शिवाजी राय

कृषि उत्पादकता को हमें दो भागों में देखने की ज़रूरत है पहला भाग नगदी फसल का है जिसे हम खेती किसानी की रीढ़ मानते हैं और दूसरा जो पारंपरिक खेती के रूप में चलता आ रहा है। नगदी फसल कृषि उत्पादन में किसानों के आर्थिक मामले को सुलझाता हैए जिसे हम आय व्यय के रूप में देखते हैं जिनमें मुख्य तौर पर गन्नाए कपासए दलहनए तिलहनए चाय इत्यादि आते हैं और जिनके लिए अलग.अलग क्षेत्रों में अलग.अलग किस्म के उत्पाद के लिए पहले से ही क्षेत्रीय स्तर पर आधारभूत संरचना को विकसित किया गया था जिनमें उत्तर प्रदेश के 38 जिलों में गन्ने को नगदी फसल मानते हुए उसके उत्पादन के साधनों को विकसित करने के साथ.साथ उसके क्रय.विक्रय के लिए समुचित बाज़ार तथा बड़े पैमाने पर गुड़ बनाने के बैल कोल्हू से क्रशर तकए खांडसारी बनाने की छोटी मिलें तथा चीनी उत्पादन के लिए इन क्षेत्रों में सैकड़ों मिलें स्थापित की गयी थी। यह विकास लम्बी प्रक्रिया में हुआ था जिसमे कोल्हू से लेकर चीनी मिल तक की स्थापना में किसानोंए मजदूरोंए बढईए लोहार से लेकर छोटे व्यवसाइयों का योगदान रहा। इसके माध्यम से स्थानीय बाज़ार क़स्बे तथा गाँव और शहर तक अनेक किस्म के रोजगार पनपते रहे और इन रोजगारों से जुड़े किसानए मजदूर और छोटे व्यवसायी फलते फूलते रहे।

ब्रितानी सरकार के समय में भी समय.समय पर कुछ शोषक तत्वों के कारण हमारे किसानों को जूझना भी पड़ता था और जिसकी प्रक्रिया में किसानों के आन्दोलन के रूप में चौरी चौरा कांड को भी देखा जा सकता है जो विशुद्ध रूप से किसानों का प्रतिरोध था। देश के बदले हालात में इन संसाधनों पर बड़ी कंपनियों का प्रभाव दिखने लगा।

आजादी के बाद भारत में औद्योगीकरण ने जोर पकड़ा लेकिन नेहरु जी के समय में अति लघुए लघु एवं कुटीर उद्योगों छोटे और स्थानीय व्यापारों को लगातार संरक्षण मिलता रहा परन्तु वर्ष 1969 आते.आते पूंजीपतियों ने अपना प्रभाव बढ़ा लिया जिसके कारण निचले रोजगार के संरक्षण पर खतरा मंडराने लगा और तत्कालीन इंदिरा सरकार और पूंजीपतियों के टकराव के परिणाम स्वरुप कई बैंको व् मिलों का प्रदेश व् केंद्र की सरकारों ने अधिग्रहण किया जिसके तहत उत्तर प्रदेश की कई चीनी मिलों का भी अधिग्रहण हुआ जिनमें देवरियाए बैतालपुरए भटनीए गौरी.बाज़ारए शाहगंजए रामकोला आदि उल्लेखनीय हैं। इन साधनों के पक्ष में और किसानों के हित मेंए क्षेत्रीय और प्रदेश स्तर पर राजनैतिक ताकतें भी लगातार जूझती रही जिसके कारण किसानों के हित में ष्केन पर्चेस एंड सप्लाई एक्टष् तथा जगह. जगह पर गन्ना एवं किसान समितियां कायम हुईं जिनके कारण निजी मिल मालिकों तथा सरकारी मिलों पर किसानों का नियंत्रण कायम रहा। जिससे किसानों को समय से भुगतान और गन्ने का मुनासिब दाम मिलता रहा। उदाहरण के लिए देखें तो उस दौर में स्वर्गीय गेंदा सिंह किसानों में अति लोक प्रिय हुआ करते थे और यहाँ तक की वह पूरे प्रदेश में गन्ना सिंह के रूप में जाने जाने लगे और यह कहने में गुरेज़ नहीं है की उस दौर में किसानों से जुड़े राजनैतिक लोग ही उत्तर प्रदेश की राजनैतिक ताकत हुआ करते थे।

