आम आदमी पार्टी- हिसाब ज्यों का त्यों, फिर कुनबा डूबा क्यों
अरुण तिवारी
अनुमान था कि ’आप’ के लिए जीत की पहली खबर दिल्ली, हरियाणा, गुजरात, महाराष्ट्र, उङीसा, केरल, प. बंगाल, पंजाब, झारखण्ड अथवा उत्तर प्रदेश के किसी हिस्से से आयेगी; लेकिन ’आप’ के लिए लोकसभा में प्रवेश का द्वार खोला एकमात्र पंजाब ने: 24.5 प्रतिशत वोट, 13 में से 9 सीटों पर शानदार प्रदर्शन और चार पर सीधे नंबर वन। चंडीगढ में भी ’आप’ ने 24 प्रतिशत मत हासिल किया है। पंजाब ने ’आप’ की लाज रख ली। हालांकि इसे पंजाब प्रदेश में सत्तारूढ शिरोमणी अकाली दल-भाजपा गठबंधन तथा केन्द्र में कांग्रेस के खिलाफ सख्त नाराजगी का नतीजा कहा जा रहा है। ’आप’ की भूमिका सिर्फ इतनी है कि सभी सीटों पर उम्मीदवार उतारकर वह एक बेहतर विकल्प के रूप में सामने आई। बावजूद इसके पंजाब में यह प्रदर्शन अप्रत्याशित और पड़ताल का विषय है।

इससे भी अधिक अप्रत्याशित और पङताल का विषय है, दिल्ली वोटर का ’आप’ को दिया मत प्रतिशत। कयास लगाया जा रहा था कि ’आप’ को दिल्ली की कुर्सी छोड़ने का सबसे ज्यादा नुकसान दिल्ली में ही होगा। विधानसभा की 28 सीटों की तुलना में दिल्ली की सातों लोकसभा सीटों का हार जाना राजनीति बदलने निकली पार्टी के लिए निश्चित ही सबक सिखाने वाला है। लेकिन ताज्जुब है कि विधानसभा चुनाव की तुलना में दिल्ली के वोट में ’आप’ की हिस्सेदारी बढ़ गई है। विधानसभा चुनाव में 30 प्रतिशत थी; लोकसभा में 32.9 प्रतिशत है। कांग्रेस को पछाड़कर आम आदमी पार्टी अभी भी दिल्ली प्रदेश की नंबर दो पार्टी बनी हुई है।

राष्ट्रीय चित्र यह है कि हिमाचल की मंडी-हमीरपुर, राजस्थान की कोटा-टोंक-उदयपुर, गुजरात की अमरेली-जूनागढ-नवसारी, महाराष्ट्र की बारामती-सतारा, म.प्र. की इंदौर, उत्तर प्रदेश की वाराणसी सीट के अलावा मिजोरम जैसी सीटों पर ’आप’ ने प्रथम चार में शामिल होकर बेहतर उपस्थित दर्ज करा दी है। पूरे देश का कुल मतदान प्रतिशत देखें तो ’आप’ को कुल दो प्रतिशत मत हासिल हुआ है। करीब एक करोड़, 13 लाख, 23 हजार, 510 वोटर ने ’आप’ को मत दिया है। हरियाणा में हासिल मत प्रतिशत 4.2, हिमाचल में 2.1, उत्तराखण्ड में 1.6, उ. प्र. में 1.0, महाराष्ट्र में 2.2, कर्नाटक में 0.8, गुजरात में 1.2, गोवा में 3.3, मिजोरम में 2.7, मणिपुर में 0.5, अरुणांचल में 0.7, मध्य प्रदेश व छत्तीसगढ में 1.2, तथा उङीसा में 0.7 है। राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा हासिल करने से दो कदम पीछे रह गई है।

