कब तक जलती रहेंगी बस्तियां ? आग लगती है या लगायी जाती है ?
कब तक जलती रहेंगी बस्तियां ? आग लगती है या लगायी जाती है ?
कब तक जलती रहेंगी बस्तियां ?
आग लगती है या लगायी जाती है ?
सुनील कुमार
नई दिल्ली। 19 तारीख को हम सब जब नींद के आगोश में थे, उसी समय तड़के करीब 1.45 बजे (1.45 AM) मंगोलपुरी के टी ब्लॉक की झुग्गी-बस्ती में रहने वाले करीब 300 परिवार अपनी ज़िन्दगी बचाने के लिए जद्दोजहद कर रहे थे। इस झुग्गी-बस्ती में किसी का घर कच्चा तो किसी का पक्का बना हुआ है, किसी का घर प्लास्टिक शीट का है तो किसी का घर ईंट का है जिसके ऊपर एम्बेस्डर की छत है।
यहां इस बस्ती में लोगों के रहने की जगह के साथ-साथ रोजगार के साधन भी हैं। यहां के ज्यादातर लोग फैक्ट्रियों से रबड़, प्लास्टिक, कपड़ों के कबाड़ लाकर छांटने का काम करते हैं, इससे उनकी जीविका चलती है।
यहां पर कुछ बाहरी लोगों द्वारा कबाड़ का गोदाम भी बनाया गया है। यह झुग्गी बस्ती भौगोलिक दृष्टिकोण से बहुत ही महत्वपूर्ण जगह पर स्थित है। इसके एक तरफ मंगोलपुरी और उद्योग विहार के औद्योगिक क्षेत्र हैं तो दूसरी तरफ मजरा गांव और मंगोलपुरी का टी, यू ब्लॉक है। सुल्तानपुरी, मंगोलपुरी की सभी बसें इस झुग्गी-बस्ती के नजदीक से ही गुजरती हैं।
यह झुग्गी बस्ती 1984 से स्थित है, लेकिन कई झुग्गियां उसके बाद भी वहां बनी। इस बस्ती में ज्यादातर लोग यूपी के मथुरा से हैं तो कुछ बिहार, हरियाणा, पश्चिम बंगाल से हैं। सुविधा के नाम पर इस बस्ती में बिजली है, पानी टैंकर से आता है और शौचालय के लिए खुले मैदान में जाना होता है। इस बस्ती से 20 फीट की दूरी पर गैस की तीन एजेंसियां हैं। इस बस्ती में इससे पहले भी दो बार आग लग चुकी है।
आग की भयावहता
18 तारीख की रात कोई ड्यूटी से लौटकर सोया होगा, कोई बच्चा टी वी देखते हुए तो कोई पढ़ते हुए सो गया होगा कि सुबह उठ कर अपने काम पर जाना होगा, स्कूल जाना होगा। रामचन्द्र अपनी ड्यूटी खत्म कर रात के 1.30 बजे झुग्गी में आकर सो गये। थोड़ी देर में शोर से रामचन्द्र की आंखे खुलीं और दरवाजा खोलकर जैसे ही वह बाहर आये उस दृश्य को देख कर कांप उठे। वह अपनी झुग्गी में दुबारा बिना गये बाहर की तरफ जान बचाने के लिए भागे। यह आग इतनी भयावह थी कि दमकल की 30 गाड़ियां करीब 3 घंटे बाद आग पर काबू पा सकीं।
इस आग में लोगों के तन (शरीर) के कपड़े के अलावा और कुछ नहीं बचा। बच्चों की किताबें, कपड़े, रोजमर्रा की वस्तुएं, टी.वी., फ्रिज, चारपाई, रिक्शा, रुपये, जेवर सब कुछ इस आग में जलकर स्वाहा हो गये। इस आग ने लोगों के रहने का घर ही नहीं, बल्कि उनका रोजगार भी छीन लिया है। घर के बर्तन से लेकर रोजमर्रा की कोई भी वस्तु नहीं बची है। बच्चों की किताबें-कॉपी, ड्रेस सब कुछ जल कर खाक हो चुके हैं। इनके पास जीविका के जो भी साधन थे मसलन रिक्शा, टेबल वगैरह-वगैरह.... सब जलकर खाक हो चुके हैं। बस्ती के ऊपर से 60 हजार वोल्टेज के तार गुजरते हैं, जो आग की तपिश से गलकर टूट गये, इनके लोहे के पोल तक टूट गये।
विजयपाल, जो कि बस्ती के बाहर अंडे की दुकान लगाते थे, उनकी टेबल, बर्तन, अंडे जल गये। अब वह मायूस हैं और पूरे दिन घर पर इस आस में रहते हैं कि कोई सहायता उनको मिल जाये जिससे कि वह घर पर प्लास्टिक डाल कर अपना रोजगार शुरू करने की सोचें।
साइना जो अपने पति और चार बच्चों के साथ इस बस्ती में रहती है, अपने जले हुए घर के पास बैठ कर आंसू बहा रही है। साइना को सांत्वना देने के लिए उनके रिश्तेदार बवाना से आये हैं, साथ में उसके लिए एक-दो कपड़े भी लेकर आये हैं। साइना अपनी झुग्गी में ही पकौड़े और चाय बेच कर गुजारा करती थी, लेकिन उसने कुछ दिनों से चाय बेचना बंद कर दिया था, क्योंकि लोग उधार पर लेते थे, पैसे नहीं देते थे। अब वह सिर्फ पकौड़े ही बेचती है जो कि बच्चे खरीद कर ले जाते हैं।
