कश्मीर पर आधा सच दिखाती अनुपम खेर की फिल्म : भावुकता में छिपी चालाकी
कश्मीर पर आधा सच दिखाती अनुपम खेर की फिल्म : भावुकता में छिपी चालाकी
कश्मीर को सियासत ने जहन्नुम बना दिया जहाँ दोज़ख कई परतों में बहती है
कश्मीर - ओवैसी और अनुपम खेर सरीखे लोग घावों को भरने नहीं देते
सोशल मीडिया पर अत्यंत भावुकतापूर्ण अनुपम खेर वाला वीडियो काफी चल रहा है। कश्मीरी पंडितों के दुःख तकलीफ़ों को सामने रखते हुए ये वीडियो चतुराई से कुछ बताता है और कुछ छिपाता है। जो वो नहीं बताता है वो जानना और दूसरों तक पहुंचाना बहुत ज़रूरी है, वर्ना करोड़ों लोगों को करोड़ों का दुश्मन बनाने वाली इनकी साज़िशें कामयाब होती जाएंगी। किताबों से काफी हद तक विरक्त हो रहे बच्चों को व्हाट्सप्प और फेसबुक पर झूठे ज्ञान की खुराक देना काफी आसान है।
कुछ दिनों पहले फिर से ऑस्ट्रेलिया की पूर्व प्रधानमन्त्री जूलिया गिलार्ड के हवाले से भी ऐसे ही एक झूठी पोस्ट फ़ैली थी कि उन्होंने वहां रह रहे मुसलामानों को साफ़ कह दिया है कि रहना है तो हमारे हिसाब से रहो, वर्ना देश से बाहर कर देंगे। मैंने ये पोस्ट एक पत्रकारों के समूह पर पढ़ी और तहकीकात की। जब तक असलियत पता चली तब तक तो अनेक विद्वान साथी जूलिया गिलार्ड की पीठ ठोक कर मोदी जी को भी ऐसा ही करने की सलाह दे चुके थे।
बहरहाल कश्मीर पर कुछ दूसरे पहलुओं पर भी सोचें। देशभक्ति एक विवेकसम्मत भावना होती है, उसका इस्तेमाल नशे और उपद्रव के लिए ना हो, इसका ख्याल रखें।
कश्मीर का एक पहलू और है जिसकी ओर अनुपम खेर और भाजपा इशारा नहीं करती, काँग्रेस तो ख़ुद इस हालत के लिए ज़िम्मेदार भी है।
कश्मीरी पंडितों पर जु़ल्म हुए या कश्मीरी मुसलमानों पर - ये अपने आप में एक बहसतलब बात है। कश्मीर में हज़ारों मुसलमान औरतें हाफ़ विडोज़ हैं, आज जिनके शौहर लापता हैं। कोई बीस साल से कोई दस साल से, वगैरह। भारत सरकार कहती है कि वे पाकिस्तान भाग गए, आतंकी बन गए। पाकिस्तान सरकार तो ज़ाहिर है, ये क्यों कहेगी, लेकिन जो सच कश्मीर में हुए अत्याचारों का सामने आया है, उसकी छोटी सी झलक माछिल, कुपवाड़ा और पठरीबल, अनंतनाग जैसे प्रकरणों से मिलती है, जहाँ भारत के फौजियों ने ही स्थानीय लोगों को झूठे एंकाउंटर्स में आफ्स्पा कानून का सहारा लेकर मार दिया था। यही हाल मणिपुर में भी हुआ। आफ्स्पा जैसे निरंकुश कानून को खत्म करने के लिए पिछले क़रीब 14 बरसों से इरोम शर्मिला लड़ रही है और वो लेखिका है और वामपंथी भी नहीं है। आखिरकार ये कानून त्रिपुरा से ख़त्म किया, लेकिन बाकी उत्तर पूर्वी राज्यों और कश्मीर में ये अभी भी बना हुआ है।
