एनसीआर का पानी, नदी और नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल
एनसीआर का पानी, नदी और नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल
नई दिल्ली। राष्ट्र्रीय राजधानी क्षेत्र का दायरा फैला; आबादी बढ़ी; साथ-साथ पर्यावरण की चिंता की लकीरें भी। कहना न होगा कि पानी और नदी के मोर्चे पर राष्ट्र्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली ने काफी कुछ खोया है। दिल्ली, पानी के मामले में एक परजीवी शहर है। नोएडा और गुड़गांव के कदम भी इस पराश्रिता की ओर बढ़ चुके हैं और ग्रेटर नोएडा में पानी में प्रदूषण से पैदावार कैंसर के मरीज़। साबी नदी का नाम हमने नजफगढ़ नाला रखा ही है। हिंदन और यमुना, को भी इसी दिशा में जाते प्रवाह हैं। चेत गया हाथों ने गुहार लगाई। लगी गुहार को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल का भरौसा मिला। इस भरौसे ने उम्मीद जगाई और चेतना भी। संभव है कि इससे हमारा स्वार्थ शर्मा जाए और हमारी नदियां जिन्दा हो जाएं; हमारा भूजल लौटी। देखिए, पानी के प्रति हमारी चेतना और अनुशासन का आह्वान करते कुछ हरित फैसले:
अरावली की जमीन
अरावली की पहाड़ियों को हरियाली चाहिए और इनकी तराई, जल संचयन के लिए मुफ़ीद जगह हैं। इन पर अतिक्रमण, प्रकृति की हकदारी पर अतिक्रमण है। अरावली पहाड़ियों पर हरियाणा के हिस्से में भू-माफियाओं द्वारा किए जा रहे अवैध निर्माण को सरकार द्वारा रोकने को लेकर दायरा एक याचिका में न्यायाधिकार ने हरियाणा सरकार को चार सप्ताह में जवाब देने को कहा।
पक्षियों के हिस्से का पानी
आकाश वशिष्ठ द्वारा पेश आवेदन (मूल सं. 121/2013) में अकबरपुर पर्यावास को पर्यावणीय दृष्टि से संक्षित क्षेत्र घोषित करने तथा इसे प्रहावित करने वाले क्षेत्र में निर्माणरत शिवनाडर यूनिवर्सिटी की मंजूरी रद्द करने की मांग की गई थी।


