चंचल

एक कड़ी और टूटी। समाजवादी रवि रे नहीं रहे।

श्रद्धांजलि दे रहा हूं, कुछ यादें हैं, उसका संक्षिप्त हिस्सा साझा कर रहा हूं।

रवि दा का दिल्ली का सरकारी आवास धर्मशाला रहा, समाजवादियों के लिए। शरद यादव, जयंत पटनायक, चंचल स्थायी रूप से और इस ठसक के साथ रहते रहे जैसे बाप का घर हो, और वो था भी बाप का ही।

रवि दा शुरू से ही अभिभावक रहे हैं समाजवादियों की दूसरी पीढ़ी के लिए। न छल न प्रपंच, सीधी मुद्रा, मुस्कुराते हुए दुलारना उनके चेहरे पर कभी हम लोंगों ने तनाव देखा ही नहीं। उनकी पत्नी सरस्वती जी मातृ रूपेण।

उनके पास उनका अपना कोई बच्चा नही था लेकिन लाखों बच्चे थे उड़ीसा से लेकर उरी तक। जो भी दरवाजे पर पहुंचा है सीधे 'रन्ना घर ' तक पहुंचा समझो।

वी पी सरकार बना रहे थे। रविदा मंत्री बनाये जा रहे थे तय था अचानक मामला उलट गया। वी पी अपने पुराने सहयोगी किसी मंगल पांडे को लोकसभा स्पीकर बनाना चाहते थे, पर पांडे जी अड़ गये मंत्री बनने के लिए तो उनकी जगह सर्व सम्मति से रविदा अध्यक्ष बने।