एक मोहाजिर की व्यथा
एक मोहाजिर की व्यथा
संजीव पांडेय
बात 1990-91 की है। देश में एक रथयात्रा निकली थी। इस रथयात्रा ने भाजपा को अर्श पर पहुँचाया था। इस रथयात्रा का नेतृत्व पाकिस्तान के सिंध प्रान्त से आये एक मोहाजिर ने की थी। मोहाजिर का नाम एल के आडवाणी था। लेकिन आज इस मोहाजिर की व्यथा आज देखिये। जिस पार्टी को अपनी रथ यात्रा से मजबूत किया उसी पार्टी में उन्हें हाशिए पर ले जाने की तैयारी हो चुकी। व्यथा तो वैसे जायज है। इतने साल सेवा की। लेकिन आज जब फिर पीएम बनने का मौका मिलने की सम्भावना है तो रास्ते में कई बाधायें हैं। गोवा में पहले दिन पहुँचे ही नहीं। बताया कि बीमार हो गये हैं। हालाँकि इस बीमारी से अब लाभ मिलता उन्हें नजर नहीं आ रहा है। इससे उनकी फजीहत और बढ़ने वाली है। जो कुछ खेल वो अपने कुछ समर्थकों के बल पर करना चाहते है वो अब सम्भव नहीं है। क्योंकि समर्थक भी खासे कमजोर और आधारहीन हैं। जो सामने खड़ा है वो काफी मजबूत है। भाजपा के निचले स्तर क कार्यकर्ताओं का पसन्द भी वही है। देश के बड़े कॉरपोरेट की भी पसन्द वही हैं।
कहानी काफी दिलचस्प है। 2004 के बाद से ही देश की राजनीति दो मोहाजिरों के इर्द-गिर्द केन्द्रित हो गयी। एक मोहाजिर पाकिस्तानी पंजाब से आये थे। एक मोहाजिर पाकिस्तानी सिन्ध से आये थे। पाकिस्तानी पंजाब वाले मोहाजिर मनमोहन सिंह की किस्मत तेज थी। वो प्रधानमन्त्री बन गये। न उन्होंने एलके आडवाणी की तरह कोई यात्रा निकाली न कहीं जमीन पर काँग्रेस के लिये प्रचारक की भूमिका निभायी। लेकिन आडवाणी ने वो सारा कुछ किया जो इस देश में नेता बनने के लिये करना होता है। लेकिन इसे किस्मत कहेंगे। पंजाबी मोहाजिर देश के शीर्ष पद पर सिर्फ पाँच साल के लिये ही नहीं बैठा। बल्कि अब उनके दस साल पूरा होने वाले है। इसी पंजाबी मोहाजिर ने 2008 में परमाणु करार के वक्त संसद् में हो रहे बहस के दौरान सिंधी मोहाजिर पर व्यंग्य भरी टिप्पणी की थी। पंजाबी मोहाजिर ने सिंधी मोहाजिर पर टिप्पणी करते हुये कहा था कि एलके आडवाणी जी आपकी किस्मत देश का प्रधानमन्त्री बनना नहीं लिखा है। मानों मनमोहन सिंह को उसी समय अपनी दिव्य आँखों से भविष्य को लेकर दो महत्वपूर्ण जानकारी मिल गयी थी। पहला यह कि 2009 के चुनाव में काँग्रेस दोबारा जीत रही है और 2014 में नरेन्द्र मोदी नामक एक आदमी आकर आडवाणी के रास्ते को पूरी तरह से बन्द कर देगा।
आज एलके आडवाणी कोप भवन में हैं। जिस नरेन्द्र मोदी को गुजरात दंगों के बाद उन्होंने बचाया था वही मोदी ने आडवाणी का रास्ता रोक दिया है। आडवाणी आज नमो के नारे को व्यक्ति पूजा बता रहे हैं। लेकिन आडवाणी की व्यथा देखिये। आज संघ परिवार उनके साथ नहीं है। अगर काँग्रेस में पीएम बनने के लिये सोनिया गाँधी का आशीर्वाद चाहिये तो भाजपा में संघ परिवार का। संघ परिवार आडवाणी को त्याग चुका है। एलके आडवाणी की अपनी समस्या है। वो इस बात को भूल गये कि अगर कोई नेता इस देश में जाति से मजबूत नहीं है तो किसी बड़े हस्ती की छत्रछाया उसे चाहिये। जैसे सोनिया गाँधी की छत्रछाय़ा मनमोहन सिंह को मिली। मनमोहन सिंह भाग्यशाली थे। उन्हें यह छत्रछाया मिली और पीएम बन गये। आडवाणी इस बात को भूल गये कि अटल बिहारी वाजपेयी में तमाम गुणों के साथ एक गुण और था। यह गुण उन्हें उतर भारत से लेकर मध्य भारत और पूर्व भारत तक मजबूत करता था। ये गुण उन्हें जन्मजात मिला