कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों को अविलम्ब रिहा करने की माँग
कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों को अविलम्ब रिहा करने की माँग
नई दिल्ली: जन संस्कृति मंच ने कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों को अविलम्ब रिहा करने की माँग की है।
जन संस्कृति मंच के राष्ट्रीय सहसचिव, सुधीर सुमन द्वारा एक विज्ञप्ति में कहा गया है कि महाराष्ट्र में कबीर कला मंच (पुणे) के इंकलाबी संस्कृतिकर्मियों के खिलाफ लम्बे समय से जारी राज्य दमन की हम कठोर शब्दों में निन्दा करते हैं और विगत एक अप्रैल को महाराष्ट्र विधानसभा के समक्ष सत्याग्रह करते हुये गिरफ्तार किये जाने वाले चर्चित संस्कृतिकर्मी शीतल साठे और सचिन माली की अविलम्ब रिहाई की माँग करते हैं। गर्भवती शीतल साठे को न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया है और सचिन माली को एटीएस के हवाले कर दिया गया है। उन्होंने कहा है कि इंकलाबी संस्कृतिकर्मियों के साथ राज्य सत्ता का यह पूर्णरूपेण गैर-लोकतान्त्रिक और आपराधिक व्यवहार है। अखबार जिसे नक्सल समर्थकों का आत्मसमर्पण कह रहे हैं, वह आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि फर्जी आरोपों के कारण भूमिगत होने के लिये मजबूर किये गये और आतंकवाद निरोधक दस्ता द्वारा निरन्तर तलाशी की प्रतिक्रिया में उठाया गया लोकतान्त्रिक प्रतिवाद है।
जन संस्कृति मंच के साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों ने कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों के लोकतान्त्रिक-संवैधानिक अधिकारों के साथ पूरी तरह एकजुटता जाहिर करते हुये उनको राज्य मशीनरी द्वारा प्रताड़ित किये जाने तथा उन्हें गिरफ्तार किये जाने के खिलाफ व्यापक स्तर पर प्रतिवाद की अपील की है। जन संस्कृति मंच की सारी इकाइयाँ इस प्रतिवाद को संगठित करेंगी।
विज्ञप्ति में कहा गया है कि शासक वर्ग की राज्य मशीनरी लगातार दलाल, गुलाम और समझौतापरस्त बनाने की जो सांस्कृतिक मुहिम चलाती रहती है, जिसकी चपेट में बुद्धिजीवियों और कलाकारों का भी अच्छा-खासा हिस्सा आ जाता है, उसके समानानतर अगर कोई जनता की ज़िन्दगी में बदलाव के लिये संस्कृतिकर्म को अपनी ज़िन्दगी का मकसद बनाता है और सामाजिक-राजनीतिक वर्चस्व और शोषण-उत्पीड़न का विरोध करता है, तो वह अनुकरणीय है और उससे समाज में बेहतर परिवर्तन की उम्मीद बँधती है। कबीर कला मंच के संस्कृतिकर्मियों ने दलितों, कमजोर तबकों व मजदूरों के उत्पीड़न, शोषण और उनके हिंसक दमन के खिलाफ लोगों में चेतना फैलाने का बेमिसाल काम किया है। उन्होंने प्राकृतिक संसाधनों की लूट और भ्रष्टाचार के खिलाफ भी अपने गीतों और नाटकों के जरिये लोगों को संगठित करने का काम किया है। यह इस देश और इस देश की जनता के प्रति उनके असीम प्रेम को ही प्रदर्शित करता है।
शीतल और सचिन ने एटीएस के आरोपों से इनकार किया है कि वे छिपकर नक्सलियों की बैठकों में शामिल होते हैं या आदिवासियों को नक्सली बनने के लिये प्रेरित करते हैं। दोनों का कहना है कि वे डॉ. बाबा साहेब अंबेडकर, अण्णा भाऊ साठे और ज्योतिबा फुले के विचारों को लोकगीतों के माध्यम से लोगों तक पहुँचाते हैं। सवाल यह है कि क्या अंबेडकर या फुले के विचारों को लोगों तक पहुँचाना गुनाह है? क्या भगत सिंह के सपनों को साकार करने वाला गीत गाना गुनाह है? जसम ने कहा है कि सवाल यह भी है कि अगर कोई संस्कृतिकर्मी माओवादी विचारों के जरिये ही इस देश और समाज की बेहतरी का सपना देखता है, तो उसे अपने विचारों के साथ एक लोकतन्त्र में संस्कृतिकर्म करने दिया जायेगा या नहीं?
इसके पहले मई 2011 में एटीएस (आतंकवाद निरोधक दस्ता) ने कबीर कला मंच के सदस्य दीपक डांगले और सिद्धार्थ भोसले को दमनकारी कानून यूएपीए के तहत गिरफ्तार किया था। दीपक डांगले और सिद्धार्थ भोसले पर आरोप लगाया गया कि वे माओवादी हैं और जाति उत्पीड़न और सामाजिक-आर्थिक विषमता के मुद्दे उठाते हैं। पिछले दो सालों में इस आरोप को साबित करने के लिये कुछ किताबें पेश किये गये और यह तथ्य पेश किया गया कि कबीर कला मंच के कलाकार समाज की खामियों को दर्शाते हैं और अपने गीत-संगीत और नाटकों के जरिये उसे बदलने की जरूरत बताते हैं। जसम का कहना है कि प्रशासन के इस रवैये के कारण कबीर कला मंच के अन्य सदस्यों को छिपने के लिये विवश होना पड़ा, जिन्हें राज्य ने ‘फरार’ घोषित कर दिया। राज्य के इस दमनकारी रुख के खिलाफ कबीर कला मंच के इन युवा कलाकारों के पक्ष में प्रगतिशील-लोकतान्त्रिक लोगों की ओर से दबाव बनाने के बाद गिरफ्तार कलाकारों को जमानत मिली। जाहिर है उसी आरोप में शीतल साठे और सचिन को भी पकड़ा गया है।
जसम ने कहा है कि वह सिर्फ जमानत से संतुष्ट नहीं है, बल्कि माँग करते हैं कि कबीर कला मंच के कलाकारों पर लादे गये फर्जी मुकदमे अविलम्ब खत्म किये जायें और उन्हें तुरन्त रिहा किया जाये, संस्कृतिकर्मियों पर आतंकवादी या माओवादी होने का आरोप लगाकर उनकी सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को बाधित न किया जाये तथा उनके परिजनों के रोजगार और सामाजिक सुरक्षा की गारंटी की जाये।


