महेश राठी
विचित्र विडम्बना है कि पश्चिमी एशिया की जमीन पर फिर से बर्बर नरसंहार की इबारत लिखी जा रही है और पूरा विश्व समुदाय इस पर खामौश है, लगता है कि मानो पूरी दुनिया को इस्राइल से हमदर्दी रखने वाली सोच ने लील लिया है। पश्चिमी एशिया में शान्ति फिर से खतरे में है। इस्राइली राजकीय आतंकवाद फिलिस्तीन पर कहर बरपाते हुए उसकी स्वायत्तता संप्रभुता व स्वतंत्र आस्तित्व को नकार व ललकार रहा है। इस्राइली हमले जानबूझ कर गाजा के नागरिकों व नागरिक ठिकानों को निशाना बनाकर उन्हें घ्वस्त कर रहे है। गाजा पर यह इस्राइली हमला ना केवल फिलिस्तीन के अस्तित्व को चुनौती है वरन् इस क्षेत्र में वर्षों से शान्ति के लिए प्रयासरत दुनिया के तमाम देशों की शान्तिपूर्ण सह अस्तित्व की सोच और कामना को भी खुली चुनौती ही है। फिलिस्तीन पर यह हमला फिलिस्तीनी स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत् दो विरोधियों अल फतह और हमास की हालिया एकता से उपजी बौखलाहट का नतीजा है।
फिलिस्तीन स्वतंत्रता के ऐसे दो पैरोकार जा परस्पर विरोधी भी थे और जिनका परस्पर विरोध एवं संघर्ष इस्राइल को निश्चिंतता की नींद सुलाता था, उनकी एकता से इस्राइल को बौखलाना स्वाभाविक ही था। दो परस्पर विरोधियों की यही एकता आधारभूत रूप से आक्रामक और साथ ही आतंक की ताकत पर मध्यपूर्व में अपना वर्चस्व बनाये रखने वाले देश के इस बर्बर और अमानवीय आक्रमण का कारण है।
फिलिस्तीन पश्चिमी एशिया का एक बेहद कमजोर राष्ट्र है, जो निरंतर अपने एक स्वतंत्र व सम्प्रभु राष्ट्र होने की लड़ाई लड़ रहा है। इस्राइल के उदय के साथ ही शुरू हो गये इस सत्त संघर्ष में मरते हुए जीने के इस फिलिस्तीनी संघर्ष का निकट भविश्य में कोई अंत नजर नही आता है। इस्राइली राजकीय आतंकवाद के कारण उसकी स्थापना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि व विकास की विशेश परिस्थितियों में निहित है।
गौरतलब है कि इस्राइल की स्थापना जियनवादी आतंकी संगठनों द्वारा की गई जिसमें इरगून, हगाना और स्ट्रेन मुख्य भूमिका में थे। इस्राइल की स्थापना से पहले ये संगठन फिलस्तीन के भीड़ भरे बाजारों, कैफे, दुकानों व बसों में बम विस्फोट करके आतंक पैदा करते रहे हैं। इस्राइली राज्य की स्थापना से पहले ये संगठन एवं इनके मुखिया बडे हत्याकांडों व युद्ध अपराधों के रचयिता थे। निहत्थे फिलस्तीनियों के विरूद्ध दर यासीन, क्रुक कासिम, तान्तुरा, साबरा और शातिला के नरसंहारों से लेकर अभी तक की संहारक आर्थिक व वित्तीय फिलस्तीनी नाकेबंदी में इन नेताओं की भूमिका जग-जाहिर है। 1944 में काहिरा में ब्रिटिश मंत्री की हत्या से लेकर येरूशलम के होटल में बम काण्ड तक अनगिनत नरसंहारों में इस्राइली आतंकवादी, राजनेताओं के हाथ रहे हैं। पहले इस्राइली प्रंधानमंत्री डेविड बेन गुरियॉन स्थापित आतंकवादी रह चुके हैं। 1948 में यहूदी देश इस्राइल की स्थापना से पहले शेरॉनवादी नारा ‘‘बिना लोगों की जमीन बिना जमीन के लोगो के लिए‘‘ इस्राइली घृणास्पद महत्वकांक्षा व उनकी आतंकी मानसिकता व मन्सूबों को उजागर करता है।
याद रहे इस्राइल की स्थापना 500 फिलस्तीनी गांव व कस्बों की नरसंहारक तबाही पर हुयी है। इस्राइल की स्थापना के बाद इन्ही यहूदी आतंकी संगठनों ने संगठित होकर इस्राइली सेना का रूप लिया अर्थात स्वच्छन्द, निरंकुश, हिसंक, स्वतंत्र आतंकवादी अब वैतनिक या किराये के राजकीय आतंकी हो गये। आतंक अब इस्राइली सेना में साकार होकर पड़ोसी अरब देशों को आतंकित करता रहा है। निहत्थे लोगों के कत्ल कर रहा है, उनके घरों को घ्वस्त कर रहा है, खेतों से फसल खुरच रहा है, उनके अमन-चैन पर निशाने साध रहा है। युद्ध अपराधी व जनसंहारों के लिए प्रतिबद्ध पूर्व आतंकवादी सेना से आशा भी क्या की जा सकती है।
