फतेहबाद प्रकरण क्या उजागर करता है
जगदीप सिंह सिन्धु
बात यहाँ सम्मान या अपमान की नहीं परंतु क्षमता व अक्षमता, कार्यशैली में अतिवादिता एवं महत्वाकांक्षा की ज्यादा है।
हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री बंसीलाल को अगर प्रशासन पर मजबूत पकड़ और अधिकारियों को सख्त निर्देशों व समयबद्ध प्रगति के लिए याद किया जाता है, तो आज के दौर में इस प्रकार की मजबूती को स्थापित करने के प्रयास असंगत कैसे मान लिए जाएं।
सत्ता संरक्षण देने के लिए नहीं चुनी जाती वरन् आम जन के सामूहिक हितों को समयबद्ध उपायों से रक्षित करने के लिए चुनते है। यही लोकतंत्र की मूल भावना और कार्यशैली भी है। उसमें किसी मत्वकांक्षा विशेष की गुंजाइश नहीं होती। लेकिन साथ ही गरिमापूर्ण व्यवहार व जवाबदेही की भी प्रतिबद्धता निश्चित है।
एसपी संगीता कालिया और हरियाणा के स्वास्थ्य मंत्री के बीच तकरार की घटना, एक घटना मात्र नहीं बल्कि मनोदशा का भी साक्ष्य है। एक क्षेत्र में प्रयासों से उब्लब्धि हासिल करने का अर्थ यह नहीं कि आप सर्वेसर्वा हैं और आप की व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा संविधान द्वारा निहित कार्यक्षेत्र में गरिमापूर्ण शालीनता से उच्च हो सकती है।
संविधान द्वारा जो अधिकार निश्चित किये गए हैं, उनका उद्देश्य जनहित के लिए कार्य करना है, न कि अपनी पूर्वाग्रहित दृष्टिकोण से प्रेरित महत्वाकांक्षा की पूर्ति।
सामान्य नागरिक समूह, जो अपनी वेदना या समस्या को जब शीर्ष के सामने ले जाता है तो वो उन परिस्थितियों से जूझने के बाद जब हल न मिले तब आगे बढ़ता है, न कि प्रायोजित होता है।
अपने क्षत्र में होने वाले असामाजिक कामों और उनसे होने वाले बुरे प्रभावों को दूर करना या करवाने का सामूहिक प्रयास हर समाज में किया जाता है। उस पर नियंत्रण और अंकुश लगाने का प्रावधान बनाये गए कानून के तहत ही नियुक्त अधिकारी को प्रदत्त किये जाते हैं। अधिकारी जनसेवक के रूप में काम करने के लिए नियुक्त होते हैं, जिसके लिए उनको उचित सुविधाएं व संसाधन भी मिलते हैं। अक्सर ऐसा देखा गया है कि कुछ अधिकारी आम नागरिकों से स्वयं को बहुत श्रेष्ठ मानकर उनके प्रति पूर्वाग्रहित हो कर ही दोयम दर्जे का व्यवहार करते हैं, जबकि उनको अधिकार नागरिकों की समस्या के समाधान करने के लिए मिलते हैं, जिनका वो स्वामित्व स्वयं के लिए मान लेते हैं।
सरकारी अधिकारियों में समाधान करने की क्षमता, जवाबदेही की अनिवार्यता को अनदेखा कर अपनी सुविधाओं को जुटाने की प्रवृत्ति अधिक देखने में आती है जिसके प्रति अक्सर जम समूहों में रोष पाया जाता है। जबकि अधिकारियों में एक व्यापक संवेदनशील दृष्टिकोण को अपनाने की अत्यंत आवश्यकता है जिससे कार्यों को करने में अधिक सहजता हो।
किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में नागरिकों, प्रतिनिधियों और अधिकारियों में एक विशेष संतुलन की आवश्यकता भी अनिवार्यता है। जब भी इस प्रकार का द्वन्द्व सामने प्रकट होता है, उसका निराशाजनक प्रभाव ही समाज को उद्वेलित करता है। किसी भी लोकतान्त्रिक व्यवस्था में नागरिकों की सक्रिय भागीदारी को ख़ारिज नहीं किया जा सकता और अधिकारियों की भूमिका व जवाबदेही कार्यो में सहायक के रूप में तय होती है। नागरिक ही अपनी प्राथमिकताएं तय करते हैं, जिनके लिए उन्होंने जनप्रतिनिधियों को उन नीतियों के क्रियान्वयन के लिए के लिए चुना है।
प्रजातंत्र की सफलता में अधिकारियों से महत्वपूर्ण योगदान की अपेक्षा की जाती है, जो एक चुनौतीपूर्ण स्थिति है। वहीं दूसरी और जनता द्वारा चुन कर आये जनप्रतिनिधियों से, सरकार में विशेष पद पर स्थापित मंत्रियों से भी बहुत संयम और सहनशीलता की अपेक्षा होती है, वो अधिकारियों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत होते हैं, प्रताड़ना का नहीं। किसी भी राजनैतिक दल के वैचारिक मूल्यों से प्रेरित हो कर संतुलन संभव नहीं है। राजनेता के आचरण में व्यापकता का आधार अनिवार्य है।
जगदीप सिंह सिन्धु, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।