था। वो ब्राहमण परिवार में पैदा हुये थे। इस जाति की मजबूती आडवाणी जी अभी तक महसूस नहीं कर पा रहे हैं। अगर इस जाति की अहमियत को वे अभी भी समझना चाहते हैं तो समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के ब्राहमण सम्मेलनों को गौर से देखें। लेकिन एलके आडवाणी के साथ ब्राहमण तो क्या होंगे उनके अपने ही नहीं है। आज अडानी से लेकर अंबानी तक नरेंद्र मोदी के साथ हो गये हैं। ये दोनों कॉरपोरेट अपने बिरादर भाई आडवाणी को छोड़ नरेंद्र मोदी के गुणगाण में लगे हैं। आडवाणी की योग्यता को उनके स्वजातीय कॉरपोरेट भी स्वीकार करने को राजी नहीं है।
आडवाणी भाजपा संस्कृति में पले बढ़े जरूर हैं। लेकिन वे वो नेता हैं जो सत्ता प्राप्त करने के लिये हर तरह के खेल करते हैं। अगर उन्होंने सत्ता प्राप्त करने के लिये रथयात्रा का नेतृत्व किया तो भारत विभाजन के जिम्मेदार मोह्ममद अली जिन्ना को सेक्यूलर भी बता दिया। यानी कि सत्ता प्राप्त करने के लिये आडवाणी ने हर खेल को खेला। इसके बावजूद उन्हें पीएम की कुर्सी नहीं मिली। 2009 में एक बार पार्टी ने उन्हें दावँ पर लगाया लेकिन पार्टी पहले से भी ज्यादा नुकसान में रही। सीटें कम हो गयीं। यानी कि जनता के बीच उनकी लोकप्रियता वो नहीं थी जो अटल बिहारी वाजपेयी की थी। अटल बिहारी वाजपेयी सर्वमान्य थे। पार्टी और पार्टी से बाहर हर जगह उनकी बातों का वजन था। हालाँकि यह भी सच्चाई है कि अटल बिहारी वाजपेयी की पाँच साल तक चली सरकार के कार्यकाल में एलके आडवाणी ने वाजपेयी को डिस्टर्ब करने के लिये हर खेल को खेला। सरकार कई जगह फँसती नजर आयी। उसके लिये देश का विपक्षी दल काँग्रेस जिम्मेवार नहीं था। उसके लिये पार्टी के अन्दर सक्रिय आडवाणी गुट ही जिम्मेदार था जो किसी भी कीमत पर अटल बिहारी वाजपेयी को अपदस्थ कर सत्ता को हथियाने के खेल में लगा था। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार अगर रक्षा सौदा घोटाले और पेट्रोल पम्प घोटाले में फँसी थी तो उसके लिये जिम्मेवार काँग्रेस कतई नहीं थी। इसे तो पार्टी के अन्दर ही सक्रिय एक ग्रुप ने अंजाम दिया था। उनका ख्याल था कि इस खेल के बाद अटल बिहारी वाजपेयी इस्तीफा देंगे और पीएम पद पर एलके आडवाणी की ताजपोशी हो जायेगी।
एलके आडवाणी ने अटल बिहारी वाजपेयी ही नहीं बल्कि पार्टी के दूसरे वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी को भी किनारे लगाने की कोशिश की। इसमें वो कामयाब हो गये। 2004 में जोशी इलाहाबाद से लोकसभा चुनाव हार गये थे। किन परिस्थितियों मे जोशी की हार हुयी थी इसकी व्यथा जोशी जी खुद बता सकते हैं। लेकिन आज नरेंद्र मोदी भाजपा में सक्रिय सारे गुटों पर भारी पड़ रहे हैं। उसके पीछे कई कारण हैं। अगर देश के कई कॉरपोरेट उनके साथ हैं तो भाजपा के निचले स्तर के कार्यकर्ता भी उनके साथ हैं।
एलके आडवाणी धारा के विपरीत तैर रहे हैं। समय की चाल को वो नहीं समझ रहे हैं। 2009 में पार्टी की कमान उनके पास थी। आडवाणी कैम्प में जो लोग हैं उनका जनाधार नहीं है। सुषमा स्वराज और अनंत कुमार के बल पर आडवाणी लम्बी लड़ाई नहीं लड़ सकते हैं। यदुरप्पा को लेकर ज्यादा हायतौबा आडवाणी कैम्प ने ही मचाया था। इसका परिणाम कर्नाटक में सामने आ गया। यानि की नमो-निया नामक वायरस इतना खतरनाक हो चुका है कि जिसके अन्दर घुसेगा वो गिरेगा। अब फैसला तो एलके आडवाणी ने ही लेना है।


