इस विरोधी दुनिया में फासीवादियों को गले लगाइए, नफरत बेचने वालों को प्यार से ही खरीदा जा सकता है
इस विरोधी दुनिया में फासीवादियों को गले लगाइए, नफरत बेचने वालों को प्यार से ही खरीदा जा सकता है
इस विरोधी दुनिया में फासीवादियों को गले लगाइए, नफरत बेचने वालों को प्यार से ही खरीदा जा सकता है
संसद के मुकाबले विदेश में अधिक समय बिताया मोदी ने
यह सच है कि भारत के प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं का सम्मान नहीं करते हैं, वो शायद ही कभी संसद सत्र में कभी भाग लेते हैं। उन्होंने संसद के मुकाबले विदेश में अधिक समय बिताया है। पिछले चार सालों में उन्होंने संसद में दिए गए भाषणों से कहीं ज्यादा बार सार्वजनिक भाषण दिए। उन्होंने कभी भारत में प्रधान मंत्री के रूप में एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित नहीं किया। अपने देशवासियों के संचार के उनके तरीके, उनके उदारवादी भाषणों के अलावा, ट्विटर और उनके मासिक रेडियो द्वारा संबोधन को 'मन की बात' कहा जाता है।
एक पूर्व आरएसएस प्रचारक का यह सब करना आश्चर्यचकित नहीं करता। आरएसएस, सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का मूल संगठन 1925 में बी एस मुंजे और वीडी सावरकर द्वारा प्रस्तावित हिंदू राष्ट्रवादी विचारधाराओं के साथ मिलन से पैदा हुआ था, जिन्होंने हिटलर और मुसोलिनी को सम्मानित किया था।
बी एस मुंजे 19 मार्च, 1931 को फासीवाद सरकार के मुख्यालय पलज्जो वेन्जिया में मुसोलिनी के साथ मुख्य दर्शक थे। इटली के सेंट्रल मिलिटरी स्कूल ऑफ फिजिकल एजुकेशन की फासीवादी अकादमी और बलिला और एवेंगार्डिस्टी, संगठनों का दौरा भी किया।
मुंजे भारत वापस आए और के एम हेडगेवार के साथ मिलकर फासीवादी संगठन 'राष्ट्रीय स्वयं सेवा संघ' (आरएसएस) की नींव रखी।
आरएसएस : दुनिया का सबसे बड़ा फासीवादी संगठन
आरएसएस को एक सांस्कृतिक संगठन कहा जाता है जिसकी सदस्यता लगभग पांच मिलियन है। यदि संख्या के रूप में लिया जाए तो आरएसएस दुनिया का सबसे बड़ा फासीवादी संगठन है। इसके संस्थापन के बाद आरएसएस ने 'शाखा' नामक एक संस्था, युवाओं के लिए शारीरिक प्रशिक्षण केंद्र के लिए शुरुआत की। जिनमें से कुछ तो बंदूक और तोप जैसे हथियारों का भी प्रशिक्षण देते हैं। आरएसएस का फासीवाद डिजाइन सामने तब आया जब आरएसएस के सदस्य नाथुराम गोडसे ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या कर दी। जिसके बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था।
बीजेपी, आरएसएस का राजनीतिक अंग है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आरएसएस के पूर्व पूर्णकालिक प्रचारक हैं। उनके मूल मन्त्र आरएसएस के ही है। उन्होंने साबित कर दिया है कि वह मुख्य रूप से एक आरएसएस प्रचारक हैं, विशेष रूप से तब जब गुजरात में मुसलमानों के खिलाफ 2002 नरसंहार के दौरान, जब वह राज्य के मुख्यमंत्री थे। उन्होंने 2002 में आरएसएस के नेतृत्व में मुसलमानों के ऊपर हुए नरसंहार के लिए कभी किसी तरह का पछतावा ज़ाहिर नहीं किया।
नोटबंदी की तबाही के लिए भी मोदी को पछतावा नहीं
