एक जरूरी राजनीतिक कदम महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण
एक जरूरी राजनीतिक कदम महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण
लड़की की इज्जत की रक्षा करना समाज का कर्तव्य माना जाता है। यह गलत है। पुरुष कौन होता है लड़की की रक्षा करने वाला। ऐसी शिक्षा और माहौल बनाया जाना चाहिए जिसमें लड़की खुद को अपनी रक्षक माने।
आधी आबादी के इन्साफ के लिए केंद्र सरकार एक जरूरी फैसला करने वाली है। पता चला है कि नरेंद्र मोदी की सरकार नगर पालिकाओं और पंचायतों में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देने की डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार की पहल को अमली जामा पहनाना चाहती है। अभी 33 प्रतिशत सीटें ही रिजर्व हैं। यह अलग बात है कि कुछ राज्यों ने 50 प्रतिशत आरक्षण अपने राज्य में दे रखा है। भाजपा ने बाकी सभी पार्टियों से पहले महिलाओं को संसद और विधान सभाओं में 33 प्रतिशत आरक्षण देने की मांग की थी और इस आशय का प्रस्ताव भी 1994 में पास कर लिया था लेकिन जब 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार बनी तो उस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया। दावा यह किया गया कि गठबंधन सरकार को चलाने की मजबूरी के तहत ऐसा नहीं हो पाया था। लेकिन अब तो गठबंधन नहीं है। शायद इसी वजह से नरेंद्र मोदी सरकार के रणनीतिकार जुट गए हैं कि इस बार महिलाओं को आरक्षण दे ही दिया जाए। वैसी भी अब महिलाओं के आरक्षण की बात इतना जोर पकड़ चुकी है कि आज नहीं तो कल यह होना ही है। जानकार बताते हैं कि महिलाओं को अपना वोट बैंक बनाने की भाजपा की योजना के तहत महिला आरक्षण की बात को आगे बढ़ाया जा रहा है। इस दिशा में मौजूदा सरकार ने एक जरूरी काम कर भी दिया है। अब दिल्ली पुलिस समेत वे राज्य या केंद्र शासित क्षेत्र जो केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन काम करते हैं वहां पुलिस विभाग की 33 प्रतिशत नौकरियां महिलाओं के लिए रिजर्व कर दी गयी हैं।
नरेंद्र मोदी सरकार की महिला सशक्तिकरण की दिशा में उठाये गए उस कदम से आने वाले इतिहास को एक नई दिशा मिलने वाली है। लेकिन रिजर्वेशन से ही सब कुछ बदलने वाला नहीं है। समाज और राष्ट्र के हर स्तर पर इसके लिए प्रयास करना होगा। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों और अन्य संस्थाओं से मिली जानकारी के आधार पर बहुत ही भरोसे से कहा जा सकता है कि पूरी दुनिया में महिलाओं की हालत बहुत खराब है। असली समस्या यह है कि आज भी हमारा पुरुष प्रधान समाज महिलाओं को संपत्ति मानता है। जब तक औरतों के बारे में पुरुष समाज की बुनियादी सोच नहीं बदलेगी तब तक कुछ नहीं होने वाला है। असली लड़ाई पुरुषों की मानसिकता बदलने की है और जब तक वह नहीं बदलता कुछ भी नहीं बदलने वाला है।