साइना के पति मन्टू मोमीन के पैरों के तलवे में गांठ है जिससे उनको चलने में परेशानी होती है। पैसा नहीं होने के कारण वह कभी किसी डॉ. के पास नहीं गये और मेडिकल स्टोर से 30 रुपये की पट्टी खरीद कर लाते हैं और उसको ही चिपका देते हैं जिससे उनको चार-पांच दिन के लिए आराम मिल जाता है। साइना पकौड़े बेचकर अपना तथा अपने चार बच्चों का खर्च किसी तरह चलाती है और उनको स्कूल भी भेजती है।
डर के मारे साइना अपनी जली हुई जगह से एक घंटे के लिए भी नहीं हटती, उसको डर है कि दबंग लोग उसकी जगह पर कब्जा कर लेंगे। इस तरह का डर कई परिवारों को सता रहा है। वो अपने बच्चों को खाना लाने के लिए भेजते हैं, लेकिन अपनी जली हुई जगह से नहीं हटते।
राजवीर कहते हैं कि आग में सब कुछ जल कर स्वाहा हो गया। थोड़ा-बहुत जो भी सामान बचाने की कोशिश की, तो उस सामान पर चोरों ने हाथ साफ कर दिया। राजवीर और उनकी पत्नी यहीं पर कबाड़ छांटने, लोडिंग का काम दिहाड़ी पर करते हैं। जिसके लिए राजवीर को 200 रुपये तथा उनकी पत्नी को 130 रुपये मजदूरी मिलती है। इसी तरह यहां पर ज्यादातर लोग दिहाड़ी पर, तो कुछ लोग महीने के हिसाब से काम करते हैं।
आकाश नवीं कक्षा के बाद पढ़ाई छोड़कर घर के लोगों के लिए रोटी जुटाने में जुट गया। आकाश के पिता को टीबी की बीमारी है। वह उद्योग विहार के 20 कम्पनियों से वैकूलाईट का कबाड़ उठाने का काम करता है। इस कबाड़ को घर पर तोड़कर मां-पिता पीतल, तांबा, लोहा निकालते हैं और उसे बेचकर परिवार की रोटी का जुगाड़ करते हैं। आकाश के परिवार वालों ने दीपावली व अन्य कामों के लिए 22 हजार रुपये जोड़े थे, लेकिन इस आग से सब कुछ खत्म हो गया। आकाश का पड़ोसी दीप कुमार छठवीं में पढ़ता है, वह अपनी जली हुई किताबों के टुकड़े को उठाने में लगा हुआ था।
इस आग ने आकाश और दीप कुमार के साथ-साथ करीब 150 परिवारों के घरों को उजाड़ कर रख दिया है। अब सभी को एक ही चिंता सता रही है कि ठंड का मौसम आने वाला है और उनके पास पैसे नहीं है, कपड़े नहीं है, कैसे जुगाड़ होगा? लोगों के कई सालों की मेहनत की कमाई से जुटाये गए पैसे, सामान जल कर खाक हो चुके हैं। शासन-प्रशासन का यह रवैया है कि उनको समय से खाना भी नहीं मिल रहा है। 25 तारीख की शाम को 3 बजे जब मैं वहां गया था तो सुनीता व शीला ने बताया कि आज सुबह से हमें नाश्ता तक नहीं मिला है। अब छोटे कागज की प्लेट में चावल मिल रहा है। जब मैंने सिविल डिफेंस के एडीशनल चीफ बी.एस. सोलंकी से खाने के बारे में पूछा तो उनका कहना था कि सब कुछ दिया गया है। सोलंकी ने बात करते हुए यह बताया कि इनका कोई भी सामान नहीं जला है! आग लगने वाले दिन दिल्ली के मुख्यमंत्री आये थे और 5 मिनट की खानापूर्ती के बाद बस्ती से चले गये थे और जले हुए घरों के प्रत्येक परिवारों के लिए 25 हजार देने की घोषणा कर गये। राजनीतिक पार्टियां थोड़ी सहायता देकर ज्यादा फोटो खिंचवा रही हैं।
दिल्ली में काफी जगहों की झुग्गियों में आग लगी है, लेकिन किसी भी आग की जांच नहीं कराई गई। नहीं तो आज तक पता चल जाता कि आग कैसे लगी या लगायी जाती है। अधिकांश जगह यह देखा गया है कि आग लगने के कुछ दिनों बाद उन बस्तियों को उजाड़ भी दिया जाता है। दिल्ली के मुख्यमंत्री एक सिपाही की मृत्यु पर करोड़ रुपये दे सकते हैं, लेकिन एक जले हुए घर के लिए मात्र 25 हजार रु. देने की घोषणा करके अपने फर्ज की इति श्री कर लेते हैं। चुनाव के समय वोट मांगने वाली और अपने आपको गरीबों की हितैषी कहने वाली पार्टियां अभी कहां हैं? हर झुग्गी को मकान देने वाले प्रधानमंत्री की घोषणा कब लागू होगी? कम से कम इन जले हुए घर वालों को तो मकान दे देते। ये बस्तियां कब तक जलती रहेंगी कब तक लोग खुले आकाश के नीचे ज़िन्दगी गुजारते रहेंगे?