एक साल तक पद संभालने के बाद नरेंद्र मोदी के आघात ने राष्ट्र को अंदर तक हिलाकर रख दिया। 8 नवंबर, 2016 को एक टेलीविजन संबोधन के द्वारा मोदी ने राष्ट्र को बताया कि 500 तथा 1000 के उच्च मूल्य वाले नोट, आधी रात के बाद से कानूनी रूप से अमान्य होंगे। इसके बाद जो हुआ वो एक तबाही थी। डिमोनेटाइजेशन के कारण लगभग करीब 200 लोगों की सीधे रूप से मौत हो गई। लाखों श्रमिकों ने अपनी नौकरियां खो दीं। देश अब भी उस सदमे से नहीं उबरा। यहां तक कि देश की उस तबाही के लिए भी मोदी ने आम लोगों के प्रति कोई पछतावा या सहानुभूति नहीं दिखाई।
फासीवाद का साकार रूप हैं मोदी
मोदी अपनी राजनीतिक सूझबूझ और अपने शासन के ट्रैक रिकॉर्ड के आधार पर फासीवाद का साकार रूप हैं, यहां तक कि चिरकालिक फासीवादी भी हैरान हो गए, जब 20 जुलाई की दोपहर को एक कटु आलोचनात्मक भाषण में कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने मोदी सरकार पर निशाना साधा। उन्होंने लाखों नौकरियों, किसानों, व्यापारियों,कारीगरों और भारत के युवाओं से किये गए मोदी के चुनावी वादे को उठाया। इसके बाद उन्होंने प्रधानमंत्री से देश को यह बताने के लिए कहा कि राज्य-स्वामित्व हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल) से 45,000 करोड़ रुपये का अनुबंध समाप्त क्यों किया गया और "कॉर्पोरेट मित्र" को सौंप दिया गया। जिसने कभी "कभी हवाई जहाज नहीं बनाया था और जिसके ऊपर 35,000 करोड़ का ऋण था।"
इसके बाद उन्होंने कहा कि बीजेपी की राजनीति नफरत से संचालित होती है। उन्होंने कहा कि मोदी और उनके दोस्तों ने उन्हें पप्पू कह कर उनका मजाक उड़ाते हैं लेकिन उनके दिल मोदी या बीजेपी के प्रति कोई घृणा नहीं है। राहुल गांधी फिर बेपरवाह होकर संसद के आइल तक गए और मोदी को गले लगा लिया। परेशान मोदी को इसका जवाब देने में कुछ समय लग गया। जब उन्हें समझ आया कि क्या हुआ फिर उन्होंने राहुल गांधी को बुलाया और उनसे हाथ मिलाया। ऐसा कर उन्होंने आजाद शेर को घेर लिया !
राहुल गांधी के गले मिलने का दुनिया के लिए एक उदार अर्थ है। नफरत बेचने वालों को प्यार से ही खरीदा जा सकता है। शारीरिक संपर्क, में शारीरिक स्पर्श महत्वपूर्ण होता है। केवल वे लोग जो एक दूसरे से प्यार करते हैं या नफरत करते हैं, वही एक दूसरे को छूते हैं। प्यार का एक स्पर्श या एक हिंसक थप्पड़! इस विरोधी दुनिया मे, हिंसक तथा नफरत करने वालो को नफ़रत जवाब अमन पसंद लोगों द्वारा गले लगाकर दिया जाना चाहिए। भारत 'लिंचिंग मॉब्स' वाले लोगों,जो अपने पेट के लिए दूसरों की जान लेते हैं, से लेकर व्हाइट हाउस के हिंसक ठग जो माता-पिता से उनके बच्चों को अलग कर देते हैं। उन सब को हमें प्यार से गले लगाना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि फासीवादी लोग अल्पसंख्यक हैं। यदि सभी समझदार लोगों ने शांतिपूर्ण तरीके से हिंसक फासीवादियों को गले लगा लिया, जैसे जॉन लेनन ने गाया, "और दुनिया एक होकर जियेगी"। इसलिए बाहर निकलिए और फासिस्ट मिले तो उन्हें गले लगाइए।
(बीनू मैथ्यू, काउंटर करंट्स के संपादक हैं। उनका यह लेख https://countercurrents.org/2018/07/30/in-a-counter-world-hug-a-fascist/ से नताशा खान ने अनुवाद किया है।)


