इमरान खान बच्चों को बख्श दो, क्या फर्क रह जाएगा बगदादी और इमरान में
इमरान खान बच्चों को बख्श दो, क्या फर्क रह जाएगा बगदादी और इमरान में
मनोज शर्मा
कभी-कभी हम सिक्के के एक पहलू को देखकर ये भूल जाते हैं, कि इसका दूसरा पहलू भी है, जो पहले के बिल्कुल विपरीत भी हो सकता है। मुझे याद है अपनी जवानी के दिनों में मैं इमरान खान का बहुत बड़ा फैन था। इंडिया का पाकिस्तान से हारना मुझे भी बुरा लगता था, पर इमरान खान को मैं बहुत पसंद करता था। मैं कायल था उनकी कप्तानी का। इमरान खान एक बॅार्न लीडर थे, उन्होंने ही पाकिस्तान को न केवल लड़ना सिखाया, बल्कि जीतना भी।
याद है 1990 में मैं उनकी जैसी हरी कैप खरीद कर लाया था। मुझे स्टार वाली कैप भारत में तो नहीं मिल सकती थी, तो मैने पांच रूपये का एक स्टार वाला की-रिंग खरीदा और उसका स्टार निकाल कर अपने गांव के शमशाद टेलर से दो रूपये देकर उसे कैप में सिलवाया। मैं उस कैप को लगाकर खुद को इमरान से कम नहीं समझता था। बाद में किसी मनहूस ने वो कैप चुरा ली।
खैर मेरे लिए इमरान खान हमेशा एक आईडियल थे, हीरो थे, जिसने ज़िन्दगी की किसी भी जंग में हार नही मानी, चाहे वो क्रिकेट हो या अपनी मां शौकत खानम मैमोरियल ट्रस्ट का चैरिटेबिल कैंसर हास्पिटल, और जब राजनीति में आये, तो मुझे उनसे बहुत उम्मीद थी। मैं चाहता था कि वो पाकिस्तान के राष्ट्रपति बनें। पर ये सिक्के का एक पहलू था।
दो दिन पहले उन्होंने अपना दूसरा पहलू दिखाया, जिसने मेरे तीस साल के फैनडम को चकनाचूर कर गया। इमरान खान की राजनीतिक पार्टी तहरीक-ए-पाकिस्तान की ओर से पाकिस्तान में बच्चों के कार्टून डोरेमॅान और छोटा भीम को रोक लगाने की मांग की गयी।
आपको लगेगा कि इसमें बुराई क्या है?
कोई बुराई नही, भारत में भी आये दिन किसी न किसी कार्टून चैनल को बंद करने की मांग होती रहती है, पर उन्होने जो तर्क दिया, वो बहुत दुखद था। उनका मानना है कि इससे उनके बच्चे हिन्दी सीख रहे हैं, जो कि उनकी संस्कृति के लिए खतरा है।
क्या वाकई कोई भाषा किसी देश की संस्कृति के लिए खतरा हो सकती है।
मेरा व्यक्तिगत तौर पर मानना है कि बिल्कुल हो सकती है, किन्तु देखना यह होगा कि वो भाषा कौन सी है। हमला तो दोनों देशों की संस्कृति पर हुआ है। अंग्रेजी का हमला, जिसने सब कुछ तहस नहस कर दिया। पर उसके खिलाफ दोनो ही देशों में कोई आवाज नहीं उठा रहा। हमें एक दूसरे से लड़ने से फुर्सत हो, तब ना। हिन्दी और ऊर्दू में कोई बहुत ज्यादा फ़र्क नहीं है, दोनो ही सगी बहनें हैं, जिनकी औलादें अब एक दूसरे से लड़ रही हैं।
हैरानी इस बात की है कि ये बात कोई और नहीं बल्कि उस इमरान खान की पार्टी कह रही है, जिसकी पूरी शिक्षा अंग्रेजी में हुई।
