इंतहा हो गई इंतजार की
इंतहा हो गई इंतजार की
- अवधेश आकोदिया -
कांग्रेस के कई दिग्गज नेता लंबे समय से सूबे की अशोक गहलोत सरकार का हाथ बंटाने के लिए बुलावे का इंतजार कर रहे हैं, लेकिन इनकी सत्ता में भागीदारी किसी न किसी वजह से लंबा खिंचती चली जा रही है। आखिर क्यों हो रही है यह देरी? अंदर की कहानी!
वाकया दो साल पहले का है। सूबे में कांग्रेस की सरकार बने चंद दिन ही हुए थे और इस खुशी में जश्न मनाया जा रहा था। जश्न में शरीक होने पार्टी के ‘युवराज’ राहुल गांधी भी आए थे। जीत का श्रेय लेने-देने की होड़ के बीच प्रदेशाध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी ने ‘जीत अधूरी’ कहकर खलबली मचा दी। जोशी ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को हिदायती लहजे में सीधे-सीधे कह दिया कि जब तक कांग्रेसियों की सरकार में भागीदारी नहीं होगी चुनावों में मिली जीत को मुकम्मल नहीं कहा जा सकता। जोशी के इस वक्तव्य के बाद ‘राजनीतिक नियुक्ति’ के आस लगाए बैठे पार्टी नेता सक्रिय हो गए। लॉबिंग तेज हो गई। प्रदेशाध्यक्ष होने के नाते सीपी जोशी ने भी माथापच्ची की, लेकिन मुख्यमंत्री ने इसमें खास दिलचस्पी नहीं दिखाई। जोशी ने आलाकमान से दबाव बनवाया तो गहलोत ने लोकसभा चुनाव का बहाना बनाकर बात टाल दी। सरकार में भागीदारी चाहने वाले नेताओं को अपने नंबर बढ़ाने का यह अच्छा मौका मिल गया। इन्होंने चुनाव में जमकर पसीना बहाया। परिणाम भी वैसे ही आए। पिछली बार 25 में से महज 4 सीटें जीतने वाली कांग्रेस ने धमाकेदार वापसी करते हुए 20 सीटों पर फतह हासिल की। सोने पर सुहागा, केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए की सरकार बन गई। कांग्रेसी खेमे में एक बार फिर राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर सुगबुगाहट शुरू हुई, लेकिन इंतजार लंबा ही होता गया।
गहलोत ने पहले स्थानीय निकाय और फिर पंचायत चुनाव का बहाना बनाकर राजनीतिक नियुक्तियों को प्रतीक्षा सूची में डाल दिया और सीपी जोशी भी सुस्त हो गए। ऐसा नहीं है कि सीपी जोशी का राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर मानस बदल गया, लेकिन वे पहले खुद भी एक पद चाहते थे, मगर केंद्र में कैबिनेट मंत्री बनने के बाद उनकी बल्ले-बल्ले हो गई। अब स्थिति यह है कि न तो संगठन के कामों में ज्यादा रुचि ले रहे हैं और न ही कार्यकर्ताओं की भागीदारी की बात कर रहे हैं। इस स्थिति में सबसे ज्यादा परेशानी उन नेताओं को हो रही है, जो राजनीतिक नियुक्तियों के मार्फत किसी अच्छे पद की आस लगाए बैठे हुए हैं। उन्हें यह समझ नहीं आ रहा है कि अपनी बात लेकर किसके पास जाएं। मुख्यमंत्री के पास जाते हैं, तो वे सादगी और खर्चों में कटौती की पट्टी पढ़ा देते हैं या देखते हैं कहकर टाल देते हैं और सीपी जोशी के पास जाएं तो वे सबकुछ गहलोत के हाथ में होने का बहाना बनाकर टरका देते हैं। कई नेताओं ने तो अब यह उम्मीद ही छोड़ दी है कि उन्हें कोई पद मिलेगा। सबसे ज्यादा निराशा उन्हें हो रही है, जिन्होंने स्थानीय निकाय और पंचायत चुनाव में यह सोचकर जी तोड़ मेहनत की कि उन्हें कोई अच्छा पद मिलेगा।
