कहते हैं एक जनाताना जमाना था...और अचानक से जनता के सवाल गौण हो गए
कहते हैं एक जनाताना जमाना था...और अचानक से जनता के सवाल गौण हो गए
.... और अचानक से जनता के सवाल गौण हो गए, लोकतंत्र हाईटेक हो गया, चुनाव लड़ना टेक्नीकल खेल भर। इसी बीच बिहार चुनाव होने से एक साल पहले ही राजधानियों से मास कॉम्युनिकेशन पढ़कर आए युवा विधायकों के आगे-पीछे गिद्ध की तरह डोलने लगे। इनमें ज्यादातर वो थे जिनका मोटी फीस देने के बावजूद अखबारों, टीवी की चमकती दुनिया में प्लेसमेंट नहीं हो पाया था। ये पीआर मैनेजर विधायकों को जनसंपर्क, फील्ड स्टडी, मीडिया स्ट्रेटजी, पीआर मैनेजमेंट आदि समझाने लगे। विधायक मोटी रमक देकर उन्हें हायर करने लगे। वे अब जनता के बीच पब्लिक रिलेशन मैनेजमेंट की मदद से पहुंचना चाहने लगे। ये चलन तब ट्रेंड करने लगा जब कुछ दिन ही पहले एक मुख्यमंत्री पब्लिक रिलेशन मैनेजमेंट में खर्च किये 200 करोड़ या 10 हजार करोड़ की बदौलत प्रधानमंत्री बन बैठा।
उसी जमाने में राज्य में सारे आसमान में अकेला एक तारा की तरह लाल झंडे वाली पार्टी का भी एक विधायक था जो इन सबसे आजिज संसदीय राजनीति से सन्यास लेकर पब्लिक को पॉलिटिकल बनाने का सपना देख रहा था। उस समय सवाल ये नहीं था कि वो ऐसा कर पायेगा कि नहीं, महत्वपूर्ण ये था कि वो अब भी बदलाव का सपना देख पा रहा था, जबकि उसी की पार्टी पर सो कॉल्ड "अपर कास्टों" ने कब्जा कर रखा था, उस जैसे पिछड़े वर्ग से आने वाले नेताओं को हाशिये पर ढकेला जा रहा था।
और हद्द तो ये कि दिल्ली से आए पब्लिक रिलेशन के वो चैंपियन उस विधायक को भी कई तरह पैकेज बनाकर पीआर मैनेज करने का टेंडर लेना चाह रहे थे, अलग बात है कि वो विधायक पिछले पाँच साल से तीन सौ रुपल्ली के बाटा चप्पल को ईमानदारी से घसीटे चला जा रहा था।
(कहते हैं एक जनाताना जमाना था...)
O- अविनाश कुमार चंचल