जिन्होंने शायद कभी ऊर्दू मीडियम स्कूल की शक्ल नहीं देखी। जिसे शादी के लिए लड़की भी लंदन में मिली। तब उन्हें कभी उस अंग्रेजी से उनकी संस्कृति को खतरा महसूस नहीं हुआ। जिन्होंने खुद पूरी ज़िन्दगी अंग्रेजी को चाहा, आज वो ऊर्दू का दर्द महसूस कर रहा है। यदि उन्हें ऊर्दू का अदब होता तो शायद ये बात ही न कहते।
ऊर्दू में एक मिठास है, तहज़ीब है, मुहब्बत है।
नफरत के लिए कोई जगह ही नहीं है ऊर्दू में। पर ऑक्सफोर्ड में पढ़ने वाले क्या समझेंगे ऊर्दू और हिन्दी की मुहब्बत को, जो दोनो एक दूसरे में इस तरह समा गयी हैं, कि कोई चाह कर भी अलग नहीं कर सकता।
इमरान खान बच्चों को अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षा का शिकार बना रहे हैं।
अरे भाई इन मासूमों को तो बक्श दो। क्या इमरान खान भी नफरत का बीज इन बच्चों के दिलों में बोना चाहते हैं, यही काम तो तालिबान या आई एस आई एस कर रहे हैं, तो क्या फर्क रह गया इमरान और बगदादी में।
दो साल पहले ज़िन्दगी चैनल शुरू हुआ।
हम भी देखते हैं और सच कहें तो हमारे घर में कोई दूसरा चैनल चलता भी नहीं है। सच मानें उसकी कहानियों में इतनी अपनायित महसूस होती है, कि हमें कभी इस बात का अहसास ही नहीं हुआ कि हम पाकिस्तानी सीरियल देख रहे हैं और यदि दिल की बात कहूं तो शायद पाकिस्तान आज मेरे दिल के और करीब है, जो थोड़ी बहुत गलतफहमियां थीं भी, वो ज़िन्दगी चैनल ने दूर कर दी।
कभी कभी तो ये देख के हैरानी होती है कि पाकिस्तानी सीरियल्स में ऐसे-ऐसे हिन्दी के शब्द इस्तेमाल होते हैं, जो हम हिन्दुस्तानी आम तौर पर नही करते हैं। हमें कभी ऊर्दू से न तो अपनी संस्कृति पर हमला होता दिखायी दिया और न ही हमने अपने बच्चों को इससे दूर रखा, बल्कि यदि कोई दूसरी ज़बान सीखनी है, तो ऊर्दू से बेहतर कोई ज़बान नहीं हो सकती।
इमरान खान ऊर्दू से उतना ही दूर हैं, जितना लंदन से लाहौर
भाषा हमारी अभिव्यक्ति का माध्यम है, जो हमारे सोचने के तरीके को स्वरूप प्रदान करती है और निर्धारित करती हैं कि हम क्या क्या सोच सकते हैं। मेरी भाषा की सीमा मेरी अपनी दुनिया की सीमा भी है। हिन्दी पर ये वक्तव्य इमरान खान का व्यक्तिगत तो हो सकता है, पर ऊर्दू बिरादरी का नहीं हो सकता, क्योंकि इमरान खान ऊर्दू से उतना ही दूर हैं, जितना लंदन से लाहौर दूर है या शेक्सपियर से गालिब दूर है।
इमरान भाई यदि इन कार्टूनों के बहाने बच्चों के दिल करीब आते हैं, तो आने दो, इसे मत रोको। ये बच्चे ही दोनों देशों का मुस्तकबिल हैं। हो सकता है कि कल शायद इसी बहाने ये बच्चे हमारी नफरत की विरासत का झंडा उठाने से इंकार कर दें और जो काम हम और आप 70 सालों में न कर पाये, शायद 10-15 साल बाद आने वाली ये पीढ़ी कर दे।
और शायद कल बच्चे कहें कि
मेरे सामने वाली सरहद पे, कहते हैं दुश्मन रहता है,
पर गौर से जब देखा उसको, वो तो मेरे जैसा दिखता है।