जब यह मानसिकता बदलेगी उसके बाद ही देश की आधी आबादी के खिलाफ निजी तौर पर की जाने वाली जहरीली बयानबाजी से बचा जा सकता है। दुनिया जानती है कि संसद और विधानमंडलों में महिलाओं के 33 प्रतिशत आरक्षण के लिये कानून बनाने के लिए देश की अधिकतर राजनीतिक पार्टियों में आम राय है लेकिन कानून संसद में पास नहीं हो रहा है। इसके पीछे भी वही तर्क है कि पुरुष प्रधान समाज से आने वाले नेता महिलाओं के बराबरी के हक को स्वीकार नहीं करते। इसीलिये सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और नैतिक विकास को बहुत तेज गति दे सकने वाला यह कानून अभी पास नहीं हो रहा है। इसमें नरेंद्र मोदी की पार्टी के लोग भी जिम्मेदार हैं। हालांकि अब वह दिन दूर नहीं जब यह कानून पास होकर रहेगा क्योंकि संसद और विधान मंडलों में आरक्षण के लिए औरतों ने मैदान ले लिया है। उनको मालूम है कि महिला आरक्षण का विरोध कर रही जमातें किसी से कमजोर नहीं हैं और वे पिछले 20 वर्षों से सरकारों को अपनी बातें मानने पर मजबूर करती रही हैं। अपने को पिछड़ी जातियों के राजनीतिक हित की निगहबान बताने वाली राजनीतिक पार्टियां महिलाओं के आरक्षण में अलग से पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण की बात कर रही हैं। लेकिन सब को मालूम है कि यह कानून को टालने का तरीका है।
महिला अधिकारों की लड़ाई कोई नई नहीं है। 1920 में जब महात्मा गांधी ने आजादी की लड़ाई का नेतृत्व करना शुरू किया तो बहुत शुरुआती दौर में साफ कर दिया था कि उनके अभियान का मकसद केवल राजनीतिक आजादी नहीं है, वे सामाजिक परिवर्तन की लड़ाई लड़ रहे हैं, नतीजा यह हुआ कि उनके साथ पूरा मुल्क खड़ा हो गया। हिन्दू, मुसलमान, सिख, ईसाई, बूढ़े, बच्चे, नौजवान, औरतें और मर्द सभी गांधी के साथ थे। सामाजिक बराबरी के उनके आह्वान ने भरोसा जगा दिया था कि अब असली आजादी मिल जायेगी। लेकिन अंग्रेज ने उनकी मुहिम में हर तरह के अड़ंगे डाले। 1920 की हिन्दू-मुस्लिम एकता को खंडित करने की कोशिश की। अंग्रेजों ने पैसे देकर अपने वफादार हिन्दुओं और मुसलमानों के साम्प्रदायिक संगठन बनवाये और देशवासियों की एकता को तबाह करने की पूरी कोशिश की। लेकिन आजादी हासिल कर ली गयी। आजादी की लड़ाई का स्थायी भाव सामाजिक इन्साफ और बराबरी पर आधारित समाज की स्थापना भी थी। लेकिन 1950 के दशक में जब गांधी नहीं रहे तो कांग्रेस के अन्दर सक्रिय हिन्दू और मुस्लिम पोंगापंथियों ने बराबरी के सपने को चकनाचूर कर दिया। इनकी पुरातनपंथी सोच का सबसे बड़ा शिकार महिलायें हुईं। इस बात का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब महात्मा गांधी की इच्छा का आदर करने के उद्देश्य से जवाहरलाल नेहरू ने हिन्दू विवाह अधिनियम पास करवाने की कोशिश की तो उसमें कांग्रेस के बड़े-बड़े नेता टूट पड़े और नेहरू का हर तरफ से विरोध किया। यहां तक कि उस वक्त के राष्ट्रपति ने भी अड़ंगा लगाने की कोशिश की। हिन्दू विवाह अधिनियम कोई क्रांतिकारी दस्तावेज नहीं था। इसके जरिये हिन्दू औरतों को कुछ अधिकार देने की कोशिश की गयी थी। लेकिन मर्दवादी सोच के कांग्रेसी नेताओं ने उसका विरोध किया। बहरहाल नेहरू बहुत बड़े नेता थे, उनका विरोध कर पाना पुरातन पंथियों के लिए संभव नहीं था और बिल पास हो गया।
