ओबामा बनाम ओसामा : इंसानियत की नज़र में
ओबामा बनाम ओसामा : इंसानियत की नज़र में
देवेन्द्र वर्मा
इस सृष्टि में प्रत्येक प्राणी और वस्तु अपने मौलिक गुणों के लिए जाने जाते है कुत्तावफादारी के लिए ,हाथी सीधे -साधे प्राणी के रूप में ,शेर साहस के लिए, पेड़-पौधे अपनी खुशबू व् जीवनदायिनी दवाओं के लिएऔर धरा की माटी भी अपनी सोंधी महक से सभी प्राणियों को मदमस्त कर देने के रूप ! मगर इन्सान क्या अपनी इंसानियत के लिए पहचाना जाता है ? इस सवाल का जवाब सकारात्मक देना, सकारात्मक सोचने की अतिरेक प्रवृत्ति के सिवा कुछ नहीं ! मगर मेरा मानना है कि इन्सान के सिवा अन्य प्राणी अपने मौलिक गुण के लिए जिस पूर्णतः के साथ जाने जाते है निश्चित रूप से इन्सान उस पूर्णतः की ऊंचाई से कोसों दूर है सामान्यतः इंसानियत का संबंध इन्सान से तो है मगर यदि इंसानियत की जरूरत किसी को पड़ जाय तो अवश्य ही निराश होनापड़ेगा ! ऐसाहीं कि इंसानियत का अस्तित्व नहीं है इंसानियत है मगर अपने विद्रूप रूप में क्योंकि इन्सान ने अपनी आवश्यकता के लिए उसे
वेश्या बना दिया है वह आज वेश्या की तरह खरीदी वबेचीं जाती है जो पैसाखर्च करे इंसानियत को वह रखैल बना कर रख सकता हैसकारात्मकसोचने वालों की इंसानियत कायही असली रूप है इन्सान का अपनी बौद्धिकता का दावा कितना हास्यास्पद लगता है वह प्रत्येक क्षणकोई न कोई कारनामाकर रावण की तरह घमंड में चूर होकर ठहाका लगा रहा है! जिस तरहअमेरिका ओसामाको मार कर यह सिद्ध करना चाहता है कि जैसे उसने आतंकवाद से विश्व को मुक्ति दिला दी हो !सच प्रत्येक इन्सान जानता है कि ओसामा एक इन्सान मात्र मारा गया ,आतंकवाद की विचारधारा नहीं ! जिसे अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिए अमेरिका ने आतेंकवादी बनाया था जब वह अमेरिका के इशारे पर किसी देश में आतंकी कार्यवाही करता था जब वह अमेरिका के लिए आतंकवादी नहीं था !इसीलिए आज अमेरिका के आतंकवाद के खिलाफ जेहाद के अभियान के साथ कोई खड़ा नजर नहीं आ रहा है उसके मारने की खबर के साथ सम्पूर्ण विश्व में असंख्य ओसामाओं ने पुनर्जन्म ले लिया है इसलिए नहीं कि वे आतंकवाद के समर्थक है बल्कि हर इन्सान का मन अमेरिका की अपनी आवश्यकता के लिए आतंकवाद की परिभाषाएं बदलने की सोंचऔर चाल से उद्धेलित है, खिन्न है !इसीलिए वह आज अमेरिका के साथ नहीं, ओसामा के साथ खड़ा दिखाई दे रहा !हाला यह है कि न अमेरिका सच के साथ है और न ओसामा के असंख्य समर्थक ! और ऐसी दशा में किसी की तरफ उगली उठाना न्यायोचित नहीं ! भविष्य ही बताएगा कि अमेरिका के दावे में कितना सच है अमेरिका में जश्न है इस मुर्खता पर कि ओसामा के साथ आतंकवाद की विचारधारा का भी खात्मा हो गया !भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भी हालात मिलते-जुलते है भ्रष्टाचार में जो पूरी तरह डूब चुके है वही भ्रष्टाचार से मुक्त शासन-प्रशासन और समाज बनाने का बीड़ा उठा रहे है और अपने को भ्रष्टाचार विरोधी कानून से मुक्त का जुगत निकालने में जुटे है !ये भ्रष्टाचार रुपी दरख़्त की महज पत्तियां व् डाले कट रहे है समूल उखड फेकने में उनक!स्वयं का अस्तित्व खतरे में पड़ने का भय है यही ठेके दारों ने इंसानियत को इस बदतर स्थिति तक
पहुँचा दिया है ! इंसानियत इस बात पर शर्मसार है कि जिस इन्सान के व्यक्तित्व की मै पहचान, मौलिकता,विशिष्टता और शोभा हूँ आज वही मुझे बेइज्जत कर बौद्धिक प्राणी होने का ढोग रच रहा है ऐसे इन्सान को लानत है जो अपनी पहचान ही मिटाने पर तुला है!
लेखक लखनऊ स्थित पत्रकार हैं


