नेशनल ग्रीन ट्रिवूनल (एनजीटी) के 6 जुलाई 2015 के आदेशानुसार अब घोड़ों, बर्फ के स्कूटर, ATV, पेराग्लाइडिंग इत्यादि के चलाने पर भी रोक लगा दी है। इस से पहले मनाली रोहतांग सड़क पर दस बर्ष पुराने व डीजल वाहनों के चलाने पर पाँच मई से रोक लगा दी गई थी तथा इस सड़क पर दिन में केवल छ: सौ पेट्रोल व चार सौ डीजल के पर्यटन वाहन को चलाने की अनुमति दी थी। 2008 से चल रहे इस केस में कई अलग –अलग आदेशों में एनजीटी ने सोलंग नाला व इस सड़क के अन्य स्थलों पर से सभी खोखों व ढ़ावों को हटाने तथा लघु पर्यटन से जुड़ी बहुत सी सेवाओं पर भी रोक का फर्मान जारी किया है।
पर्यावरण संरक्षण के नाम पर लिए गए इन एक तरफा आदेशों में हजारों लोगों की आजीविका की सुरक्षा पर गौर नहीं किया गया व न ही कोई वैकल्पिक रास्ता दिखाया गया। यह भी नहीं बताया गया कि कैसे स्थानीय लोगों की आजीविका बचेगी व कैसे पर्यावरण मित्र पर्यटन का विकास होगा।
कोर्ट के इस कदम से छ: हजार से भी ज्यादा स्थानीय व प्रवासी कामगारों का रोजगार छिन जाएगा। इस क्षेत्र में पर्यटन के विकास में पिछले तीस सालों से भरी बढ़ोतरी हुई है। इस से पहले यहाँ के ग्रामीण गरीबी व अल्प शिक्षा के हालतों में जीवन जीने को मजबूर थे, क्योंकि यह पिछड़ा इलाका 6 माह बर्फ छादित रहता था। पर्यटन के विकास से लोगों को आजीविका उपार्जन के नए अवसर प्राप्त हुए। स्थानीय लोगों ने चाए व खाने के ढ़ावे खोले, छोटे-छोटे खोखे खोल कर दुकानों चलाई, जिन में कोट, बूट, दस्तकारी का समान व कारयाने का व्यापार शुरू किया, टेक्सी चलना, घोड़े व याक की सवारी, वर्फ के पहाड़ी वाहन, स्थानीय पहनावे की थड़ी, जोरबिंग, ट्रेंपलिंग, स्लेज, फोटोग्राफी, पेराग्लाइडिंग, और स्कीइंग इत्यादि का कम शुरू किया । स्थानीय ग्राम पंचायत बुरुआ, शनाग, पल्चान, वशिष्ठ व मनाली तथा आसपास के हजारों लोग इन करोवरों में पिछले कई वर्षों से संलग्न हैं और इस से वे अपनी आजीविका उपार्जन कर रहे हैं । इन्हीं पर्यटन सहयोगी गतिविधिओं के कारण आज इस इलाके में पर्यटन का भरी विकास हो पाया है।
इस से पहले के आदेश में एन जी टी ने सरकार को वशिष्ठ से रोहतांग दर्रे तक पी॰पी॰पी/ मॉडल पर रोप वे स्थापित करने व सीएनजी बसें चलाने का सुझाव दिया था और “लोगों को पर्यावरण संरक्षण व टिकाऊ विकास के बारे में समझाने को कहा। यह धारणा कि इस से लोगों के रोजगार प्रभावित होंगे, के लिए लोगों को ठीक से पढ़ाएँ कि टिकाऊ विकास खुशाली लाने के लिए वाध्य है जो उन्हें भविष्य में रोजगार प्रदान कराएगा।“
