आफताब आलम : पता ही नहीं चला कि कब काशीपुर क्रिकेट टीम का कैप्टन हुजी का कैप्टन बन गया
आफताब आलम : पता ही नहीं चला कि कब काशीपुर क्रिकेट टीम का कैप्टन हुजी का कैप्टन बन गया
जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय के लोहित छात्रावास में रात दस बजे आफताब से मिलने पहुंचा, वह सो रहा था। कुछ वक्त बाद वह कराहते हुए जागा।
आफताब के पोर-पोर में हो रहा यह दर्द उस कोलकाता सीआईडी व यू पी एसटीएफ की पुलिसिया पठकथा की सौगात है, जिसे वह 22 दिनों तक झेलता रहा।
आफताब को पहली बार तब हमने जाना जब पुलिस ने बताया कि यह शख़्स हूजी का एरिया कमांडर है और यह ‘गुपचुप तरीके’ से प. बंगाल के इलेक्ट्रिक सप्लाई कॉरपोरेशन में काम कर रहा था। गोरखपुर के आफताब को उत्तर प्रदेश की कचहरियों में हुए सिलसिलेवार बम धमाकों का आरोपी बताते हुए बांग्लादेशी कहा गया था।
फिलहाल 16 जनवरी को रिहा होने के बाद आफताब जेएनयू छात्रसंघ अध्यक्ष संदीप सिंह के बुलावे पर दिल्ली आया।
लाल कपड़े से मुंह ढके आफताब की 29 दिसम्बर की पेपर कटिंग देख वह बोला ‘ मुझे पता ही नहीं चला कि कब काशीपुर क्रिकेट टीम का कैप्टन हुजी का कैप्टन बन गया।’
बकौल पुलिस आफताब बांग्लादेशी आतंकी संगठन हरकत-उल-जेहाद-ए-इस्लामी; हूजी का एरिया कमांडर है। पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश में इसने आतकंवाद का प्रषिक्षण लिया है।
पुलिस के इस ‘एरिया कमांडर’ में बचपन से ही भारतीय सेना में जाने की तमन्ना थी।
आफताब इसी तमन्ना को लेकर नासिक तोपखाना रेजीमेन्ट में भर्ती होने गया था पर पिता की असामयिक मृत्यु के बाद वापस लौट आया।
अपनी चार बहनों, भाई और मां, नानी के गुजर बसर के लिए आफताब 17 फरवरी 2003 को अपने पिता की मृतक आश्रित नौकरी पर नियुक्त हुआ।
27 दिसम्बर को कोलकाता के श्याम बाजार इलाके के चिड़िया मोड़ से दिन में तकरीबन डेढ़ बजे कोलकाता सीआईडी ने लोन के गारण्टर की शिनाख्त के बहाने बुलाकर गिरफ्तार कर लिया। दो दिनों तक आफताब को उल्टा लटकाकर पीटा गया और उसे सोने नहीं दिया गया, जब भी उसने सोने की कोशिश की उसे लात घूसों से पीटा जाता।
आफताब बताता है कि उससे पुलिस ने कहा कि तुम बस इतना कह दो कि तुम हूजी के एरिया कमांडर मुख्तार उर्फ राजू हो।
आफताब बताता है,
“मैं बार-बार इंकार करता रहा कि मेरा किसी आतंकी संगठन से कोई ताल्लुक नहीं है, तो वे कहते कि तब तुम्हारे पास डेढ़ किलो आरडीएक्स और खाते में 6 करेाड़ रुपये कहां से आये। तुमने कोलकाता के हावड़ा रिहायशी इलाके में फ्लैट कैसे खरीदा। मेरे लगातार इंकार करने के बावजूद कोलकाता सीआईडी ने मुझे 30 दिसम्बर को यूपी एसटीएफ को सौंप दिया। मुझसे यह कहकर सादे कागजों पर दस्तखत कराए गए कि हमको कागजी कार्यवाही करनी है। यूपी एसटीएफ मेरे दोनों हाथ, पैर बांध कर टवेरा गाड़ी से मुझे 17 घण्टे की यात्रा के बाद लखनऊ लाई। और फिर एसटीएफ ने मेरे कपड़े उतरवाकर टायर की बेल्ट से घंटों तक ठण्डा पानी गिरा-गिरा कर पीटा और इस बात को कहने को मजबूर कर रहे थे कि ‘तू बोल की तेरा ही नाम अल्ताफ, मुख्तार राजू है और तूने ही संकटमोचन और कचहरियों में बम धमाके किये। 2 जनवरी को रिमाण्ड का वक्त पूरा हेाने के बाद मुझे लखनऊ कारागार में डाल दिया गया।“