इसका ये मतलब नहीं कि जो कश्मीरी पंडितों पर जुल्म हुआ, वो ठीक था लेकिन कश्मीर में आतंकवाद की वजह से उन्हें अपना घरबार, कामधंधे छोड़ना पड़े जिसकी वजह स्वयं कश्मीरी मुस्लिम नहीं थे, पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद था, जिसके वहाँ फैलने में भारत सरकार की गलतियों की भी भूमिका थी और सिख अलगाववाद की भी। कश्मीरी मुसलमान भारत के प्रति वफ़ादार थे तभी वे पाकिस्तान के साथ जंग में भारत के साथ दिलेरी से लड़े। कैप्टेन हमीद जैसी अनेक कहानियाँ कश्मीरी मुसलमानों की भी हैं। एक रंजूर साहब को तो मैं ही जानता हूँ जिन्हें आतंकवादियों ने मार दिया था, जबकि वे भी मुसलमान थे। ऐसे ही पंजाबी कवि पाश को भी सिख आतंकवादियों ने मार दिया था, जो अलगाववाद के ख़िलाफ़ थे।
आज भी कश्मीर में आतंकवादी हत्याएँ करते हैं। अख़बार छापते हैं कि इतने लोग मरे लेकिन वो कौन होते हैं - हिंदू या मुसलमान? अब वहाँ अधिकतर मुसलमान ही बचे हैं। वही फौजियों की ज़्यादतियों का भी शिकार होते हैं और वही आतंकवादियों की गोलियों का भी।
अनुपम खेर तो ज़ाहिर तौर दक्षिणपंथी हैं पर लेकिन बहुत से और लोग भी कश्मीर समस्या को ठीक से जाने बगैर देशभक्ति का उबाल खाने लगते हैं।
सिवनी, मध्य प्रदेश के रंगकर्मी और लेखक मित्र ने अपने अनुभव साझा करते हुए बताया कि एक बार देहरादून यात्रा के दौरान एक कश्मीरी पण्डित से मुलाक़ात हुई। उसके परिवार को भी यातना झेलनी पड़ी थी। उसका कहना था कि कश्मीर की आम अवाम मिलनसार और भले दिल की है। नब्बे के दशक के दौर में जब कश्मीर में आतंकवाद चरम पर था तब जरूर उकसावे में कश्मीरी मुसलमानों ने पंडितों पर अत्याचार किया था, लेकिन ज्यादातर अत्याचारी सीमा पार के थे। अभी भी उनकी जमीन श्रीनगर के पास किसी गाँव में है। वहाँ के मुसलमान पड़ोसी उनकी जमीन पर खेती करते हैं और उसकी उपज उन तक काठगोदाम में पहुंचाते हैं। बीस साल से यह सिलसिला जारी है। वे पड़ोसी आज भी उन्हें वापस आने का आग्रह करते हैं, लेकिन उनका परिवार जो की अब काठगोदाम (उत्तराखण्ड)में बस चुका है तो वे वापस जाने की नहीं सोच रहे हैं।
उसने एक जो बात बताई उससे मुझे मानवता की एक उम्मीद यह मिली कि जब वो अपनी शादी के बाद अपनी बीबी को घुमाने कश्मीर लेकर गया तो अपने गाँव भी गया था। वहां वो हफ्ता भर रहा। उसके मुस्लिम पड़ोसियों ने उसकी बीबी का वैसा ही स्वागत किया जैसा लोग नई बहू का करते हैं। वो लोग उनके पुराने दिनों को याद करके बड़े भावुक भी हुए थे। उसका कहना था कि वहाँ के हिन्दू और मुसलमान राज्य और केंद्र सरकारों की नालायकियों का शिकार हुए हैं।
दूसरा अनुभव ट्रेन में एक कश्मीरी मुसलमान के अनुभव का है। वो भी अपनी जमीन जायदाद वहीँ छोड़ कर दिल्ली में रह रहा है। उसका कहना है कि कश्मीर की अवाम भारतीय फौज और आतंकवादियों दोनों के ही आतंक में जी रही है। दोनों ने ही उनकी बहू बेटियों की इज्जत लूटी है। सबसे ज्यादा गैंगरेप सेना के जवानों ने किए हैं, वो भी अफसरों की नाक के नीचे। सेना ने अत्याचार की इतनी इंतेहा की कि आतंकवादी उनकी नजर में देवता लगने लगे।