उक्त आदेशों की पालना करते हुए प्रशासन ने सेंकड़ों ढ़ावों व खोखों इत्यादि को अभी तक हटा दिया है। पाँच मई के बाद पर्यटन वाहनों पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया है। ऐसे में आज यहाँ अराजकता का वातावरण बन हुआ है।
सोलंग नाला में निजी कंपनी रोप वे चला रही है, विद्युत परियोजना व दूसरे निजी बड़ी पूंजी के करोवरी वन भूमि लीज पर लेकर व्यापार कर रहे हैं। क्या इन स्थानीय ग्रामीणों जो छोटा कारोवार पिछले तीस-चालीस वर्षों से कर रहे हैं को भी लीज पर वन भूमि दी जा सकती थी, जो आज तक नहीं दी गई और न ही इस पर कोई बात होती है।
अपुष्ट सूचना यह भी है कि बशिष्ठ-रोहतंग रोप वे की परियोजना PPP मॉडल पर 450 करोड़ रुपया में TATA कंपनी को देने का प्रस्ताव सरकार के पास विचारधीन है। दूसरे बात यह है की 2019 के बाद जब सोलंग – लाहौल सुरंग बन कर तैयार होगी और सेना रोहतंग सड़क के रखरखाव व वर्फ हटाने के काम से हट जाएगी, जिस पर आज सेना का लगभग 70 करोड़ बार्षिक खर्च होता है, उसके बाद इस सड़क का रखरखाव का कार्य कैसे होगा व कौन करेगा? क्या हिमाचल सरकार यह कार्य करने की जिम्मेवारी उठाने को तैयार है या TATA जैसी किसी कंपनी को सड़क ही PPP मॉडल पर यह भी सोंप दी जाएगी?
PPP क्या है- Public Private Partnership, यह आज कल देश में एक व्यापार का माडल विकास के नाम पर चल रहा है, जिस में निजी कंपनी परियोजना में पैसे लगाती है और सरकार उसे जमीन इत्यादि अन्य सुविधाएं मुफ़त में देती है। कारोवार कंपनी का होता है तथा मुनाफा भी कंपनी ही लेती है। 40-50 साल बाद यह परियोजना सरकार को सौंप दी जाती है । इस का सीधा अर्थ होता है सरकारी (जनता) के पैसे व जमीन से निजी व्यापार । आज कल इस तरह की परियोजनाएं सड़कों, जलविद्युत इत्यादि की भी चल रही हैं।
ऐसे में कोर्ट व सरकार के सारे प्रयत्न यही लगते हैं कि फिर से SKI VILLAGE जैसी कोई योजना (पर्दे के पीछे से) चलाई जाए, जिस का मात्र उदेश्य पर्यटन कारोवार से स्थानीय लघु व्यवसायियों को हटना ही लगता है। इस के लिए कोर्ट में तर्क भी दिए गए और कहा गया कि स्थानीय लघु पर्यटन व्यवसायियों के कारण पर्यावरण को इस संवेदनशील इलाके में भारी नुक्सान हो रहा है, ये प्रदूषण फैल रहा है, इन्होंने गंदगी व कचरा फैला दिया, नाजायज कब्जे किए, पर्यटकों की लूट की जा रही है इत्यादि-इत्यादि ।
