वरिष्ठ पत्रकार वीरेंद्र सेंगर जाने माने राजनीतिक विश्लेषक हैं और लम्बे समय से राजनीतिक पत्रकारिता कर रहे हैं. आजकल हिन्दी दैनिक डीएलए के सम्पादक हैं. अन्ना हजारे के आन्दोलन और मौजूदा दौर के राजनीति से जुड़े मुद्दों पर विपिन उपाध्याय ने उनसे लम्बी बातचीत की. यहाँ प्रस्तुत हैं उस बातचीत के प्रमुख अंश

अन्ना हजारे एक तरफ तो किसी राजनीतिक पार्टी से सरकार रखने की बात से इनकार करते हैं, वहीं दूसरी तरफ वह राजनीतिक दलों के नेताओं से मुलाकात कर रहे हैं इसे किस सन्दर्भ में लिया जाना चाहिए?

अन्ना हजारे और उनकी टीम जो कदम उठा रही है वह एकदम सही हैं। क्योंकि उनकी बात को लेकर आलोचना हो रही थी कि लोकपाल कानून को बनाने के लिए जो कानूनी प्रक्रिया है उसे हाशिये पर रखना चाह रहे हैं। इससे कहीं न कहीं लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बाधा पड़ सकती है। यह बात अन्ना हजारे की समझ में आयी और सरकार पर दवाब बनाने के लिए 30 जुलाई की सर्वदलीय बैठक हो रही है। उसके पहले अन्ना हजारे अपना पक्ष मजबूत रखने के लिए अलग- अलग राजनीतिक दलों के नेताओं से मिल रहे हैं। मेरे ख्याल से यह बिलकुल सही है इससे शायद वह अपनी बात नेताओं को समझा सकें और उन्हें जन लोकपाल बिल पर अपने साथ कर सकें। इससे कहीं भी किसी को यह नहीं लगना चाहिए कि वह राजनीति में शामिल होना चाहते हैं। अन्ना बस इतना चाहते हैं जो सर्वदलीय बैठक होने वाली है उसमें उनका पक्ष मजबूत बने और वह अपनी बात से सरकार पर जन लोकपाल बिल को लेकर दवाब बना सकें। इसके साथ ही वह ऐसा इसलिए भी कर रहे हैं जिससे सर्वदलीय बैठक में राजनीतिक दल कोई बहानेबाजी न कर सकें और न ही टीम अन्ना को गलत ठहरा सकें। मुझे लगता है यह कदम उनका सकारात्मक कदम है इससे सरकार पर दवाब बनेगा।

अन्ना हजारे और बाबा रामदेव के आंदोलन का कोई हल निकल पाएगा या सरकार इनको कामयाब नहीं होने देगी?

देखिए बाबा रामदेव और अन्ना हजारे के आंदोलन का सरकार पर बहुत ज्यादा दवाब बना हुआ है। सरकार अपने आप को बचाने की भरपूर कोशिश कर रही है। बाबा ने काले धन पर और अन्ना हजारे ने जन लोकपाल बिल पर सरकार को दोनों ओर से घेर रखा है। इन लोगों के ये जो आंदोलन हैं कोई अपने स्वार्थ के लिए नहीं है यह देश की जनता के लिए ऐसा कर रहे हैं इसलिए जनता का इन्हें फुल सपोर्ट है। सरकार ने इन्हें शांत करने की कोशिश तो बहुत कर रही है लेकिन उसकी एक नहीं चल रही। जाहिर है इसका दवाब तो सरकार पर बना हुआ है। यह माना जा सकता है कि अगर सरकार इनकी सारी मागें नहीं मानती तो कुछ मागें तो मानेगी जो न से तो बेहतर होंगी। रही बात जनता की तो वह समझ चुकी है कि सरकार पर दवाब बनाकर ही कुछ हासिल किया जा सकता है।

प्रधानमंत्री ने प्रिंट मीडिया के संपादकों से बात की तो वह खुद को बहुत सीधा-साधा बताने की कोशिश कर रहे थे। इसे क्या समझा जाए?

