तानाशाही और फासीवाद का रास्ता यहीं से शुरू होता है मिस्टर आप
सत्ता की अंधी गली के अलावा कुछ नहीं हो सकती विचारधारा और सिद्धान्त विहीन राजनीति की मंजिल
‘आप के नेता कांग्रेस के मौसेरे, भाजपा के चचेरे और कॉरपोरेट के सगे भाई हैं’ से आगे की कड़ी...

कॉरपोरेट पॉलिटिक्स की नई बानगी-4
‘महान’ मध्यवर्ग, जो नवउदारवाद के पिछले 25 सालों में खूब मुटा गया है, आम आदमी के नाम पर अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहता है
प्रेम सिंह

कहा जाता है सावन के अंधे को सब हरा हरा-हरा नजर आता है। सत्ता के अंधे आप के नेताओं का भी यही हाल है। वे हर इंसान और घटना को चुनाव के चश्मे से देखते हैं। दुर्गाशक्ति नागपाल का निलंबन हुआ तो बिना उनसे मिले उन्हें आप से चुनाव लड़ने का प्रस्ताव कर दिया। पार्टी के पंजीकरण से पहले ही दिल्ली विधानसभा की सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी गयी। तभी से कहीं मुसलमान उम्मीदवार तलाशा जा रहा है, कहीं दलित, कहीं जाट, कहीं पंजाबी, कहीं सिख। दान-दाता तो तलाशे जा ही रहे हैं। दिल्ली में आप से चुनाव लड़ने के लिये कैसे-कैसे लोगों को किस-किस तरह से एप्रोच किया गया है और किया जा रहा है, उसकी पूरी कहानी छप जाये तो वह एक अच्छा राजनीतिक प्रहसन होगा।

हमें एक साथी ने बताया कि प्रकाश झा की फिल्म ‘सत्याग्रह’ में आम आदमी पार्टी की टोपी, जिस पर ‘मैं आम आदमी हूं’ लिखा होता है, पहने लोग दिखाए गये हैं। यह भी पता चला कि थियेटर के बाहर आप के कार्यकर्ता टोपी लगा कर खड़े थे। हो सकता है यह दिखाने के लिये केजरीवाल और प्रकाश झा के बीच कुछ धन का लेन-देन हुआ हो। या प्रकाश झा बहुत-से भले लोगों की तरह कायल हों कि ‘मैं आम आदमी हूं’ की टोपी पहनने वाले लोग वाकई आम आदमी की भलाई का काम करने वाले हैं। जिस तरह से आप के नेता सब जगह टोपी का प्रदर्शन करते हैं, वह विचारणीय है। राजनीतिक पार्टी के विशेष कार्यक्रमों में टोपी लगाना समझ में आता है। हालांकि, तब भी टोपी न लगाई जाये तो उससे कुछ फर्क नहीं पड़ना चाहिए। क्योंकि टोपी जिस विचार का प्रतीक है, उसके प्रति आंतरिक दृढ़ता है तो टोपी यानी दिखावे की जरूरत नहीं रह जाती। डॉ. लोहिया पार्टी कार्यकर्ताओं के लाल टोपी पहनने के खिलाफ थे। उनका मानना था कि क्रांति का विचार नेता-कार्यकर्ता के मन में होना चाहिए। दिखावे से शुरू होने वाली राजनीति का अंत अंततः पूर्ण पाखंड में होगा।

