कश्मीर में उलझे दिल्ली के तार
कश्मीर में उलझे दिल्ली के तार
नई दिल्ली। दिल्ली विधानसभा चुनाव हर हाल में जीतना भारतीय जनता पार्टी के हिन्दू राष्ट्र के एजेंडे के लिए बहुत जरूरी हो गया है, लेकिन दिल्ली से लेकर कश्मीर तक उसके सारे दावं फिलहाल उल्टे पड़ते जा रहे हैं। भाजपा कश्मीर में मिशन44 में बुरी तरह विफल रही और उसका राजसूय अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा कश्मीर में ठिठक गया। इसीलिए भाजपा दिल्ली को हर हाल मेंजीतना चाहती है क्योंकि यहां उस की जीत उसे अपने हिन्दूराष्ट्र के एजेण्डे पर आगे बढ़ने का हौसला देगी और यदि हार गये तो इस एजेण्डे को वह फिलहाल ठण्डे बस्ते में डाल देगी। वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक सुन्दर लोहिया का विश्लेषण
कश्मीर में विधान सभा के चुनाव के परिणाम घोषित होने को एक महीने से ज़्यादा समय बीत चुका है लेकिन वहां अभी तक सरकार का गठन नहीं हो पाया है। विधान सभाओं के चुनाव परिणाम यहीं नहीं कई राज्यों में स्पष्ट बहुमत के बिना भी सरकार गठन करने का लोकतान्त्रिक तरीका आजमाया जा चुका है। बहुत से मामलों में कामयाब हुआ है और कई मामलों में कुछ समय तक चलने के बाद विफल हुआ है। पंजाब में गठबन्धन सरकार का फार्मूला एक दशक से चलता आया है। वहां पहले दौर में इसकी ज़रुरत थी लेकिन दूसरे और में शिरोमणि अकाली दल को बहुमत प्राप्त हो जाने पर भी उन्होंने चुनावपूर्व किये गये समझौते का आदर करना उचित समझ कर भाजपा को सरकार में शामिल कर लिया। जम्मू काश्मीर में भी चुनाव से पहले नेशनल कान्फ्रेस और कांग्रेस की मिलीजुली सरकार काम कर रही थी। फिर ऐसा कौन सा राजनीतिक पेंच चुनाव के बाद पड़़ गया जिससे गठबन्धन की सम्भावनाएं होते हुए भी सरकार का गठन नहीं हो पा रहा है?
इस पेंच के निशान भाजपा की रणनीतिक वक्तव्यों और व्यक्तियों के दांवपेंच के खेल में झांकने से नज़र आने लगते हैं। इस राज्य को लेकर भाजपा ने लोकतन्त्र के आधारभूत सिद्धान्तों के साथ जो तोड़ फोड़ शुरू की उसे ठीक से समझने की ज़रुरत है। आरम्भिक दौर में भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली राज्य की अन्य राजनीतिक पार्टियों के साथ बातचीत में शामिल थे लेकिन उनकी कुछ बातें साफ तौर पर लोकतन्त्र विरोधी थीं, जैसे कि राज्य का मुख्यमन्त्री हिन्दू होना चाहिए और उनका तर्क कि भाजपा को पीडीपी के मुकाबले वोट का प्रतिशत ज़्यादा मिला है इसलिए उसे सरकार बनाने का मौका पहले मिलना चाहिये, कुछ ऐसे बेतुके बयान थे जिनकी जेटली सरीखे न्यायविद से उम्मीद हीं की जा सकती थी। जिन आज़ाद उम्मीदवारों को जेटली अपने साथ मान कर भाजपा सदस्यों की संख्या पच्चीस के बजाय इक्कतीस बता रहे थे उनमें से तीन सदस्यों ने एक बयान जारी करके इस बात से इन्कार कर दिया कि उनका भाजपा के गठबन्धन से कुछ लेना देना है। शायद इस हमाम में नंगे हो जाने के खतरे को भांपते हुए ही जेटली कश्मीर की राजनीतिक शतरंज से अलग हो गये और अब कमान आरएसएस के प्रतिनिधि भारतीय जनता पार्टी के महासचिव राम माधव के हाथ सौंपी गई। राम माधव भले ही प्रभावशाली स्वयंसेवक रहे हों लेकिन राजनीति में उन्हें जो जिम्मेवारी सौंपी गई उसमें वे वे चतुर सुजान सिद्ध नहीं हो रहे। उनके लोकतन्त्र विरोधी बयानों से राजनीतिक माहौल ज़्यादा ही धुंधला हो गया। वे हिन्दू मुख्यमन्त्री की रट लगाते रहे और स्थाई सरकार तथा विकास के लिए केन्द्रीय सरकार के सहयोग को इशारों में प्रकट करते रहे जो राज्य के राजनीतिक मिज़ाज को और ज़्यादा बिगाड़ने वाला कहा जा सकता है ।
