उत्तराखण्ड -जहां एक पागल, जो कभी फ़ौज़ का सिपाही भी नहीं रहा, स्वयं को फील्ड मार्शल कहता था
उत्तराखण्ड -जहां एक पागल, जो कभी फ़ौज़ का सिपाही भी नहीं रहा, स्वयं को फील्ड मार्शल कहता था
साँच कहें तो मारन धावे
राजीव नयन बहुगुणा
ख़बर पढ़ रहा हूँ, कि उत्तराखण्ड के 150 दायित्वधारियों को पैदल कर दिया गया है। ये सभी, या इनमे से अधिकांश स्वयं को मंत्री अथवा राज्य मंत्री कहते थे। जबकि सच्चाई यह है कि मंत्री बनने के लिए पहले विधायक बनना होता है। इस तरह राज्य में मुख्य मंत्री समेत कुल 11 मंत्री थे। 1 पद खाली था, जो राजनीतिक आपदा का कारण बना। बाक़ी सभी फ़र्ज़ी मंत्री थे, जिनकी तनख्वाह उपनल के चपरासी से भी कम थी। लेकिन ये बे शर्म न सिर्फ खुद को मंत्री कहते - लिखते थे, अपितु राज चिन्ह वाला लेटर हेड भी प्रयुक्त करते थे।
अब ऐसे प्रदेश को क्या कहें, जहां एक पागल, जो कभी फ़ौज़ का सिपाही भी नहीं रहा, स्वयं को फील्ड मार्शल कहता था। वह जेल जाने की बजाय मंत्री बना। देश में आज़ादी के बाद सिर्फ करिअप्पा और मानेक शा फील्ड मार्शल बने। फ़र्ज़ी मंत्री और फील्ड मार्शल देख लिए, अब इस प्रदेश को वह दिन देखना बाक़ी है, जब कोई छुटभैया खुद को राष्ट्रपति या प्रधान मंत्री कहेगा।
उत्तराखंड के सन्दर्भ में यही कहना है कि सरकारें आती - जाती रहती हैं, लेकिन राज लक्ष्मी को छल - बल से अपहृत करने की परम्परा आखिर जनता को ही दुर्दिन दिखाएगी। दुःख है कि दल बदल की चुड़ैल ने घर देख लिया। अब वह आती - जाती रहेगी। छोटे राज्यों में अल्प मत और बहुमत के बीच बहुधा बहुत सूक्ष्म अंतराल रहता है। ऐसे में दो चार विधायकों की हेर फेर ही अस्थिरता को पर्याप्त है। इस बार भी यही हुआ। मेरी माननीय विधायकों से कर बद्ध प्रार्थना है, कि मेरे पास एक 30000 ( तीस हज़ार रूपये ) की एफ़डी है, जो मेरे जन्म दिन पर किसी मित्र ने मुझे भेंट की थी। अभी मेरे पास इतना ही है, इसके सिवा और कुछ नहीं। जब और होगा तो दे दूंगा। वह तीस हजार की रकम मुझसे ले लो, और आपस में बाँट लो, लेकिन प्रदेश को अस्थिर मत करो।