पिछली बर्ष जब NGT के आदेश आए उसके बाद फरवरी 2015 को हिमालय नीति अभियान के कार्यकर्ताओं ने क्षेत्र का दौरा किया। हमने स्थानीय लघु पर्यटन व्यवसायियों के समूहों, होटलवालों तथा जिला प्रशासन से बात की और उसके बाद एक रिपोर्ट इस पर सार्वजनिक की। इस से पहले बर्ष 2011-12 में हमने EQUATION, Bangluru तथा ENVIRINICS TRUST, दिल्ली के साथ मिल कर, हिमाचल के पर्यटन उद्योग की संभावनाओं, टिकाऊपन तथा ज़िम्मेवार पर्यटन के लक्ष्य को ले कर छ: गोष्ठियों का आयोजन चंबा, मक्लोड्गंज, मनाली, बंजार, रिकोङ्गपीओ व कुफ़री में किया था। इन गोष्ठियों में प्रदेश के पर्यटन से जुड़े अलग- अलग विधाओं के करोवरियों ने भाग लिया था। हिमालय नीती अभियान इस से पहले SKI VILLAGE के खिलाफ चले जन आंदोलन के साथ रही है, इस लिए प्रदेश में पर्यटन उद्योग को पर्यावरण मित्र, टिकाऊ व ज़िम्मेवार उद्यम बनाने के लक्ष्य से हमने यह पहल की थी।
हमने पाया कि पर्यटन के टिकाऊ नियोजन, कायदे कानून व प्रचार प्रसार की कमी, पर्यावरण व साफ़सुथरा वातावर्ण, गैरकानूनि कृत्य, सरकारी विभागों की भ्रष्ट कार्यप्रणाली पर उचित दिशानिर्देश का भी अभाव है। इसी कारण आज प्रदेश में पर्यटन का कारोवार अराजक तरीके से चल रहा है। इसलिए छोटे स्थानीय करोवरीयों को इस स्थिति के लिए जीमेबार नहीं ठहराया जा सकता है।
हमने पाया कि प्रदेश में आज लगभग छ; लाख से भी ज्यादा लोग इस उद्योग में नौकरी व प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप से अपनी आजीविका उपार्जन कर रहे हैं। यह भी देखा गया कि प्रदेश के राजस्व में इस उद्योग की 7% के करीब भागी दरी है।
आज दुनिया में यह उद्योग 25% की दर से वृद्धि कर रहा है। ऐसे में यह उद्योग अभी और भी फले-फूलेगा। इसीलिए कारण कारपोरेट की नजरें इस तरह की परियोजना पर टिक्की हैं और मुनाफे के लिए इस क्षेत्र में निवेश करना चाहते हैं न कि पर्यावरण की चिंता के कारण। इस उद्योग में फ़ैली अराजकता, पर्यावरण का नुक्सान, लूट-घसूट व बुराइयाँ तथा गैरकानूनि गतिविधियां जो सरकारी संरक्षण व लापरवाही से ही पन्नपी हैं, असल में मात्र बहाना है, जबकि छुपा हुआ मकसद कुछ और ही है।
चार दिन पहले मेंने एक चर्चा पत्र सरकार, पर्यटन उद्योग से जुड़े जानकारों व मनाली के लघु पर्यटन करोवरियों को जारी किया था। उस में भविष्य में क्या होना चाहिए पर कुछ विंदु उठाए थे।
1 क्योंकि इस उद्योग से कई बुराइयाँ पन्नपी हैं, तो क्या इसे बंद कर दिया जाए?
2 क्या कारपोरेट व बड़ी कंपनी के आने से पर्यावरण का नुक्सान नहीं होगा और अनैतिकता व बुराइयों का खातमा हो जाएगा तथा लूट बंद होगी और पर्यटक को सस्ती सेवा मिलेगी, इसलिए कारपोरेट को कारोवार सँभाला जाए?