देखिए कुछ समय पहले प्रधानमंत्री ने इलेक्ट्रोनिक मीडिया के संपादकों के साथ चर्चा की थी। इस बार प्रिंट मीडिया के संपादकों से मिले और चर्चा की। इसमें वह साफ कह रहे थे कि मंत्रियों पर भरोसा करना मुझे भारी पड़ गया। जैसा मुझे लगता है, इसमें कोई दो राय नहीं है कि मनमोहन सिंह बहुत ही समझदार और सच्चे प्रधानमंत्री हैं। लेकिन परिस्थितियों के आगे किसकी चली है। ऐसा ही इनके साथ हुआ है। प्रधानमंत्री अपनी बातों से साफ करना चाहते थे कि जो भी हुआ है उसमें उनकी कोई भूमिका नहीं है और न ही उनके इशारे पर कुछ हुआ है। अब मंत्री को काम सौंपा जाता है वह क्या करता है कैसे करता है यह बाद में सामने आता है तो एक्शन लिया जा रहा है। प्रधानमंत्री की छवि बिलकुल साफ सुथरी है इसी को वह मीडिया के माध्यम से जनता के सामने लाना चाहते हैं। उन्होंने चर्चा के दौरान कहा कि वह आगे भी इस तरह की चर्चा करेंगे ताकि जनता में उनके प्रति भ्रामक स्थिति न पैदा हो।

मौजूदा केंद्र सरकार भ्रष्टाचार पर कितनी सजग है। क्या उसके द्वारा उठाए गए कदम सही हैं।

इस सवाल के बारे में कुछ भी कहना मुश्किल होगा क्योंकि सरकार की जो साख उसकी क्रेडिबिलिटी और नीयत पर ऐसा कुछ नहीं बचा जिस पर आज के टाइम में भरोसा किया जाए। साफ बात यह है कि सरकार इस समय दवाब में है क्योंकि जनता में जागरूकता आई है और फिर तमाम तरह से भ्रष्टाचार के खिलाफ मुहिम छिड़ी हुई है। देश की वर्तमान और आने वाली पीढ़ी के लिए यह अच्छे संकेत हैं। लेकिन सरकार द्वारा जो कदम उठाए जा रहे हैं उससे जनता के बीच आस जरूरी पैदा हुई है। सबसे बड़ी बात यह कि उसको यह कदम उठाने जरूरी हो गए थे क्योंकि केंद्र सरकार पर अन्ना हजारे व बाबा रामदेव न दवाब बना रखा है। इसके साथ ही विपक्ष ने इस बार सरकार की खूब फजीहत की है। अब कहना यह है कि जो भी दवाब बना रहे हैं वह पूरी ईमानदारी से सरकार पर कार्रवाई के लिए दवाब बनाते रहें।

क्या जन लोकपाल बिल के दायरे में प्रधानमंत्री और मुख्य न्यायाधीश को आना चाहिए? क्या संसद की कार्यवाही में लोकपाल का हस्तक्षेप होना चाहिए।

यह सवाल थोड़ा जटिल है क्योंकि अपने यहां कुछ ऐसे प्रयोग हुए हैं जो कि असफल रहे हैं और प्रधानमंत्री देश का मुखिया होता है। उसके खिलाफ कोई कारगर कदम उठाना या जन लोकपाल में लाना थोड़ा अटपटा लगता है। इसके कुछ और उपाए भी हो सकते हैं और संसद की कार्यवाही में हस्तक्षेप का मतलब है संविधान बदलना और यह बात कि लोकपाल को संसद की कार्यवाही में हस्तक्षेप करने का अधिकार होना चाहिए तो यह बिलकुल संविधान बदलने वाली बात है। संसद की कार्यवाही के लिए कई लोग जिम्मेदार होते हैं इसमें स्पीकर, प्रधानमंत्री और सांसद शामिल हैं। उसमें कोई बाहरी संस्था या लोकपाल जाकर हस्तक्षेप करे तो यह सवाल बहस का है मुझे लगता है इन मुद्दों पर बहस होनी चाहिए। इसके साथ ही टीम अन्ना को ज्यादा जिद नहीं करनी चाहिए क्योंकि एक अहम सवाल यह है कि आप मुख्य न्यायाधीश, प्रधानमंत्री को लोकपाल में लाना चाहिए तो एक सवाल बहुत अहम उठता है कि आप लोकपाल कहां से ढ़ूंढे के लाएंगे, जिस पर कोई डाउट्स न हो जो शक के दायरे से बाहर हो? ऐसे कुछ सवाल हैं जिन पर बहस होनी चाहिए और अन्ना को इतना दवाब बनाना चाहिए कि सरकार काफी कुछ करने को तैयार हो जाए।।।।