उत्तर पूर्व के नतीजे और चार जरूरी सवाल....

तो क्या अगला आईपीएल भाजपा ही जीतने वाली है?

सचिन श्रीवास्तव

जब मैं उत्तर पूर्व के तीन राज्यों के नतीजों पर लिखने के बारे सोच रहा हूं, ठीक उसी वक्त व्हाट्सएप पर एक घनघोर संघ विरोधी मित्र का मैसेज आया कि- हालिया जीत को देखकर लगता है कि इस बार आईपीएल भी भाजपा ही जीतेगी।

हास्य का जितना रस इस वक्त हमारी राजनीति में मिला है, उसे देखकर कह सकता हूं कि आपके व्हाट्सएप नोटिफिकेशन में भी ऐसे दर्जनों जोक्स होंगे। इनमें लेफ्ट की हार पर आंसू बहाने से लेकर विचारधारा की संगीन दलीलों तक का सामूहिक रुदन होगा। कई अति उत्साही विश्लेषकों ने तो जनता को गलत करार देते हुए यह भी घोषणा की है कि जब तक फासीवाद पूरी तरह नहीं आ जाता, तब तक भारतीय जनता भाजपा से तौबा नहीं करेगी।

मैं कोई बहुत बड़ा राजनीतिक विश्लेषक नहीं हूं लेकिन बीते दो दशकों में जितना राजनीति, भारतीय मानस और चुनावी चक्रव्यूह को जाना है उसके आधार पर कह सकता हूं कि उत्तर पूर्व के यह नतीजे न तो चौंकाऊ हैं और न ही बहुत गूढ़ गहन।

असल में थोड़ी सी सामान्य बुद्धि लगाएं तो आपको समझ में आएगा कि यह नतीजे तयशुदा भूलों और इंसानी फितरत की साझा दिलचस्पी का समुच्यय भर हैं।

पहला सवाल: क्यों हारा लेफ्ट?

चौक-चौराहों पर होने वाली चर्चा से लेकर फेसबुकिया कमेंटों तक में आपने दर्जनों कारण सुन लिए होंगे, लेकिन यह कोई क्यों नहीं कह रहा है कि असल में यह हार सीपीएम की निजी है। यह न तो लेफ्ट की हार है, और न ही देश में बढ़ते फासीवाद का कोई सबूत।

पहली बात तो जो जीते हैं, वह भाजपा के हिंदू राष्ट्र एक राष्ट्र वाले सिद्धांत से कोसों दूर हैं। दूसरी बात यह चुनाव से पहले कांग्रेस और सीपीएम में खूब टूट हुई है।

दूसरी और ज्यादा मानीखेज बात यह है कि सीपीएम में करात-येचुरी का प्रभुत्व अब पूरी रौ में है। मत भूलिए कि भाजपा में जिस तरह से मोदी-शाह का वर्चस्व है, ठीक उसी तरह करात-येचुरी प्रभाव से सीपीएम मुक्त होती नहीं दीखती है। केरल लॉबी के कमजोर पड़ने के बाद महज मानिक सरकार का धड़ा ही पोलित ब्यूरो में इन दोनों वाम दिग्गजों को चुनौती देता दिख रहा था, और त्रिपुरा की हार से वह भी पीछे धकेल दिया गया है। यह बात पूरी जिम्मेदारी से स्वीकारी जानी चाहिए।

दूसरा सवाल: तो ऐसी जीत किस काम की कि पार्टी बिखर जाए?

अब सवाल उठता है कि क्या करात-येचुरी राजनीतिक रूप से इतने अपरिपक्व हैं कि वे एक राज्य गंवाने के बावजूद अपने वर्चस्व को बचाए रखना चाहते हैं। जी हां, वाम राजनीति में चुनावी हार जीत कोई बहुत ज्यादा मायने नहीं रखती है। आज हारे हैं, तो कल जीत भी जाएंगे, लेकिन आज अगर पार्टी में अप्रासांगिक हुए तो बरसों बरस बाद भी जमीन तलाशते नहीं बनेगी। यह बात करात-येचुरी द्वय अच्छी तरह जानते हैं।

वाम राजनीति को करीब से देखने और महसूस करने वाले समझते हैं कि पोलित ब्यूरो के निर्णय में तात्कालिक लाभ को सबसे निचले स्थान पर रखा जाता है। जेएनयू की लेफ्ट ब्रिगेड के नुमाइंदे यह बात समझ चुके हैं कि मौजूदा समय में मोदी-शाह की चुनावी रणनीति की काट लेफ्ट के पास नहीं है। ऐसे में जमीन पर खुद को मजबूत करने के लिए जिस रणनीतिक कामयाबी की दरकार है, वह पार्टी के भीतर खुद को सिरमौर बनाए रखे बिना संभव नहीं है। अगर पोलित ब्यूरो में ही कई धड़े प्रभावशाली होंगे तो एक नीति पर आगे बढऩा लगभग असंभव होगा और जैसे तैसे नीतियों को लागू करवा भी लिया गया, तो जमीन पर उन्हें उतारने में खासी मशक्कत करनी पड़ेगी।

तीसरा सवाल: क्या भाजपा के लिए अब चुनौती खत्म हो चुकी है?

नहीं। कतई नहीं। भाजपा के लिए गुजरात की जीत वाली हार के बाद उत्तर पूर्व में जीतना अवश्यंभावी था और ऐन केन प्रकरेण भाजपा चाहती भी कि उसे जीत का स्वाद फिर मिले। इसीलिए भाजपा ने अपनी मूल विचारधारा को ताक पर रखते हुए सिर्फ जीत पर फोकस किया और नतीजा सामने है। इसके लिए उसने सभी तरह के हथकंडे अपनाए। चुनावी राजनीति में अब हथकंड़ों को रणनीति कहा जाता है और इसमें किसी को कोई बुराई दिखाई नहीं देती है।

चौथा सवाल: आगे क्या होगा?

इसी साल कर्नाटक और फिर मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ के चुनाव कई मायनों में अगले 10-20 साल की राजनीति का खाका तैयार कर देंगे। इसलिए देखना दिलचस्प होगा कि इन राज्यों में ऊंट किस करवट बैठता है। कर्नाटक में जहां अमित शाह अभी से पैर जमाकर बैठ चुके हैं, वहीं राजस्थान में हालात भाजपा के पक्ष में नहीं हैं। मध्य प्रदेश में आम आदमी पार्टी नतीजों को बेहद दिलचस्प बनाएगी और यहां परिणाम अप्रत्याशित हो सकते हैं। वहीं छत्तीसगढ़ में भाजपा को गढ़ बचाना मुश्किल नहीं हैं, तो बहुत आसान भी नहीं है।

कुल मिलाकर, उत्तर पूर्व की भाजपा की जीत पूर्व निर्धारित ही थी और समझौता न करने की माणिक सरकार की जिद ने उन्हें चुनाव में भले ही हरा दिया हो, लेकिन इतिहास उन्हें एक सजग, समर्थ, ईमानदार राजनेता के रूप में याद करेगा।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)

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