लाखों-करोड़ों में खेलने वाले लोग जब ‘मैं आम आदमी हूं’ की टोपी लगाते हैं, तो उसका पहला और सीधा अर्थ गरीबों का उपहास उड़ाना है। ‘आम आदमी’ की अवधारणा पर थोड़ा गम्भीरता से सोचने की जरूरत है। आजादी के संघर्ष के दौर में और आजादी के बाद आम आदमी को लेकर राजनीतिक और बौद्धिक हलकों में काफी चर्चा रही है, जिसका साहित्य और कला की बहसों पर भी असर पड़ा है। साहित्य में आम आदमी की पक्षधरता के प्रगतिवादियों के अतिशय आग्रह से खीज कर एक बार हिंदी के ‘व्यक्तिवादी’ साहित्यकार अज्ञेय ने कहा कि ‘आम आदमी आम आदमी ... आम आदमी क्या होता है?’ उनका तर्क था कि साहित्यकार के लिये सभी लोग विशिष्ट होते हैं। राजनीति से लेकर साहित्य तक जब आम आदमी की जोरों पर चर्चा शुरू हुई थी, उसी वक्त आम आदमी का अर्थ भी तय हो गया था। उस अर्थ में गांधी का आखिरी आदमी कहीं नहीं था। आम आदमी की पक्षधरता और महत्ता की जो बातें हुईं, वे शुरू से ही ‘मेहनत-मजदूरी’ करने वाले गरीब लोगों के लिये नहीं थीं।

मध्यवर्ग ने आम आदमी की अवधारणा में अपने को ही फिट करके उसकी वकालत और मजबूती में सारे प्रयास किये हैं और आज भी वही करता है। आम आदमी मध्यवर्गीय अवधारणा है। उसका गरीब अथवा गरीबी से संबंध हो ही नहीं सकता था। क्योंकि मध्यवर्ग को अपने केंद्र में लेकर चलने वाली आधुनिक औद्योगिक सभ्यता का यह वायदा रहा है कि वह किसी को भी गरीब नहीं रहने देगी। दूसरे शब्दों में, जो गरीब हैं, उन्हें दुनिया में नहीं होना चाहिए। भारत का यह ‘महान’ मध्यवर्ग, जो नवउदारवाद के पिछले 25 सालों में खूब मुटा गया है, आम आदमी के नाम पर अपनी स्थिति और मजबूत करना चाहता है। वह सब कुछ अपने लिये चाहता हैं, लेकिन गरीबों का नेता होने की अपनी भूमिका को छोड़ना नहीं चाहता। इस पाखंड ने भारत की गरीब और आधुनिकता में पिछड़ी मेहनतकश जनता को अपार जिल्लत और दुख दिया है। भारत का मध्यवर्ग मुख्यतः अगड़ी सवर्ण जातियों से बनता है। यही कारण है कि भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन और उससे निकली पार्टी का वर्णाधार अगड़ी सवर्ण जातियाँ हैं, जिनका साथ दबंग पिछड़ी जातियाँ देती हैं। इसी आधार पर आप के नेता युवकों का आह्वान करते हैं कि वे जातिवादी नेताओं को छोड़ कर आगे आएं और मध्यवर्ग नाम की नई जाति में शामिल हों। यहां उनकी जाति भी ऊंची होगी और वर्ग-स्वार्थ भी बराबर सधेगा।

यह देख कर काफी हैरानी होती है कि कई साथी आम आदमी पार्टी से आशाएं पाले हैं। उन्हें कांग्रेस और भाजपा के बाद आप ही नजर आती है। ऐसा भी नहीं है कि उनमें सभी ‘आम आदमी’ की तरह देश के लोकतांत्रिक वामपंथी आन्दोलन और पार्टियों से अनभिज्ञ हों। उनमें शिक्षक और पत्रकार भी शामिल हैं। भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन, जिसे यही लोग चला रहे थे, की पूरी हवा निकल जाने के बावजूद आप पार्टी के जीतने और उससे कुछ होने की उम्मीद रखने वालों के बारे में यही कहा जा सकता है कि ज्यादातर नागरिक समाज में राजनीतिक मानस का लोप हो गया है। यही कारण है कि कॉरपोरेट पूँजीवाद की पक्षधर राजनीति की जगह तेजी से बढ़ती जा रही है और उसका विरोध करने वाली पार्टियों को पैर टेकने तक की जगह मुश्किल से मिल पाती है।