कड़कड़ाती सर्दी में जब पारा गिरता ही जा रहा था, ऐसे में आफताब को एक अदद हाफ टी शर्ट और जींस पैंट में कई दिनों तक रहना पड़ा। उसे न ही कोलकाता सीआईडी ने और न ही यूपी एसटीएफ ने ठंड से बचने के लिए कोई कपड़ा मुहैया कराया।
उधर आफताब की मां आयशा बेगम बेटे की गुमशुदगी की रिपोर्ट लिखा कर दर-दर उसे खोजते हुए भटक रही थीं।
29 दिसम्बर को भी सीआईडी लोन के गारन्टर की शिनाख्त के बहाने आफताब के घर छापामार उसके फोटो समेत कई जरूरी कागजात उठा लाई।
आयषा बेगम को जब मालूम पड़ा कि उसके बेटे को आतंकवादी कह पुलिस लखनऊ ले गई तो वह भी लखनऊ चली आईं।
उ.प्र. बार एसोसिएशन के फरमान के बाद कोई वकील उसका साथ देने को न था ऐसे में वकील मोहम्मद शुऐब ने उसकी पैरवी के लिए हामी भरी।
मो. शुऐब बताते हैं कि आफताब की मां उसका कोलकाता इलेक्ट्रिक सप्लाई कॉरपोरेषन का पुराना नया दोनों परिचय पत्र लाई जिससे इस तर्क को मजबूती मिली कि वह कोई अल्ताफ, मुख्तार राजू नहीं है बल्कि आफताब आलम अंसारी है।
इस पूरे प्रकरण में आफताब का वह मेडिकल सर्टीफिकेट जो इसका प्रमाण था कि वह 23 नवम्बर 2006 को कोलकाता में था, बहुत बड़ा हथियार बना। क्योंकि पुलिस ने उस दिन आफताब को संकटमोचन बम धमाकों के सिलसिले में यू.पी. में होने का दावा किया था।
बेटे से मिलने की चाहत में आयषा जेल के बाहर, चाय की दुकानों पर कई रातों तक भटकती रही। इस बीच वकील शुऐब ने कोर्ट में कई अर्जियां डालीं कि आफताब की मां को उससे मिलने दिया जाय पर पुलिस के कान पर जूं तक नहीं रेंगी और न ही कोर्ट ने कोई मदद की।
मो. शुऐब बताते हैं कि मैने कई बार अपने मुवक्किल आफताब से मिलने की कोशिश की पर मुझे नहीं मिलने दिया गया। पुलिस ने कानून को ताक पर रखकर मेरे मुवक्किल को जो यातनाएं दी और जो हमारे साथ सलूक किया गया वह गैर कानूनी था।
इस दौरान आफताब के मुहल्ले काषीपुर के लोगों ने एक हस्ताक्षर अभियान चलाया जिसमें यह कहा गया कि वह मुख्तार, अल्ताफ या राजू नहीं है। पुलिस पर लगातार बन रहा यह दबाव पुलिस की परेशानी बन गयी कि वह इससे बाहर कैसे निकले।
पुलिसिया मार से लखनऊ कारागार में बन्दी आफताब की तबीयत काफी खराब होने के बावजूद एसटीएफ तीन जनवरी को फिर से उसे 7 दिन की ट्राँजिट रिमांड पर ले गयी। लगातार यातनाओं के दौर से गुजर रहे आफताब को पुलिस ने अपनी पटकथा के अनुरूप तोड़ना चाहा पर आफताब टूटा नहीं और अपनी बात पर टिका रहा।
आफताब बताता है कि किसी एसटीएफ के बड़े अधिकारी ने उससे पूछा कि तुम्हारी अन्य आतंकियों के साथ बातचीत को कोई टेपरिकार्ड तुम्हें सुनाया गया।
इस पर आफताब के इन्कार के बाद और यह कहने पर कि पुलिस जिनके कहने पर मुझे लायी है उनको सामने लाया जाय। 12 जनवरी को दिन में 11 बजे पुलिसिया पटकथा के चारों तथाकथित आरोपियों तारीक, खालिद, सज्जाद और एक अन्य से उसका सामना कराया गया। पुलिस ने बाद में बताया कि वे मुझे नहीं पहचानते। इस आश्वासन पर कि उसे छोड़ दिया जाएगा एसटीएफ ने लखनऊ कारागार भेज दिया।
आफताब के वकील शुऐब बताते हैं कि उन्होंने पुलिस विवेचना अधिकारी को यह तथ्य मुहैया कराया कि वह आफताब आलम अंसारी है। अंततः 22 दिन की लम्बी यातना के बाद आफताब को 16 जनवरी को रिहा कर दिया गया।