अशोक गहलोत ने एकाध राजनीतिक नियुक्ति देकर इसकी आस लगाए बैठे नेताओं की उम्मीदों को और हवा दे दी। पंचायत चुनाव के ऐन बाद डॉ. सुभाष गर्ग की माध्यमिक शिक्षा बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया। गर्ग की नियुक्ति को मजबूरी में लिया निर्णय बताया गया, क्योंकि माध्यमिक शिक्षा बोर्ड के अध्यक्ष का पद एक साल से खाली चल रहा था। इससे पहले शिवचरण माली को भी राज्य खेल परिषद का अध्यक्ष भी मजबूरी में बनाया गया था, क्योंकि वे डॉ. सीपी जोशी के आरसीए अध्यक्ष की कुर्सी की राह में रोड़ा बन रहे थे। हां, महेंद्र कुमावत को राजस्थान लोकसेवा आयोग का अध्यक्ष जरूर बनाया गया। उन्हें गहलोत का करीबी माना जाता है। अभी भी राज्य महिला आयोग, हाउसिंग बोर्ड चेयरमैन, आरटीडीसी चेयरमैन, वित्त आयोग, प्रशासनिक सुधार आयोग, अल्प संख्यक आयोग, मदरसा बोर्ड, हज कमेटी सहित अनेक निगम, बोर्ड और स्वायत्तशासी संस्थाओं में सदस्य आदि की नियुक्ति की जानी है। जिलों में यूआईटी व विभिन्न कमेटियों में सदस्य बनाए जाने हैं।
राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर फिर से सरगर्मी इसलिए बढ़ी हैं, क्योंकि अब राज्य में कोई चुनाव नहीं होने हैं। कयास यह लगाया जा रहा है कि पार्टी के आला नेताओं ने यह तय कर लिया है किस-किसको ‘ओहदा’ देना है। कहा यह भी जा रहा है कि राजनीतिक नियुक्तियां तो एक महीने पहले ही होनी थी, लेकिन मलमास होने के वजह से इसमें देर हो गई। अब मलमास खत्म हा चुका है और कयास यह लगाया जा रहा है कि कभी भी नामों की घोषणा हो सकती है। पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव जर्नादन द्विवेदी की जयपुर यात्रा को भी इससे जोडक़र देखा जा रहा है। वे आए तो केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्रालय की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में थे, लेकिन पार्टी में अंदरखाने यह चर्चा है कि वे राजनीतिक नियुक्तियों को अंतिम रूप देने के मकसद से सोनिया गांधी के दूत के रूप में आए थे। राजनीतिक नियुक्तियों की उम्मीद लगाए बैठे नेताओं ने द्विवेदी के सामने जिस तरह से हाजरी लगाई, उससे भी इसकी पुष्टि होती है।
विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने ‘क्लोज फाइट’ में फतह हासिल कर सरकार तो बना ली, लेकिन डॉ. सीपी जोशी, बी.