक’ या 'महानायक’ चुनकर छली सी महसूस कर रही है तभी उसने दिल्ली विधानसभा में भाजपा को झटका देने वाला फैसला भी दिया है। पर हमारे नए नायकों की विडंबना यह है कि वे सत्याग्रह और स्टिंग एक साथ चलाना चाहते हैं। वे भूल जाते हैं कि सत्याग्रह में जानी दुश्मन के खिलाफ भी न तो साजिश की जाती है न ही उस पर अविश्वास किया जाता है और स्टिंग तो कतई नहीं। उसके हृदय परिवर्तन के लिए उस पर विश्वास करना जरूरी होता है। ग्लैमर, कैरियर और कामयाबी के शिखर पर खड़ी आप पार्टी और उसके लोग विचारहीन होने की बीमारी तो झेल ही रहे हैं और अगर उन्होंने एक राजनीतिक पार्टी को मीडिया के इशारे या उसके ढर्रे पर चलाने की कोशिश की तो उनके लिए असम गण परिषद की तरह खाई में गिरने और खंड –खंड होने के अलावा कोई चारा नहीं होगा।
अरुण कुमार त्रिपाठी
अरुण कुमार त्रिपाठी, लेखक वरिष्ठ पत्रकार व राजनीतिक विश्लेषक हैं।