गरीबों की थाली, प्रोटीन से खाली
0 प्रकाश कारात

दाल के दामों में भारी बढ़ोतरी ने आम जनता की हालात खराब कर दी है। अरहर की दाल अब मुर्गे के मांस से भी महंगी हो गयी है और खुदरा बाजार में 220 रु0 किलोग्राम तक पहुंच गयी है। वास्तव में अरहर और उड़द की दाल के दाम, 2014 के अक्टूबर के मुकाबले दोगुने हो गए हैं।

याद रहे कि दालों के दाम का मुद्दा सिर्फ महंगाई का ही मुद्दा नहीं है। यह मुद्दा खाद्य सुरक्षा से भी जुड़ा हुआ है क्योंकि हमारे देश की जनता का ज्यादातर हिस्सा, दालों से ही प्रोटीन की अपनी जरूरत पूरी करता है। एक स्वस्थ्य व्यक्ति के लिए हर रोज 50 से 60 ग्राम तक प्रोटीन की जरूरत होती है, जबकि हमारे देश में दालों की मौजूदा उपलब्धता 30 ग्राम प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन से भी कम है। जो दाल कभी गरीबों के लिए प्रोटीन का स्रोत हुआ करती थी, अब अमीरों की ऐश की चीज बन गयी है।

बेशक, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि इस बार बारिश अपर्याप्त होने से, घरेलू स्तर पर दलहन की पैदावार घटी है। लेकिन, दाल के दाम में जो भारी बढ़ोतरी हुई है, उसकी व्याख्या पैदावार में इस कमी से नहीं हो सकती है। दालों के उत्पादन में कुल 12 फीसद की कमी हुई है जबकि उनके दाम में सौ फीसद बढ़ोतरी हो गयी है। साफ है कि दाल के दाम में यह भारी बढ़ोतरी, सिर्फ मौसम की मार का नतीजा नहीं है बल्कि सरकार की गलत नीतियों का ही नतीजा है। आम जनता की खाद्य सुरक्षा पर इस जहरीले हमले के लिए मोदी सरकार सीधे-सीधे जिम्मेदार है।

भारत में हर साल करीब 2 करोड़ 30 लाख टन दाल की खपत होती है, जबकि हमारे देश का सालाना दलहन उत्पादन 1 करोड़ 80 लाख से 1 करोड़ 90 लाख टन के बीच ही बैठेगा। जाहिर है कि इस कमी की भरपाई बाहर से दालों का आयात करने के माध्यम से की जाती है। इस साल भारत को इस घाटे की भरपाई के लिए चूंकि और ज्यादा दाल का आयात करना था, इसे देखते हुए अंतर्राष्टï्रीय बाजार में भी दाल के भाव चढ़ गए। दूसरी ओर, दलहन की घरेलू पैदावार बढ़ाने के लिए सरकार ने शायद ही कुछ किया है। अरहर तथा चना जैसी दालों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में उल्लेखनीय बढ़ोतरी किए जाने की जरूरत है। लेकिन, सिर्फ इतना ही करना काफी नहीं होगा क्योंकि भारतीय खाद्य निगम द्वारा दालों की सरकारी खरीद तो की ही नहीं जाती है। सरकारी खरीद के बिना किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य का लाभ मिलेगा ही कैसे? इसलिए, दालहन की सरकारी खरीद की व्यवस्था होना भी जरूरी है।

सरकार के पास दालों का कोई बफर स्टॉक भी नहीं रहता है। बफर स्टॉक के न होने का नतीजा यह होता है कि पैदावार में मामूली सी गिरावट भी, सट्टïेबाजाराना जखीरेबाजी और कालाबाजारी के लिए मौका दे देती है। वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एलान किया है कि सरकार दालों का बफर स्टॉक जमा करेगी। लेकिन, वह जिस तरह के बफर स्टॉक की बात कर रहे हैं, उससे तो सिर्फ आयातकों का और अंतर्राष्ट्रीय बाजार के कारोबारियों का ही फायदा होगा। दालों के लिए ऐसा बफर स्टॉक निर्मित किया जाना चाहिए, जो खुद अपने देश में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर आधारित सरकारी खरीद के जरिए खड़ा किया जाए।

हमारे देश में दलहन ही पैदावार का बड़ा हिस्सा असिंचित तथा सिर्फ बारिश के भरोसे खेती करनेवाले इलाकों से ही आता है। इनमें बड़ा हिस्सा आदिवासी बहुल है। इसलिए, दालों के मामले में आत्मनिर्भरता के भारत के अभियान में, आदिवासी इलाकों तथा बारिश पर निर्भर खेती के इलाकों पर विशेष रूप से ध्यान केंद्रित करना होगा। स्थानीय कृषि-पर्यावरणीय क्षेत्रों के लिए उपयुक्त, ऊंची पैदावार वाली किस्मों के विकास को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

फिलहाल तो स्थिति यह है कि बहुराष्ट्रीय निगमों तथा बड़े व्यापारियों द्वारा दालों के आयात से, दालों की कीमतों में कोई सुधार नहीं आया है। उन्होंने अपने हाथों में दालों के भंडार जमा करने और कीमतों के ऊपर चढऩे का इंतजार करने का रास्ता अपनाया है। देश भर में जमाखोरों से 75,000 टन से ज्यादा दाल पकड़ी गयी है। ये भंडार बहुराष्ट्रीय निगमों और बड़ी खुदरा कारोबार शृंखलाओं ने जमा कर के रखे हुए थे। जमाखोरी से निपटने के लिए सरकार ने भंडारण की सीमाएं लगाने तथा अवैध जमाखोरी के भंडारों को निकलवाने के जो कदम उठाए भी हैं, बहुत देर से और आधे मन से उठाए हैं।

एक दशक से ज्यादा से सी पी आइ (एम) और वामपंथ द्वारा यह मांग उठायी जाती रही है कि खाद्य वस्तुओं और अन्य आवश्यक चीजों के वायदा कारोबार पर रोक लगायी जाए। 2014-15 में दलहन के उत्पादन में कमी के साथ, दालों में सट्टा बाजार बहुत बढ़ गया है। भाजपा की सरकार को, दालों के वायदा कारोबार पर रोक लगानी होगी।

दाल मे दाम में इस भारी बढ़ोतरी से जनता ने, मौजूदा सरकार की गड़बड़ी और मिलीभगत को पहचान लिया है। इसके साथ ही कीमतों पर अंकुश लगाने की मोदी सरकार की शेखी की कलई पूरी तरह से खुल गयी है।

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