एक सैनिक की मौत
एक सैनिक की मौत
—-अशोक कुमार पाण्डेय
तीन रंगों के
लगभग सम्माननीय से
कपडे मैं लिपटा
लौट आया है मेरा दोस्त..
अखबारों के स्थानीय पृष्ठ और
टीवी के रुपहले पर्दों पर्
भरपूर गौरवान्वित होने के बाद
उदास बैठे हैं पिता
थककर स्वरहीन हो गया है माँ का रुदन
सूनी मांग और बच्चों की निरीह भूख के बीच
बार बार फूट पडती ही पत्नी
कभी कभी एक किस्से का अंत
कितनी अंतहीन कहानियों का आरम्भ होता है
और किस्सा भी क्या
एक बेनाम से शहर में
बेरौनक सा बचपन
फिर सपनीली उम्र आते-आते
सिमट जाना सारे सपनो का
इर्द गिर्द एक अदद नौकरी के
अब इसे संयोग कहिये या दुर्योग या मात्र योग
की देशभक्ति
नौकरी की मजबूरी थी
और नौकरी जिंदगी की
इसीलिए दब जाना
भर्ती की भगदड़ में
सिर्फ हादसा है
और फंस जाना बारूदी सुरंगों में, शहादत
बचपन में कुत्तों के डर से
रास्ता बदल लेने वाला
मेरा दोस्त
आठ को मारकर मरा था
बारह दुश्मनों के बीच फंसे आदमी के पास
बहादुरी के अलावा और चारा भी क्या है
वैसे कोई युद्ध नहीं था वहाँ
जहां शहीद हुआ था मेरा दोस्त
दरअसल उस दिन के अखबार में
पहले पन्ने पर्
दोनों राष्ट्राध्यक्षों का
आलिंगनबद्ध चित्र था
कौन बिछाता है ये आक्टोपसी बिसातें
कौन घोलता है नशों में सस्ती शराब के साथ
मौत का नशा
कौन छीनकर माँ की दवाएं
और बच्चों की किताबें
थमा देता है हथियार
और किसने रख दिया है
निजी स्वार्थों के समूहों का नाम देश
इतना सस्ता तो नहीं है हमारा खून
की बस तीसरे पन्ने पर्
एक कालम की खबर बन जाए
अजीब खेल है
की वजीरों की दोस्ती
प्यादों की लाशों पर पनपती है
और जंग तो जंग
शांति भी लहू पीती है ....
साभार
बारामासा