डी. कल्ला, परसराम मोरदिया, नारायण सिंह, डॉ. चद्रभान, हरेंद्र मिर्धा, रामकिशन वर्मा, भंवर लाल शर्मा, हरिमोहन शर्मा और ममता शर्मा सरीखे कई दिग्गजों को हार का सामना करना पड़ा। इस दौरान गहलोत और सीपी जोशी के बीच पनपे मनमुटाव की चर्चा आम थी। राहुल गांधी के राजस्थान दौरे के समय सीपी जोशी ने ‘अधूरी जीत’ का वक्तव्य भले ही गहलोत पर ‘अपरहैंड’ हासिल करने के लिए दिया हो, पर इसके पीछे स्वयं समेत विधानसभा चुनाव में हारे आला नेताओं को सरकार में ‘एडजस्ट’ करना भी एक ही बड़ी वजह था। जोशी अपनी मुहिम को मुकाम तक पहुंचाते इससे पहले ही लोकसभा चुनाव आ गए। जोशी की तो इन चुनावों में लॉटरी लग गई। विधानसभा चुनावों में एक वोट से मिली हार का सूद समेत हिसाब बराबर कर लिया। सांसद तो बने ही काबीना मंत्री का ओहदा भी मिल गया। वह भी ग्रामीण विकास एवं पंचायतीराज सरीखे अहम मंत्रालय के साथ। राजस्थान में कांग्रेस के निजाम तो वे पहले से ही थे। जोशी ने तो उम्मीद से ज्यादा हालिस कर लिया, लेकिन उनके कद के कई नेता खुद की सरकार होते हुए भी अलग-थलग ही रहे। हालांकि जोशी ने इन्हें भागीदारी दिलाने के प्रयास जारी रखें, पर गहलोत से सुलह के बाद इनमें पुरानी धार देखने को नहीं मिली।
मुख्यमंत्री सिद्धांतत: जोशी के इस तर्क से सहमत हैं कि सरकार में निष्ठावान नेताओं और कार्यकर्ताओं की भागीदारी के बिना जीत अधूरी है, लेकिन वे अभी तक इसे पूरा नहीं कर पाए हैं। हालांकि इसके लिए वे लंबे समय से तैयारी जरूर कर रहे हैं, लेकिन ये अंजाम तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। गौरतलब है कि गहलोत ने पहले पार्टी के आला नेताओं से राजनीतिक नियुक्तियों के लिए नाम मांगे थे और फिर बजट में भी कई नए बोर्ड, निगम व समितियां बनाने की घोषणा कर पार्टी के नेताओं की उम्मीदें हरी कर दी थीं।
सूत्रों की मानें तो गहलोत ने कांग्रेसियों को एडजस्ट करने के लिए तीन कैटेगरी बना रखी हैं। पहली में वे नेता हैं जो वरिष्ठ मानें जाते हैं और जिन्हें किन्हीं कारणों से विधानसभा और लोकसभा चुनावों में मौका नहीं मिला। दूसरी में वे नेता हैं जिनका पार्टी में कद ऊंचा है, लेकिन चुनावों में इन्हें हार का मुंह देखना पड़ा और तीसरी कैटेगरी में वे नेता हैं जो बरसों से पार्टी के लिए काम कर रहे हैं, पर अभी तक उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं सौंपी गई है। इस लिहाज से तो गहलोत ने पहली कैटगरी के नेताओं को एडजस्ट करना भी शुरू कर दिया है। पूर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ पहाडिय़ा की हरियाणा, बनवारी लाल जोशी की उत्तर प्रदेश और कमला बेनीवाल की गुजरात के राज्यपाल के रूप में नियुक्ति को इसी से जोड़ कर देखा जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक पहाडिय़ा, जोशी और बेनीवाल को राजभवन भेजने के बाद आलाकमान सूबे के कई वरिष्ठ नेताओं को इस पद पर भेजना चाहता है, लेकिन इसकी गुंजाइश ज्यादा बची नहीं है।
