अब जब बिहार में चुनाव फुनाव खत्म हो गया । सत्य की जीत हुई , असत्य की हार हुई । मुख्य मंत्री ही नहीं , उप मुख्य मंत्री भी बन गए । मंत्री भी बन गए । विभाग भी बंट गए । नीतीश कुमार ये तूने क्या किया । कुछ नहीं ख्याल किया हम कलमघिस्सुओं का । ले दे के इतना ही छोड़ दिया कि कुछ और मंत्री बन सकते हैं । चलो इतना ही काफी है – हमारे टाइम पास के लिए । कर लेंगे । एक आप ही नहीं हो देश में । बहुत सारे लोग हैं टाइम पास के लिए । हम उन लोगों में से नहीं हैं कि बिहार की सड़क से गुजरने वाले ट्रकों से बिहार पुलिस की चौथ वसुली की गिनती करें । ट्रक के गुजर जाने के बाद पढ़ते रहें – ओके टाटा बाय बाय ।
टाटा पर बात चलती है तो याद आता है अपना पुराना नारा – टाटा – बिड़ला – डालमिया का राज है , पूंजीपतियों के सिर पर ही ताज है । हम नहीं बदले , नारा नहीं बदला । वक्त के साथ वह पूंजीपति नहीं कॉरपोरेट हो गया । टाटा बेचारा अंबानी से नीचे हो गया । बिड़ला मोबाइल आयडिया हो गया । डालमिया सिर्फ यादों का डालमिया नगर हो गया । डालमिया नगर भी हो कर ही रह गया ओके टाटा बाय बाय ।
टाटा कभी हमारा था । जब बिहार के पास छोटानागपुर – संतालपरगना था । 2000 से यह झारखंड हो गया । हमारे पास कुछ पहले भी नहीं था । फिर भी हमने बालू का खेल खेल दिया । लोग बालू का महल बनाते थे , हमने बिहार को अपार्टमेंट का स्लम बना दिया । पता नहीं बालू में कितना मिलता है सिमेंट या सिमेंट में मिलता है बालू । हमने न जाने कब से क्वालिटी को कह दिया ओके टाटा बाय बाय ।
अब क्या कहें बिजली के बारे में । बड़ी जालिम चीज है यह बिजली । एक मेगा वाट बनाओ तो तीन की जरूरत खड़ा कर देता है । बिजली न हुई , विधायक हो गया । मंत्री न बना तो असंतुष्ट हो गया । बिजली का पैदा करना है बहुत मुश्किल । आसान बिजली तो सर्दियों की धूप में गप्पबाजी का लॉन हो गया । सौर उर्जा हो अपार्टमेंट के छत पर यह विचार कागज पर रहा । पर अमल में यह भी हो कर रह गया ओके टाटा बाय बाय ।
टाटा के चाय बागान भी है । अपने बागान की हिफाजत के लिए उत्तरपूर्व के उग्रवादियों को भी चौथ देता है । बात पुरानी है । धंधा में चलता ही पिलाना चाय पानी । और कहां कहां खिलाता है टाटा , कौन जाने । यह तो कारोबार का चलन है । टाटा कम बेईमान जाता है । यह भी कह सकते हैं कि सैद्धांतिक बेईमान है । बेईमानी और भ्रष्टाचार में अंतर होता है । यूं समझिए कि बिना दौरे का भत्ता बेईमानी है और दौरा कर काम करना भ्रष्टाचार होता है । इसी लिए भ्रष्टाचार होता है ओके टाटा बाय बाय ।
पर पता नहीं क्या किया असली टाटा रतन ने कि कहने लगे टेप पर रोक लगाओ । टेप का इस्तेमाल जांच में करो ,उसे अखबार में तो न छपाओ । पौने दो हजार करोड़ के स्पेक्ट्रम घोटाले में उनका भी नाम आ कर भी नहीं आया है । वह संदेह के घेरे में हैं । या संदेह उनके घेरे में है । उस मंत्री का नाम नहीं बताते जिसने उड़ान अनुमति के लिए पंद्रह करोड़ की बोली लगाई । नेता की तरह बात करते हैं ,अपनी बात से ही मुकरते है । हम तब क्या कहें , यही न ओके टाटा बाय बाय