उड़ गया "हंस" अकेला। रह गया जग का मेला।
उड़ गया "हंस" अकेला। रह गया जग का मेला।
अभिरंजन कुमार
सुबह सोकर उठा, तो राजेंद्र यादव के निधन की ख़बर सुनकर सदमे में पड़ गया। हालांकि वे 83-84 साल के हो गए थे, फिर भी उनका जाना पता नहीं क्यों, कुछ जल्दी चले जाने और अचानक चले जाने जैसा लग रहा है। यह मेरा दुर्भाग्य रहा कि करीब दो साल से बिहार में होने की वजह से इधर उनसे मुलाकात नहीं हो पायी थी। मैं उनका इंटरव्यू भी करना चाहता था "मुंहा-मुंही" में, लेकिन मेरे आर्यन टीवी छोड़ने के बाद फिलहाल यह कार्यक्रम भी बन्द है और आज राजेंद्र यादव भी हमें छोड़कर चले गये। अब मैं कभी उनका इंटरव्यू नहीं कर पाऊँगा।
दरियागंज में उनका दफ्तर मेरे प्रकाशक "नेशनल पब्लिशिंग हाउस" के दफ्तर के ठीक बगल में है। दीवार के एक तरफ "हंस" (2/36) और दूसरी तरफ "नेशनल पब्लिशिंग हाउस" (2/35). लिहाजा "नेशनल पब्लिशिंग हाउस" आते-जाते भी उनसे मुलाकातें हो जाया करती थीं। इधर दिल्ली आने पर एक-दो बार अपने प्रकाशक के पास गया भी, तो इतना कम वक्त लेकर कि उनसे नहीं मिल सका। आज अफसोस हो रहा है कि काश, जैसे मैंने अपने प्रकाशक से मिलने के लिये वक्त निकाला, वैसे ही उनसे भी मिलने के लिये निकाल लिया होता। अब यह अफ़सोस रह जायेगा जीवन भर के लिये, जब-जब राजेंद्र यादव का ज़िक्र चलेगा।
यद्यपि यह सच है कि राजेंद्र यादव को विवादों और स्त्रियों से ज़्यादा दोस्ती थी, पर हम जैसे लोगों से भी दुश्मनी नहीं थी, इसलिये वे जब भी मिले, पूरी आत्मीयता से, पूरी ज़िंदादिली से मिले। लेखन के अपने शुरुआती दिनों में मैं भी कहानियाँ लिखता था, ठीक वैसे ही जैसे राजेंद्र यादव भी शुरू-शुरू में कविताएँ लिखते थे। हालाँकि मेरी कहानियाँ "एक राजेंद्र" को सूट करती थीं, "दूसरे राजेंद्र" को नहीं। यानी राजेंद्र अवस्थी मेरी कहानियों को पसन्द करते थे और कुछ को उन्होंने "कादंबिनी" में छापा भी, लेकिन राजेंद्र यादव वाली धारा का कथाकार मैं कभी नहीं था। फिर भी मुलाकातें होती रहती थीं और उनका स्नेह मिलता रहता था।
व्यवहार के मामले में राजेंद्र यादव यारों के यार थे। बड़े-छोटे का भेद महसूस नहीं होने देते थे। हर तरह की गप्पें करते थे और उन्मुक्त भाव से ठहाके लगाया करते थे। आप कितने भी अजनबी क्यों न हों, उनसे बातचीत में पाँच मिनट के भीतर आपकी सारी हिचक समाप्त हो जाती थी। मैं उनसे पूछ नहीं पाया कि क्या अकेले में भी वे काला चश्मा चढ़ाए रखते थे, क्योंकि मैं जब भी उनसे मिला, हर बार उन्हें काले चश्मे में बिल्कुल फिल्मी डॉन के अंदाज़ में सिगार फूँकते हुये पाया। उनके मयूर विहार स्थित घर पर और "हंस" के दफ्तर में दो-एक बार साथ बैठकर खाने का भी सौभाग्य मिला।
राजेंद्र यादव को विवाद प्रिय थे। पब्लिसिटी के ख्याल से भी वे बहुत सारी चीज़ें लिख-बोल दिया करते थे। कुछ-कुछ इसी श्रेणी का उनका एक बयान था कि "कवियों को देखते ही गोली मार दी जानी चाहिए और गोली के पैसे उनसे पहले ही रखवा लेने चाहिए।" चूँकि कविता मेरी मुख्य विधा थी, इसलिये इस पर उनसे कई बार बहस हुई। हालाँकि मैं इस बात को लेकर आज तक कन्फ्यूज़ हूँ कि कविता से उन्हें समचुच का वैर था या वो सब महज एक शिगूफा था? अगर सचमुच वैर था, तो हंस में कविता क्यों छापते थे? और अगर वैर दिखावटी था तो अनिवार्यतः ऐसी कविताएं ही क्यों छापते थे, जो वस्तुतः कविता-विधा का कूड़ा करने वाली कविताओं की श्रेणी में आती थीं? यह सवाल अब तक मेरे लिये एक उलझी हुयी गुत्थी की तरह है।
इन सबके बावजूद, जब मैंने अपने कविता-संग्रह "उखड़े हुए पौधे का बयान" के लोकार्पण समारोह में उन्हें बुलाया, तो वे आये। कार्यक्रम आईटीओ स्थित गांधी पीस फाउंडेशन में शाम छह बजे से शुरू होना था, लेकिन उसमें देर हो गई। नतीजतन छह बजे समारोह कक्ष में कोई नहीं था। ख़ुद मैं भी नहीं था। और ठीक इसी वक्त पहुंचकर हॉल में पीछे की एक सीट पर वे बैठ गए थे। काफी देर तक बैठे रहे। मुझे पता भी नहीं चला। थोड़ी देर बाद मेरे भाई ने उन्हें देखा और आकर मुझे बताया कि अरे, राजेंद्र यादव तो आ चुके हैं! उन्हें अटेंड तो करो!! चूंकि लोकार्पण एक कविता-संग्रह का होना था, इसलिये राजेंद्र यादव मंचासीन अतिथियों में शुमार नहीं थे, इसके बावजूद वे आये, सबसे पहले आये और समय से आये। कोई आडंबर नहीं। अपना आशीर्वाद दिया और फिर चले गये।
अब जब राजेंद्र यादव हमारे बीच नहीं हैं, तो अलग-अलग लोग उन्हें अलग-अलग तरीके से याद करेंगे। कई उनके चाहने वाले हैं तो कई ऐसे भी हैं जो उनसे इत्तेफाक नहीं रखते। फिर भी इतना निर्विवाद है कि हिन्दी कहानी को उनके योगदान को भुलाया नहीं जा सकता। हिन्दी में सक्रिय बहुत सारे कथाकार आज उनके बनाए हुए हैं। नई कहानी आंदोलन को जन्म देने और आगे बढ़ाने वालों में कमलेश्वर और मोहन राकेश के साथ वे भी थे। "हंस" का पुनर्प्रकाशन और उसकी पुनर्प्रतिष्ठा आसान चुनौती नहीं थी। लेकिन राजेंद्र यादव ने न सिर्फ़ "हंस" को कामयाब बनाया, बल्कि उनकी देखा-देखी दूसरों को भी ऐसी साहित्यिक पत्रिकाएं प्रकाशित करने का हौसला मिला।
कथा-साहित्य और साहित्यिक पत्रकारिता में अविस्मरणीय योगदान के लिये राजेंद्र यादव को सलाम! उड़ गया "हंस" अकेला। रह गया जग का मेला। उन्हें मेरी भावभीनी श्रद्धांजलि!