आफताब की रिहाई के लिए संघर्षरत मानवाधिकार संगठन पीपुल्स यूनियन फॉर हयूमन राइट्स के शाहनवाज आलम और लक्ष्मण प्रसाद कहते हैं कि आफताब, तारिक, खालिद समेत तमाम आतंकी होने के नाम पर जो गिरफ्तारियां हो रही हैं वो सभी प्रदेश सरकार की सोची समझी साजिश के तहत हैं।
इस दौरान पुलिस द्वारा जारी स्केचों से पकड़े गए किसी भी व्यक्ति का चेहरा नहीं मिलता है, तब ऐसे में पुलिस को यह बताना चाहिए कि उसके द्वारा जारी स्केच किसके हैं।
प्रदेश सरकार यूपीकोका जैसे काले कानून के प़क्ष में माहौल बना रही है। यूपीकोका जैसे काले कानून के पारित हो जाने के बाद अब किसी और आफताब को बचाना हमारे लिए चुनौती बन गया है।
वे यह कहते हैं कि सी.आर.पी.सी. की धारा 197 के तहत जो यह सुविधा मिली हुई है कि कोई भी व्यक्ति सरकारी अधिकारी के खिलाफ तब तक कोई मुकद्मा नहीं कर सकता जब तक कि कार्यपालिका से इजाजत नहीं मिलती। यदि कानून की निगाह में सभी बराबर हैं तो धारा 197 को समाप्त किया जाए और यह सुनिष्चित किया जाए कि दोशी पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कार्यवाही की जाएगी और आफताब को पूरा मुआवजा बिना किसी कानूनी लड़ाई में गए मिले।
आफताब के लिए पाँच लाख रूपए मुआवजे की मांग करते हुए जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष संदीप सिंह ने कहा कि अब ये सवाल उठता है कि कोलकाता सीआईडी ने जिस डेढ़ किलो आरडीएक्स, छह करोड़ रूपए और हावड़ा के रिहायशी इलाके में फ्लैट की बात कही थी वह किसका था और कहां गया।
यह वह सवाल है जो आतंकी की गिरफ्तारी के बाद पुलिस उठाती है। आतंकवाद सिद्ध होने पर तो यह संपत्ति उस आतंकी की हो जाती है, पर बरी हो जाने पर सवाल अंधेरे में रह जाता है।
ऐसे में जब आफताब निर्दोष साबित हो चुका है तब कोलकाता सीआईडी सवालिया घेरे में आती है कि उसे डेढ़ किलो आरडीएक्स कैसे प्राप्त हुआ।
संदीप कहते हैं कि पुलिस ने आफताब के बारे में कहा था कि वह गुपचुप तरीके से नौकरी करता था। तब तो यह सवाल पुलिस पर भी उठता है जिन्होंने आफताब को उठाया था, क्योंकि हम भी उन्हें नहीं जानते तब तो वे भी गुपचुप तरीके से नौकरी करते हैं।
आफताब ने पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्या से मिलकर अस्सी हजार रूपए की मांग की थी। जिस पर सरकार ने उसे तीस हजार रूपए देने की बात कही है। मुआवजे के मांगे अस्सी हजार रूपयों में उसकी मां के कचहरियों के चक्कर काटने के दौरान खर्च रूपयों के समेत वह सोलह हजार रूपए भी हैं जो उसकी बहन की सगाई में दिए वह रूपए हैं जो उसके आतंकी होने की खबर के बाद टूट गई।
‘इन लोगों की वजह से मेरी बहन की शादी टूट गई, मेरी मां ने पागलों की तरह दर-दर की ठोकरें खाई, खुदा न करे मेरी मां को कुछ हो जाता तो’ यह कहते-कहते आफताब रो पड़ता है।
यह पूछने पर कि वह पुलिस के खिलाफ केस करेगा तो वह कहता है ‘करके क्या पाउंगा, पुलिस से तो जीत नहीं सकता’।
तब ऐसे में आफताब का यह अनकहा सवाल इस लोकतंत्र में कितना वाजिब हो जाता है कि लोक पर तंत्र कितना हावी हो चुका है। वर्तमान व्यवस्था इतनी हावी हो चुकी है कि इसे आफताब जैसा व्यक्ति चुनौती देने का दम नहीं भर पा रहा है।
राजीव यादव