इस संदर्भ में पी डी पी की दुविधा भी असमंजसकारी है। उसका भाजपा के साथ जाने के संकेत मीडिया के माध्यम से ही आते रहे। अपने मुंह से उसकी नेता ने राज्यपाल से मिलकर अपने साथ पचपन विधयकों का समर्थन का दावा पेश किया। पर इस संख्या का गणित नहीं बताया जिससे राजनीतिक हलकों खासकर मीडिया में पी डी पी और भाजपा गठबन्धन वाली सरकार के गठन के चर्चा खुलकर की गई। इस सारे खेल में खबरची मीडिया की भूमिका भी संदेह के दायरे में आ गई है क्योंकि इनके चैनलों पर भाजपा पीडीपी गठबन्धन के समाचार तो आये लेकिन अरुण जेटली और राममाधव की दलीलों के लोकतन्त्र विरोधी होने या न होने पर कोई चर्चा आयोजित नहीं करवाई। उनके सूत्र बता रहे थे कि पीडीपी के पचपन का मतलब है अठाईस जमा पच्चीस भाजपा के और दो लोन की पार्टी के सदस्यों की कुल संख्या पचपन हो जाती है। लेकिन वे इसका दूसरा सूत्र जिसमें अठाईस जमा पन्द्रह नेशनल कांफ्रेस और बारह कांग्रेस के मिल कर भी तो पचपन बन जाते हैं? लेकिन पीडीपी अध्यक्षा महबूबा सईद ने भाजपा को साथ लेकर सरकार बनाने के संकेत भी दिये जाने से बात उलझती चली आई है। इस पूरे राजनीतिक चक्रव्यूह में पीडीपी की दुविधा को कुछ इस तरह भी समझा जा सकता है कि चुनाव से पहले घाटी में बाढ़ के कारण जो नुकसान हुआ है उसकी भरपाई केन्द्र की साकार से सहायता लिए बिना सम्भव नहीं है। भाजपा और आरएसएस के नुमांइदों ने जिस तरह की शर्तें रखी हैं उससे उनका डर सही नज़र आ रहा है।
बाढ़ के नुकसान का अन्दाज़ा लेने के बहाने घाटी में अपने भाषणों में प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह से सरकारी खजाने का मुंह खोल कर मदद का भरोसा दिया था वह चुनाव के बाद अरुण जेटली और राममाधव की राजनीतिक शतरंज ने डर में तबदील कर दिया हैं। यह डर दोनों तरफ पसरा हुआ है। भाजपा के आगे पीडीपी की तरफ से साझे कार्यक्रम की शर्त में धारा 370 और सशस्त्रबल के विशेषाधिकार कानून को निरस्त करना दो अहम मुद्दे हैं, जिन पर भाजपा की हिन्दुत्त्ववादी राजनीति निर्भर है। काश्मीर में भाजपा सरकार बनाने के चक्कर में भाजपा दिल्ली विधान सभा के चुनाव में हार स्वीकार करने के लिए फिलहाल तैयार नहीं हैं अतः ऐसे किसी जोखिम को उठाने की स्थिति में भी नहीं कि दो राज्यों में सरकार बनाने की उम्मीद में एक से भी हाथ धो बैठे। लेकिन यह साफ हो गया है कि भाजपा इस बार पूरे देश में एकछत्र शासन स्थापित करने के लिए किसी भी हद तक जा सकती है। इसके लिए राम मन्दिर धारा 370, लव जिहाद, घर वापसी सभी कुछ कुर्सी के लिए निछावर करना यज्ञ में आहुति डालने के समान पावन कर्तव्य है। ये अच्छी तरह समझ गये हैं कि सत्ता का इस्तेमाल करके ही देश को हिन्दू राष्ट्र घोषित कर सकेंगे इसीलिए वे काश्मीर जैसे मुस्ल्मि बहुल राज्य में भी हिन्दू मुख्यमन्त्री की मांग कर रहे हैं। इस दृष्टि से दिल्ली विधान सभा के चुनाव निर्णयकारी भूमिका निभा पायेंगे। इसमें भाजपा की जीत उसे अपने हिन्दूराष्ट्र के एजेण्डे पर आगे बढ़ने का हौसला मिलेगा और यदि हार गये तो इस एजेण्डे को फिलहाल ठण्डे बस्ते में डाल देंगे।