गहलोत के साथ दिक्कत यह भी है कि विधानसभा चुनाव में हारने वाले कई वरिष्ठ नेताओं का इधर आने के लिए प्रयास कर रहे हैं। लंबे अनुभव और बड़े कद के कारण ये नेता राजनीतिक नियुक्तियों में दिलचस्पी नहीं ले रहे हैं। इन नेताओं को अपने हाल पर छोड़ दें तो विभिन्न बोर्ड और निगमों में होने वाली नियुक्तियों के लिए नाम छंटनी करना गहलोत के लिए आसान नहीं है। सूत्रों के अनुसार मुख्यमंत्री चुनाव हारने वाले सभी नेताओं को राजनीतिक नियुक्ति देने के मूड में नहीं है। उनका मानना है कि इससे आम कार्यकर्ताओं में गलत मैसेज जाएगा। इससे बचने के लिए उन्हीं नेताओं को पद का तोफहा देना तय हुआ है जो विधानसभा चुनाव हारने के बाद भी पार्टी के प्रति पूरी तरह से वफादार रहे हों। ये नेता लोकसभा और बाद में हुए चुनावों में कितने सक्रिय रहे इस पर गहलोत के सिपेहसालारों ने इस पर पैनी नजर रखी थी। इन नेताओं की सक्रियता को मापने के लिए ही नियुक्तियों में जानबूझ कर विलंब किया जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक सरकार की ओर से किए जा रहे इस विलंब से कांग्रेसी नेताओं में अंदर ही अंदर गुस्सा बढ़ रहा है और वे आलाकमान से शिकायत करने की योजना बना रहे हैं।
राजनीतिक नियुक्तियों के अलावा कई विधायक अभी भी मंत्री पर मिलने की आस लगाए बैठे हैं। इसके अलावा पहली बार विधायक बने नेता भी मंत्री बनने के लिए लॉबिंग कर रहे हैं। ये नेता कई बार मुख्यमंत्री समेत पार्टी के आला नेताओं से कह चुके हैं कि मंत्रिमंडल में ‘फ्रेशर्स’ को भी मौका मिलना चाहिए। अपने मंत्रिमंडल के सहयोगियों की सुस्त चाल से हैरान गहलोत भी इनमें से कईयों को मंत्री बनाना चाहते हैं, पर उन्हें डर इसी बात का है कि इससे सिर-फुटव्वल की स्थिति पैदा न हो जाए। किसी एक को मंत्री बनाने पर पहली बार चुनकर आए सभी विधायक इस तरह की मांग उठा सकते हैं। गौरतलब है कि इस बार राजस्थान विधानसभा में ऐसे विधायकों की संख्या ज्यादा है जो पहली बार जीतकर आए हैं। मुख्यमंत्री गहलोत के लिए संगठन में लंबित चल रहे मसलों को जल्द सुलझाना जरूरी है। केंद्र में मंत्री बनने के बाद प्रदेशाध्यक्ष डॉ. सीपी जोशी संगठन पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पा रहे हैं और संगठन सुसुप्त अवस्था में पड़ा है। जोशी ने सार्वजनिक रूप से यह कह दिया है कि वे अब अध्यक्ष बने रहना नहीं चाहते हैं। आलाकमान को नया प्रदेशाध्यक्ष भी तय करना है। यह बात पार्टी के शीर्ष नेताओं के ध्यान में है कि स्वयं की सरकार होने के बाद भी कांग्रेसी कार्यकर्ता ज्यादा सक्रिय दिखाई नहीं देते हैं। सूत्रों के मुताबिक गहलोत ने यह बात आलाकमान तक पहुंचा दी है। पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व ने गहलोत से प्रदेशाध्यक्ष के लिए नाम भी मांगे हैं, लेकिन फिलहाल उन्हें कोई नाम नहीं सूझा है। वे चाहते हैं कि कोई ऐसा नेता अध्यक्ष बने जिससे उनकी ‘ट्यूनिंग’ तो अच्छी हो ही सूबे की सियासी गणित में भी कोई गड़बड़ी नहीं हो। विश्लेषक ‘ब्राह्मण के बदले ब्राह्मण’ फॉर्मूले पर सहमति होना बता रहे हैं। असल में उन्हें प्रदेशाध्यक्ष की बजाय उन्हें राजनीतिक नियुक्तियों के मसले को सुलझाने में ज्यादा दिक्कत आ रही है और इसी के चलते इनमें देरी हो रही है।