महिलाओं को उनके अधिकार देने का विरोध करने वाली पुरुष मानसिकता के चलते आजादी के बाद सत्ता में औरतों को उचित हिस्सेदारी नहीं मिल सकी। संसद ने पंचायतों में तो सीटें रिजर्व कर दीं लेकिन बहुत दिन तक पुरुषों ने वहां भी उनको अपने अधिकारों से वंचित रखा। धीरे-धीरे सब सुधर रहा है। लेकिन जब संसद और विधान मंडलों में महिलाओं को आरक्षण देने की बात आई तो अड़ंगेबाजी का सिलसिला एक बार फिर शुरू हो गया। किसी न किसी बहाने से पिछले पंद्रह वर्षों से महिला आरक्षण बिल राजनीतिक अड़ंगे का शिकार हुआ पड़ा है। देश का दुर्भाग्य है कि महिला आरक्षण बिल का सबसे ज्यादा विरोध वे नेता कर रहे हैं जो डॉ. राम मनोहर लोहिया की राजनीतिक सोच को बुनियाद बना कर राजनीति आचरण करने का दावा करते हैं। डॉ. लोहिया ने महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी का सबसे ज्यादा समर्थन किया था और पूरा जीवन उसके लिए कोशिश करते रहे। आज के हालात यह हैं कि पुरुषवादी सोच चौतरफा हावी है।
इसी मानसिकता के चलते इस देश में लड़कियों को दूसरे दरजे का इंसान माना जाता है और उनकी इज्जत को मर्दानी इज्जत से जोड़कर देखा जाता है। लड़की की इज्जत की रक्षा करना समाज का कर्तव्य माना जाता है। यह गलत है। पुरुष कौन होता है लड़की की रक्षा करने वाला। ऐसी शिक्षा और माहौल बनाया जाना चाहिए जिसमें लड़की खुद को अपनी रक्षक माने। लड़की के रक्षक के रूप में पुरुष को पेश करने की मानसिकता को जब तक खत्म नहीं किया जाएगा तब तक कुछ भी बदलेगा नहीं। हमें उस पुरुषवादी सोच से लड़ऩे की जरूरत है जिसके बाद पुरुष अपनी कायरता को शौर्य के रूप में पेश करता है। कमजोर को मारकर बहादुरी दिखाने वाले जब तक अपने कायराना काम को शौर्य बताते रहेगें तब तक इस देश में बलात्कार करने वालों के हौसलों को तोड़ पाना संभव नहीं होगा। अब तक का भारतीय समाज का इतिहास ऐसा है जहां औरत को कमजोर बनाने के सैकड़ों संस्कार मौजूद हैं। स्कूलों में भी कायरता को शौर्य बताने वाले पाठ्यक्रमों की कमी नहीं है। इन पाठ्यक्रमों को खत्म करने की जरूरत है। सरकारी स्कूलों के स्थान पर देश में कई जगह ऐसे स्कूल खुल गए हैं, जहां मर्दाना शौर्य की वाहवाही की शिक्षा दी जाती है। वहां औरत को एक ऐसी वस्तु के रूप में सम्मानित करने की सीख दी जाती है जिसका सम्मान पुरुष के सम्मान से जुड़ा हुआ है। इस मानसिकता के खिलाफ एकजुट होकर उसे दफन करने की ज़रूरत है। अगर हम एक समाज के रूप में अपने आपको बराबरी की बुनियाद पर नहीं स्थापित कर सके तो जो पुरुष अपने आपको महिला का रक्षक बनाता फिरता है वह उसके साथ जबरदस्ती करने में भी संकोच नहीं करेगा। शिक्षा और समाज की बुनियाद में ही यह भर देने की जरूरत है कि पुरुष और स्त्री बराबर है और कोई किसी का रक्षक नहीं है। सब अपनी रक्षा खुद कर सकते हैं। बिना बुनियादी बदलाव के बलात्कार को हटाने की कोशिश वैसी ही है जैसे किसी घाव पर मलहम लगाना। हमें ऐसे एंटी बायोटिक की तलाश करनी है जो शरीर में ऐसी शक्ति पैदा करे कि घाव होने की नौबत ही न आए। कहीं कोई बलात्कार ही न हो। उसके लिए सबसे जरूरी बात यह है कि महिला और पुरुष के बीच बराबरी को सामाजिक विकास की आवश्यक शर्त माना जाए।
यह लक्ष्य तभी हासिल होगा जब पुरुष और स्त्री में बराबरी की बात को सभी पार्टियों के राजनीतिक एजेंडा में प्रमुखता से स्थान दिया जाए। आजादी की लड़ाई के दौरान सामाजिक बराबरी को स्वतन्त्रता का स्थायी भाव माना गया था।
इस माहौल में नगर पालिका और पंचायतों में महिलाओं को आधी सीटें देने की नरेंद्र मोदी की सरकार की कोशिश एक जरूरी कदम है। इस बात की संभावना भी है कि यह काम वोट बैंक बनाने के लिए किया जा रहा हो लेकिन इसकी परवाह किसको है।
साभार- देशबंधु