उत्तर प्रदेश में मिले मात्र एक प्रतिशत वोट और गाजियाबाद में शाजिया इल्मी समेत ज्यादातर सीटों पर जब्त जमानत को लेकर उंगली सीधे ’आप’ की सांगठनिक क्षमता पर है। इस पर खास मंथन व बदलाव की जरूरत इसलिए भी होगी कि पार्टी के प्रमुख संगठक संजय सिंह उत्तर प्रदेश से आते हैं तथा कुमार विश्वास व स्वयं केजरीवाल उ, प्र, में उपस्थित रहकर चुनाव लड़े। झारखण्ड, बिहार, आंध्रप्रदेश, केरल, तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल जैसे प्रदेशों ने ’आप’ को पहचानने से इंकार कर दिया है। ऐसे प्रमुख प्रदेशों में पार्टी के इस हश्र और वोट प्रतिशत के जमाजोड़ के बीच पेश चिंता और चिंतन का प्रश्न सिर्फ एक ही है - हिसाब ज्यों का त्यों, फिर कुनबा डूबा क्यों ? उत्तर की तलाश जरूरी है।

’’आधी छोङ पूरी को धावे, आधी मिले न पूरी पावे’’ वाली कहावत की अनदेखी करने की एक गलती से दिल्ली-पंजाब का दिल भले ही न टूटा हो, देश के दूसरे हिस्से में बड़े पैमाने पर लोगों का दिल भी टूटा और भरोसा भी। अतः पहला सबक यह है कि राजनीति में एक छोटी सी चूक भी बड़ें विनाश का सबब बन सकती है। राजनीति न तो इंटरनेट पर सवार होकर बदली जा सकती है और न ही राजनीतिक और गंदी सांप्रदायिक होड़ में शामिल होकर। नरेन्द्र मोदी, अडाणी, अंबानी और सोशल मीडिया चकल्लस पर ध्यान लगाने में काफी वक्त जाया कर चुके; ’आप’ नेतृत्व को चाहिए कि वह अब थोड़ा वक्त जमीनी अनुभवों से निकली इन कहावतों को सुनने और इनके आधार पर जमीनी कामकाज करने में लगायें।

दूसरा सबक यह कि सार्वजनिक जीवन में निजी कुछ नहीं रह जाता; न समय, न धन, न धर्म, न आचार और न विचार। निजी होते हुए भी दूसरे पर इन्हें थोपने की आजादी आपके हाथ नहीं होती। इन्हे निजी मानकर सार्वजनिक यानी पार्टी, संगठन या समाज पर थोपने की गलती के नतीजे कभी अनुकूल नहीं होते।

तीसरा सबक यह कि दुनिया जीतते हुए को सलाम करती है। चंदा देने वाला व्यापारी भी जीतते हुए पर ही दांव लगाता है। आजकल लोग सिद्धांत और व्यक्ति से ज्यादा संभावनाओं से दोस्ती करते हैं। भंवर में फंसी नौका का साथ सबसे पहले उसके सवार ही छोड़ते हैं। अतः चंदा और समर्थक नहीं, अच्छी राजनीति की संभावनायें तलाशें। शेष स्वतः फिर जुट जायेगा।

चौथा सबक यह कि देश की जनता ने आम आदमी पार्टी को सिरे से खारिज नहीं किया है। प्रचारित की गई तमाम हताशा के बावजूद हासिल वोट प्रतिशत बताता है कि ’आप’ को लेकर जनाकांक्षायें अभी मरी नहीं हैं। एक करोङ भारतीय आज भी चाहते हैं कि यह पार्टी टिके भी और बढे भी। दिल्ली के वोटर ने प्रायश्चित करने का वक्त दिया है। बिजली, पानी, मंहगाई, भ्रष्टाचार और लोकाधिकार के जिन मुददों को लेकर आम आदमी पार्टी मात्र सात महीने पहले पहली बार चुनाव में उतरी थी, ये आज भी पूरे देश की जनाकांक्षा के करीब के विषय हैं। राजनीति न भी बदल सको, तो कम से कम इन मुद्दों का जवाब तलाशने की राजनीति तो करो।

अरुण तिवारी, लेखक प्रकृति एवम् लोकतांत्रिक मसलों से संबद्ध वरिष्ठ पत्रकार एवम् सामाजिक कार्यकर्ता हैं।