नई दिल्ली। दिल्ली विश्वविद्यालय में इस अकादमिक सत्र से लागू किया गया चार साला स्नातक प्रोग्राम (एफवाईयूपी) का विरोध रुकने का नाम नहीं ले रहा है। इसे पूरी तरह से छात्र विरोधी बताया जा रहा है। सोशलिस्ट युवजन सभा (एसवाईएस) ने दिल्ली व देश के सभी छात्रों, अभिभावकों और शिक्षकों से अपील की है कि वे एफवाईयूपी का हर स्तर पर हर सम्भव पुरजोर विरोध करें और सरकार पर इसे अविलम्ब रद्द करने का दबाव डालें।

एसवाईएस के नेता नीरज सिंह ने कहा कि आनन-फानन में यह प्रोग्राम लागू करके मानव संसाधन मंत्री और दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति ने विशेष तौर पर सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों के हितों पर भारी कुठाराघात किया है। इस प्रोग्राम से शारीरिक तौर पर विकलांग छात्रों की पढ़ाई बुरी तरह बाधित होगी। शिक्षा-प्राप्ति के रास्ते में पहले से ही कई तरह की बाधाओं से घिरी देश की लड़कियों, विशेष तौर पर गांव-कस्बों की लड़कियों के लिये उच्च शिक्षा और ज्यादा दुर्लभ होगी। ऑनर्स की डिग्री हासिल करने के इच्छुक छात्रों का एक साल अतिरिक्त बरबाद होगा और उनके अभिभावकों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि मन्त्रालय, कुलपति और यूजीसी के सामने यह हकीकत अच्छी तरह से खुल कर सामने आ चुकी है कि यह प्रोग्राम उच्च शिक्षा की वर्तमान राष्ट्रीय नीति के खिलाफ है और बिना समुचित तैयारी के अलोकतान्त्रिक ढँग से लागू किया गया है। देश के जाने-माने शिक्षाविदों और विद्वानों ने इस प्रोग्राम की गम्भीर समीक्षा करने के बाद अपना विरोध दर्ज किया है। उनमें से कई ने राष्ट्रपति और प्रधानमन्त्री को पत्र लिखे हैं। कई सांसदों ने भी अपना विरोध लिख कर भेजा है।

नीरज सिंह ने कहा कि यह अत्यन्त दुर्भाग्यपूर्ण है कि अपने पद की गरिमा और जिम्मेदारी का निर्वाह न करके मानव संसाधन मन्त्री और कुलपति एफवाईयूपी के बारे में झूठे सपने दिखा रहे हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय के कुछ शिक्षक नेता मन्त्री और कुलपति का साथ दे रहे हैं। छात्र हितों की रक्षा का सर्वोच्च मंच दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ (डूसू) पूरे प्रकरण पर चुप है। देश के राष्ट्रपति, जो दिल्ली विश्वविद्यालय के विजिटर भी हैं, और प्रधानमंत्री ने भी छात्र और उच्च शिक्षा विरोधी एफवाईयूपी की तरफ से आंखें बंद की हुई हैं। ऐसा क्यों है? दरअसल, यह नवउदारवादी नीतियों के तहत देश के प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों को नष्ट करके यहाँ विदेशी विश्वविद्यालयों के लिये शिक्षा का बाजार उपलब्ध कराना है। छात्रों के कैरियर और शिक्षा व्यवस्था के साथ खिलवाड़ का ऐसा उदाहरण दुनिया में अन्यत्र नहीं मिलता।