हम देखतें हैं कि उस दौर में लगातार किसान पक्षधर राजनीति को लेकर देश और प्रदेश के सदनों में जनप्रतिनिधियों की भागीदारी बनी रही तथा किसानों की आय व्यय को बनाये रखने के लिए खाद्य के साथ साथ नगदी खेती को मज़बूत करने के लिए सदन में पक्ष और विपक्ष में चर्चा के विषय में गन्ना को केंद्र में रखा जाता था। जिसके क्रय विक्रयए मूल्यए दर लागतए भुगतान आपूर्ति तथा किसी भी हालत में गन्ना खेत में खड़ा हो तो मिलों को चलाने और चलवाने की जिम्मेदारी व् जवाबदेही सरकार की तय होती थी। और ये कहना गलत न होगा कि गन्ना किसान गन्ने की कमाई के बल पर बाज़ार में अपनी ताकत पर खड़ा हो सकता था चाहे उसे लड़की शादी करनी होए बच्चे की फीस देनी होए घर मकान बनाना हो या कोई अन्य सामाजिक सरोकार को बनाये रखना हो।

धीरे.धीरे राजनैतिक उतार चढ़ाव के कारण नीतिगत आर्थिक बदलाव होता चला गया और किसान राजनीति के केंद्र से बाहर होने लगा। कंपनियों का प्रभाव तेज़ी से बढ़ने लगा जिसका परिणाम हुआ कि सरकार ने चीनी मिलों को किसानों के नगदी फसल के नज़रिए से देखने की बजाय घाटे और मुनाफे की बहस में लाकर खड़ा कर दिया। और ये दावे के साथ कहा जा सकता है की निजीकरण के दौर में कंपनियों की निगाह सरकारी पूँजी को एन केन प्रकारेण खरीदारी के बहाने लूटने पर होती है और यह कार्य सरकारों द्वारा कानूनों को अमली जामा पहना कर ही पूरा हो सकता है इसीलिए जब इन मिलों को घाटे मुनाफे की बहस में लाते हैंए तो जनता में बगावत न होए इसके लिए सरकारी संस्थानों या उद्योगों को घाटे में दिखाया जाना आवश्यक हो जाता है और सरकारी तंत्र को असफल या निकम्मा होना साबित करना पड़ता है जिसके नाते परोक्ष रूप से जनता में निजीकरण की स्वीकार्यता बन जाती है और सरकारी माल की लूट आसान हो जाती है। और यही बात उत्तर प्रदेश में सहकारी व् सरकारी चीनी मिलों के साथ हुई।

आर्थिक उदारीकरण के साथ ही सरकारी क्षेत्र में विनिवेश की वकालत शुरू होती है और सरकारी अमले से लेकर के मंत्रिमंडल के सदस्यों तक और सरकारों के मुखिया भी इसकी वकालत में जुट जाते हैं। इन नीतियों के परिणाम स्वरुप उत्तर प्रदेश सरकार वर्ष 1999.2000 में 4 चीनी मिले मात्र 19 करोड़ मेंए अपने ही कबिनेट के लोगों को बेच देती है और इस तरह से क्रय और विक्रय के दोनों पक्ष सरकार के ही होते हैं। और उन 19 करोड़ रुपये भुगतान के लिए भी बिना किसी ब्याज के 6 साल का मौका दिया जाता है। नतीजा यह होता है कि जिस फर्म के नाम से मिल बेची जाती है वे मिल के सारे सामान निकाल कर बेच देते हैंए मिल खोखली हो जाती हैए किसान बेहाल हो जाते हैंए काफी आन्दोलनों के बावजूद नतीजा सिफर रहता है और आज भी वह मिल अपने अस्थि पंजरों के साथ पड़ी दिखाई देती हैं।