1948 के पूर्व ऐतिहासिक फिलस्तीन का मात्र 22 फीसदी भू-भाग फिलीस्तीन के पास है। 1992 ओस्लो शान्ति समझौते के बाद फिलिस्तीन को आर्थिक, वित्तीय व सामरिक रूप से नाकेबंदी व किसी शहर की नगरपालिका से भी कम अधिकारों वाला अपना महज 22 फीसदी भाग देश के नाम पर मिला। उस पर भी इस्राइली आतंकी राज्य की रणनीति व कार्यनीति के रूप में लगातार जारी पूर्वनियोजित नरसंहार। फिलीस्तीन पिछले 58 वर्ष से इस्राइली बर्बर आतंकी कब्जे में है, यानि इतिहास का सबसे लम्बा एवं भयावह सैनिक कब्जा। केवल फिलीस्तीन नहीं लेबनान के दक्षिणी हिस्से का काफी बडा भू-भाग भी इस्राइल के कब्जे में रहा है। इस सबके लिए इस्राइल ने संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव 194 सहित अनेकों अंतर्राष्ट्रीय कानूनों को अनदेखा किया है। असल में इस्राइल की पड़ोसी अरब देशों के साथ शान्ति समझौतों में कोई दिलचस्पी नहीं है उसका एकमात्र हवाई गोल व लक्ष्य नील से फरात तक एक महानतम यहूदी साम्राज्य बनाने में है और उसकी इस मुहिम में उसके साथ है अमेरिकी सामरिक सहयोग व यहूदी धनकुबेरों के आधिपत्य वाला पश्चिमी मीडिया। संयुक्त राष्ट्र के शान्ति समाधानों वाले दसियों प्रस्तावों व ढेरों नियमों को धता बताने वाले इस्राइल की ओर से कभी कोई शान्ति का प्रस्ताव नहीं दिया गया बल्कि आंशिक व व्यापक हमले, धमकी पूर्ण आश्वासन व औपनिवेशिक प्रसार ही उसकी नीतियों का सार रहा है। वास्तव में इस्राइली नागरिकों का विकास ही फिलस्तीन व अरब की प्रत्येक वस्तु के विरूद्ध एक घृणास्पद सांस्कृतिक वातावरण में होता है।
घृणा का यह प्रशिक्षण अभियान इस्राइली नागरिकों के बचपन से उनकी प्राथमिक शिक्षा के साथ शुरू होता है। यह अभियान उनमें धार्मिक उन्माद, आक्रामकता व घृणा का विस्तार करता है। इस्राइली साहित्य अरब व मुस्लिमों को लुटेरा, हमलावर व यौन उन्मादी जीवों के रूप में महिमा मण्डित करने वाले अर्नथकारी व्याख्यानों से भरा पड़ा है। घृणा के इस वातावरण में पोषित इस्राइली अरब व फिलीस्तीनी नागरिकों के प्रति अत्याधिक आक्रामक व हिंसक हो जाते हैं। वो गर्व से अपने आपको मारने के लिए जन्मने वाला बताकर अपनी घृणा को अभिव्यक्त करते हैं। इस इस्राइली राजकीय आतंकवाद को संयुक्त राज्य अमेरिका व यूरोपीय संघ के सहयोग व विकसित पश्चिमी मीडिया के भेदभावपूर्ण झुकाव की सुविधा प्राप्त है।
जियनवादी इस्राइल का जनवाद एक बडा मिथक है, वास्तव में इस्राइल खतरनाक किस्म की धार्मिक रूढ़ीवादी सैद्धान्तिक आतंकशाही है। जिसकी आधारशिला ‘‘प्रभु के चुने हुए लोगों को प्रभू की दी जमीन‘‘ के मिथ्या पूर्ण नारे पर टिकी है। लेबनान पर इस्राइली हमलों के कारण पश्चिमी एशिया विस्फोट के कगार पर है। इस्राइली अदूरदर्शिता व आक्रामकता सभी अंतर्राष्ट्रीय कानूनों व मानवीय मानदण्डों को अपने हमलों से उडा देने पर तुली है। वास्तव में इस आधारहीन कट्टरपंथी जंग का खामियाजा फिलिस्तीन व इस्राइल के आम नागरिक भुगत रहे है। यह जंग यदि इसी तरह जारी रही तो इसकी लपटें दूसरे पड़ोसी मुल्कों को भी झुलसाना शुरू कर देंगी जो कि पूरे एशिया व विश्व की शान्ति के लिए बेहद खतरनाक स्थिति होगी।
महेश राठी, लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं