बेचारे कवि जी । उनको ले कर बड़ा पुराना एक लतीफा है । उस जमाने की कहावत है जब कवि बेचारे मारे मारे फिरते थे । इस मार से बचने के लिए ज्यादातर कवि पत्रकार हो गए , अध्यापक हो गए – और तो और आलोचक भी हो गए । यह सब करने की प्रेरणा , जैसा कि रीतिकाल के कवि बताते हैं उन्हें एक राजवैद्य से मिली थी । अब राज्यवैद्य तो राज्यवैद्य ठहरे । रोज राजा का इलाज करते थे । राजा को कोई बड़ी भारी बीमारी नहीं थी । राजपाट के भ्रष्टाचार का अपच हो गया था । हाजमा दुरुस्त नहीं रहता था । कब्जियत भी बनी रहती थी । राजाओं को अकसर ऐसी बीमारी हो ही जाती है । कुछ किया नहीं जा सकता था । बीमारी की जड़ में भ्रष्टाचार था । इसे खत्म भी नहीं किया जा सकता था । इसके समाप्त हो जाने से लोग तरह तरह के सवाल उठाते थे । कोई बड़ा सवाल नहीं होता था । बस यही कि महंगाई बहुत बढ़ गई है । लोग भर पेट खा नहीं पाते हैं । कवि जी इसी जन भावना को यूं गा कर सुनाते थे कि नेता जी तो खूब नाम कमात हैं , पर भ्रष्टाचार की डायन खाय जाते है । एक हम कवि हैं कि खुब गाए जात हैं , पर भर पेट नहीं खात हैं । जाहिर है कि कवि जी भी राजा जी की तरह बीमार रहते थे । बीमार आदमी का एक ही ठौर ठिकाना होता है । राजवैद्य का दरबार । वहां भी जा कर बीमारी नहीं बताते थे , बस कविता ही सुनाते थे ।
अब रोज रोज महंगाई – भ्रष्टाचार सुनते सुनते राजवैद्य भी बोर हो गए । जो पचड़ा राजा का , वही कवि का – बहुत गलत बात है । थोड़ा अहंकार भी दुखा राज्यवैद्य का कि राजा तो राजा , इस कवि का भी कब्जियत दूर नहीं होता । एक दो कविता सुन कर राज्यवैद्य ने कवि जी को सलाह दी कि तुम्हारी बीमारी की जड़ में खाली पेट होना है । यह लो धन थोड़ा खा पी लो – उसके बाद भी कब्ज दूर न हुआ तो समझना कि तुम राजा से भी बड़े हो । खाने पीने का असर हुआ । इस पर शोध हो सकता है कि असर खाने का था या पीने का – मगर हुआ ।
कवि जी का कब्ज दूर हुआ । तब से कवि जी को भी बात समझ में आ गई । उनके होठों पर भी शीला की जवानी आ गई । और यहां शीला – वह बनी थी शील से । जब राजा के हाथ नहीं आनी थी तो कवि जी को कहां पकड़ानी थी । तब से कवि जी बेचारे कवि जी हो गए । कभी कजरारे – कजरारे थे – अब मुन्नी के लिए बदनाम हो गए । समय बदला । 21 वीं सदी आया । राजा ने तय किया कि थोड़ा राज भ्रमण किया जाए । ऐसा कहा जाता है कि राजा को राज्य का राज्य के खर्चे पर भ्रमण करना चाहिए । इससे राजा और राज्य दोनों की सेहत ठीक रहती है ।
राजा ने सोचा कि पहले राज्यवैद्य के इलाके का ही दौरा किया जाए । वहां तो सबकी सेहत ठीक ही रहती होगी । यह क्या राज्यवैद्य का पूरा परिवार राजा जी की स्वागत कर रहा था । पर राज्यवैद्य ही नहीं थे । पूछताछ पर पता चला कि राज्यवैद्य कवि जी का सम्मान करने गए हैं क्योंकि वही इकलौते मरीज हैं जो उनकी दवा से ठीक हो जाते हैं । राजा को लगा कि मुझसे बड़ा तो कवि है ।
इसी किस्से से प्रेरणा ले कर यूपीए 2 के राज्यवैद्य तमिलनाडु के मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री की अगवानी नहीं कि बल्कि कवि मित्र की चलत मुसाफिर मन तोड़ दियो रे सुनते रहे ।
तब से यह भी तय हुआ कि राजा से बड़ा बेचारे कवि जी हैं ।