3 या फिर कोई और भी विकल्प है, जो टिकाऊ व पर्यावरण मित्र हो, स्थानीय युवाओं को रोजगार व आजीविका का आधार प्रदान कर्ता हो, साथ में बुराइयों व लूट-घसूट पर अंकुश लगा सके।
चर्चा उपरांत हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि पर्यटन उद्योग बंद नहीं हो सकता बल्कि भविष्य में और ज्यादा फैलेगा। कारपोरेट व कंपनी स्वच्छ व पर्यावरण मित्र पर्यटन का विकास एक भ्रम है जिस कि मिसाल केरल व दूसरे स्थानों पर देखि जा सकती है कि किस तरह ये पर्यटन के बड़े व्यापारी पर्यावरण को नुक्सान पहुंचा रहे हैं। स्थानीय युवाओं को रोजगार नहीं देते, जिस के कई बहाने होते हैं जैसे स्किलल इत्यादि। छोटी मोती बेटर इत्यादि की नौकरी जरूर मिल सकती हे, परंतु उस मे भी स्थानीय कर्मी ज्यादा नहीं लिए जाते हैं, क्योंकि उन का यूनियन बनाने का खतरा होता है। जबकि प्रबंधन में कभी भी स्थानीय लोग नहीं लिए जाते हैं, यह देश भर में इन कंपनियों के बारे में सर्वविदित अनुभव है। सस्ती सेवा तो इन कि हो ही नही सकती हे। सोलांग नाला में बने रोप वे व उस के रेस्टोरेन्ट का बिल जरूर देखें, आप को रेट मालूम हो जाएंगे।
आज प्रदेश में दस लाख से ऊपर वेरोजगारों की फौज रोजगार की तलाश में है, यह उद्योग एक संभावना है, जिस में इन्हें रोजगार मिल सकता है। पर्यावरण संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण व वनों का विकास कभी भी स्थानीय जन भागीदारी के बिना संभव नहीं हो सकता है। हमारी सरकार, नीतिनिर्धारक व राजनेता इस तरफ सोचना चाहिए। ऐसे में एक ही रास्ता है की सरकार जन भागीदारी से इस समस्या का समाधान निकालें तथा उझी क्षेत्र के स्थानीय लोगों, होटल व लघु पर्यटन सेवाओं से जुड़े करोवरीयों से मिल कर कोई रास्ता प्रदेश व स्थानीय लोगों के हित में निकले जो पर्यावरण मित्र हो तथा स्थानीय लोगों को रोजगार व आजीविका प्रदान करे। हमारा निम्न सुझाव है ;-
1 उझी क्षेत्र के स्थानीय लोगों, होटल व लघु पर्यटन सेवाओं से जुड़े करोवरीयों को एक मंच से एक राय के साथ अपना मत टिकाऊ, पर्यावरण मित्र, रोजगार मूलक, लोक मित्र व जिम्मेवार पर्यटन पर रखना चाहिए।
2 सरकार को इस मुड़े पर जनता के साथ चर्चा में बैठना चाहिए और जो लोग मिल कर तय करें उस पर अमल करके एनजीटी के समक्ष अपना पक्ष रखना चाहिए। और भी कानूनी रास्ते मिल कर तलाशे जा सकते हैं।
3 मनाली रोहतंग पर एक पूरी परियोजना का प्रकल्प तैयार कर्ण चाहिए, जिस में क्या-क्या पर्यटन से संबन्धित गतिविधियां संचालित की जाएंगी का उलेख हो तथा पर्यावरण संरक्षण व रोजगार की संभावनाओं को इंगित करना होगा। उन्हें कैसे संचालित किया जाएगा का पूरा हवाला देना होगा, जिस में पर्यावरण सरक्षण, स्वछता, कचरा प्रबंधन, पार्कींग, काम से काम छ: स्थानों पर शॉपिंग व खाद्य तथा मनोरंजन के स्थानों का निर्धारण व उसकी प्रबंध योजना का प्रारूप पेश करना होगा। इस का प्रबंधन कौन करेगा, नियम कायदे भी बनाने होंगे जिस का लागू करने का जिम्मा किस का होगा भी दिखाना पड़ेगा।
4 प्रदेश सरकार को भी अपनी पर्यटन नीति बनानी होगी जो टिकाऊ, पर्यावरण मित्र, रोजगार मूलक, लोक मित्र व जिम्मेवार पर्यटन जैसे पहलुओं पर आधारित हो।
में अगले कल 13 जुलाई को मनाली में स्थानीय लोगों से चर्चा करने के लिए इस मसले पर आऊंगा। इस संदर्भ में जिलाधीश कुल्लू से मेरी बात आज सुबह हुई थी, वह भी शायद 14 जुलाई को स्थानीय लोगों से बात करेंगे।
गुमान सिंह
राष्ट्रीय संयोजक – हिमालय नीति अभियान