दोनों के अनुभव दिल दहलाने वाले थे। दरअसल कश्मीर को सियासत ने जहन्नुम बना दिया जहाँ दोज़ख कई परतों में बहती है। दर्द दोनों ने झेला है, लेकिन ओवैसी और अनुपम खेर सरीखे लोग घावों को भरने नहीं देते, वे लोग खुजाकर उसे और गहरा बना देते हैं। ओवैसी का तो नहीं पता, पर अनुपम खेर भले आदमी हैं। पर दिक्कत यह है कि उनकी वैचारिक क्षमता बड़ी सीमित है। बेचारे आज तक गोविन्द निहलानी और पहलाज निहलानी में फर्क नहीं समझ पाये। उनकी नजर में श्याम बेनेगल और डेविड धवन एक ही हैं। जैसा कि वो FTII के मुद्दे पर बोल चुके हैं।
और जहाँ तक कश्मीरी पंडितों के साथ हुए ज़ुल्म की बात है तो उनके ऊपर ज़ुल्म हुआ, इससे किसने कभी इंकार किया है। पूरे देश में उन्हें प्यार सहानुभूति ही नहीं, तमाम मदद दी गई। ये सच है कि उन्हें वापस कश्मीर नहीं बसाया जा सका, इसके अलावा उनके साथ केन्द्र से लेकर राज्यों तक अच्छा व्यवहार हुआ है। हर तरह की इमदाद दी गई। संसद में बहस के दौरान भाजपा कभी नहीं कह पाती कि कश्मीरी पंडितों को कुछ नहीं दिया गया क्योंकि वहाँ झूठ पकड़ा जाएगा, लेकिन बाहर लोगों को भड़काने के लिए झूठ बोलते हैं।
कश्मीरी पंडितों की व्यथा तो सब जानते हैं लेकिन कश्मीरी मुसलमानों की क्या बदहाली है,ये कौन जानता है। नर्क बना हुआ है। रोज़गार नहीं, पढ़ाई नहीं। स्कूल कॉलेज पर फौज का कब्जा। फौजियों के अत्याचार, बलात्कार.. दूसरी तरफ़ आतंकवादियों की ज़बर्दस्ती। वे तो हर तरफ़ से पिस रहे हैं।
कश्मीरी मुसलमानों के पास पहले सिर्फ गरीबी थी अब ग़रीबी और अपमान है।
कश्मीरी पंडित कश्मीर की आबादी का दस प्रतिशत थे और उनके पास कश्मीर की 90 प्रतिशत संपत्ति थी। कश्मीरी मुसलमानों के पास पहले सिर्फ गरीबी थी अब ग़रीबी और अपमान है। जनवरी की सर्दी में जब नलों के भीतर का पानी भी जम जाता है तब हिंदुस्तानी फौज की तलाशी होती है। फौज की ना हो तो दहशतगर्दों की तमाम तरह की ज़बरदस्तियाँ होती हैं। ये लगभग तीसरी पीढ़ी है कश्मीरी मुसलमानों की, पर नौजवानों के पास कोई साधारण सपना भी नहीं और हमारी सरकार नहीं दे सकी।
अनुपम खेर साहब की ये फिल्म भोले और भले लोगों की भावुकता का चालाकी से दोहन करती है। इससे ऐसे अनेक लोग जो व्हाट्सप्प और सांप्रदायिक मीडिया द्वारा परोसे ज्ञान को ही सच मान लेते हैं, दिग्भ्रमित हो जाते हैं। ऐसी कोशिशों का उतनी ही शिद्दत से सही तर्कों के साथ जवाब भी ज़्यादा से ज़्यादा दिया जाना ज़रूरी है।
कुछ ज़रूरी लिंक्स दे रहा हूँ जिन्हें देखा और प्रचारित किया जाना चाहिए।
फिल्म: जश्न ए आज़ादी - संजय काक, वेटिंग .... - अतुल गुप्ता और शबनम आरा
http://pib.nic.in/newsite/PrintRelease.aspx?relid=106628
http://indiatoday.intoday.in/story/j&k-govt-clears-special-employment-package-for-kashmiri-pandits/1/201601.html
http://articles.economictimes.indiatimes.com/2012-09-20/news/33977107_1_jagti-migrant-families-prime-minister-s-package
http://www.epw.in/author/gautam-navlakha
http://www.aljazeera.com/news/asia/2013/09/dilemma-kashmir-half-widows-201392715575877378.html
http://www.cultureunplugged.com/play/457/Waiting—


