इतिहास के अंधे मोड़ पर जब कॉरपोरेटी फासीवाद आक्रामक रूप से मुखर हो, कुछ सवालों पर विमर्श
इतिहास के अंधे मोड़ पर जब कॉरपोरेटी फासीवाद आक्रामक रूप से मुखर हो, कुछ सवालों पर विमर्श
ज्ञान, शिक्षा तथा वर्चस्व : नई शिक्षणीति का राजनैतिक अर्थशास्त्र
ईश मिश्र
“हर ऐतिहासिक युग में शासक वर्ग के विचार ही शासक विचार होते हैं, यानी समाज की भौतिक शक्तियों पर जिस वर्ग का शासन होता है वही बौद्धिक शक्तियों पर भी शासन करता है। भौतिक उत्पादन के साधनों जिनकी नियंत्रक में होते हैं, बौद्धिक उत्पादन के साधनों पर भी उसी का नियंत्रण रहता है, जिसके चलते सामान्त्य की बौद्धिक उत्पादन के साधनों के विचाअरों के आधीन रहते हैं।”
(कार्ल मार्क्स, जर्मन विचारधारा)
ज्ञान का इतिहास शिक्षा के इतिहास से पुराना है। आदिम क़ुनबों तथा क़बीलों में ज्ञान मानने जाने वाले क़बीलों का मुखिया या पुजारी होते थे। मानवीय जाति ने भाषा; आग; धातुविज्ञान; पशुपालन; विनिमय/विपणन तथा आत्मघातीय युद्ध का ज्ञान किसी भी शिक्षा व्यवस्था के पहले का है। निज़ी सम्पत्ति के आगमन के बाद क़बीलों का ज्ञान गहने की प्रक्रिया के दौर में, सामूहिक सम्पत्ति के बंटवारे में ज्ञानियों की चतुराई से सामाजिक वर्ग-विभाजन के बाद वर्चस्वशाली वर्गों ने ज्ञान को अपने वर्गहित में परिभाषित किया, उसपर एकाधिकार जमाने के लिए, देशकाल के अनुकूल शिक्षा प्रणालियों की शुरुआत की। मार्क्स के उपरोक्त उद्धरण से स्पष्ट है कि पूंजीवादी महज उपभोक्ता माल का ही नहीं, विचारों भी उत्पादन करता है। शासक वर्ग के विचारों को राजकीय के वैचारिक उपकरणों से अंतिम सत्य बताता है। यह विचार प्रकाशारम्भ से यथास्थिति को यथासंभव सर्वाधिक प्रमाणित करते हैं। इस तरह की मिथ्या चेतना का निर्माण ज़रूरी नहीं कि चल-कपट के भाव से किया जाता हो। प्रायः ये बुद्धिजीवी खुद को सही मानने लगते हैं। ये तमाम तर्क-कुतर्कों से बताता है कि पूंजीवादी...