आप अनुमान लगा सकते हैं कि जो मिल सैकड़ों करोड़ में स्थापित होती है उसे मात्र पौने 5 करोड़ में बेच दिया जाता है तो घाटे मुनाफे की बहस का उद्देश्य भी स्पष्ट हो जाता है। लगभग इसी तरह उत्तर प्रदेश की सभी चीनी मिलों को बीमार दिखा कर बंद कर दिया गया और 2012 आते.आते उन सभी बंद पड़ी चीनी मिलों को बेच दिया गया। उदहारण के तौर पर भटनी की चीनी मिल पौने 5 करोड़ में बेचीं गयी जिसकी कीमत 172 करोड़ थी ; देवरिया की चीनी मिल 13 करोड़ मेंए बैतालपुर की चीनी मिल 13ण्16 करोड़ मेंए बाराबंकी की चीनी मिल 12ण्51 करोड़ मेंए बरेली की चीनी मिल 8ण्20 करोड़ मेंए रामकोला की मिल 4ण्55 करोड़ में एवं अन्य भी ऐसे ही द्ध। इन खरीदारों के बारे में जाने तो पता चलेगा कि फर्म और सरकारों का चोली दामन का साथ है और कोई भी सरकार इससे वंचित नहीं है।

100 वर्षों से ज्यादा समय पहले से नगदी फसल का जो आधारभूत ढांचा तैयार किया गया था उसका विकल्प तैयार किये बिना ही पुराने ढांचे को ढहा दिए जाने का सबसे ज्यादा प्रभाव उन इलाकों पर पड़ता है जंहा कृषि उत्पादन के अलावा कोई अन्य साधन नहीं हैं और जो अन्य छोटे मोटे उद्योग धन्धे हैं वो इस बड़ी आबादी की बेकारी और बेरोजगारी का बोझ नहीं उठा सकते। एक ओर जहाँ मिलें बंद होने से गन्ने की पैदावार हतोत्साहित हुई और उन मिलों में काम करने वाले मजदूर बेरोजगार हो गए तो दूसरी तरफ निजी मिल मालिकों और सरकार की सांठ गाँठ से किसान के गन्ने की पैदावार की लूट शुरू हुई जिसमे घटतौलीए गन्ने का भुगतान न करनाए गन्ने का मनमाना दाम तय करवाना आदि बातें आती हैं। सैद्धांतिक आधार पर निवेश ही किसी क्षेत्र विशेष के विकास का आधार होता है जो की पूर्णतया क्षेत्र में उत्पादन के साधनों की आय पर निर्भर करता है। यहाँ चीनी मिलों को बेचकर सरकार ने यहाँ के किसानों मजदूरों की आय को ही समाप्त कर दिया जिसके फलस्वरूप बड़े पैमाने पर पूर्वी उत्तर प्रदेश से पलायन का सिलसिला शुरू हो गया।

पलायित मजदूर बड़े संघर्षों से अपना जीवन यापन तो कर लेते हैं मगर वो जिन इलाकों से गए उन इलाकों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है और ये क्षेत्र सभी आर्थिक और सामाजिक मानकों जैसे आयए शिक्षा और स्वास्थ्य की दृष्टि से बदहाल हो गए हैं। जाति और धर्म के आधार पर जीत कर जाने वाले नेताओं को इन मामलों से कोई सरोकार नहीं है जिसके कारण अब सदन में भी इस पर कोई चर्चा नहीं होती और सदन का समय निजी लाभ की राजनीति की गुणा गणित में उलझकर समाप्त हो जाता है। अब तो इन प्रभावित लोगो को जाति.धर्म और दलीय राजनीति से अलग हटकर अपनी आवाज को बुलंद करने के लिए किसानो मजदूरों का एका कर सामूहिक नेतृत्व विकसित कर सदन में भागीदारी सुनिश्चित करनी चाहिए। साथ ही सरकार और पूंजीपतियों की साजिश को ख़त्म करने के लिए व्यापक जन आन्दोलन की जरुरत है। इन इलाकों को अपनी बदहाल परिस्थितियों से उबरने के लिए केंद्र व् प्रदेश सरकार से बड़े पैकेज की ज़रूरत है और यदि ऐसा नहीं होता है तो आगे जो परिस्थितियां बन रही हैं ये एक नए किस्म के क्षेत्रवाद को बढ़ावा देंगी।