कश्मीर में बेगुनाहों की मौत होती है और देश उफ़ तक नहीं करता
कश्मीर में बेगुनाहों की मौत होती है और देश उफ़ तक नहीं करता
जिस देश की संवेदना मर जाए, उस पर गर्व करने के लिए क्या बचेगा?
सुयश सुप्रभ
कोई झंडा इतना बड़ा नहीं होता कि किसी बेगुनाह की लाश को ढक सके।
कश्मीर में जिन लड़कों की मौत हुई उनमें से एक के चेहरे पर गोली लगी थी और दूसरे के सिर में। वे दिल्ली या मुंबई जैसे किसी शहर के लड़के होते तो सोशल मीडिया में आग लग जाती। लेकिन वे कश्मीर के लड़के थे जहाँ की ज़मीन से तो भक्तों को प्यार है लेकिन लोगों से नहीं।
कुछ लोग ज़ी न्यूज़ की ख़बर दिखाकर कह रहे हैं कि सेना के जवानों ने लड़की के साथ ग़लत व्यवहार नहीं किया था।
मसला केवल यौन अपराध का नहीं बल्कि मासूम लोगों की हत्या का भी है। अगर एक पल को हम यौन अपराध वाली बात को झूठा आरोप मान भी लें तो इससे क्या फ़र्क पड़ेगा? बेगुनाहों की मौत तो हुई है। कश्मीर में बेगुनाहों की मौत होती है और देश उफ़ तक नहीं करता। यह ख़तरनाक है। यह हमारी संवेदनाओं के मरने का प्रमाण है।
जिस देश की संवेदना मर जाए, उस पर गर्व करने के लिए क्या बचेगा?
भक्तों को लगता है कि कश्मीर में या तो आतंकवादी रहते हैं या सेना के जवान। उनकी काल्पनिक दुनिया में पात्रों की संख्या हमेशा दो होती है। कितनी बेरंग है उनकी दुुनिया...
सुयश सुप्रभ की पेसबुक वॉल से साभार


