कैलाश सत्यार्थी

रामललाओं से दोस्ती का नाता - बाल अधिकार की बुनियाद

हमारे धर्मो और संस्कृतियों में एक ओर जहां भक्ति और आस्था की भरमार है वहीं ईश्वर के प्रति सखा भाव यानी दोस्ती के रिश्ते पर भी पर्याप्त जोर दिया गया है। हमारे तमाम कथा नायकों का जीवन गहरी मित्रता की मिशालों से भरा पडा़ है। जो राम जवानी में पिता की इच्छा का पालन करते हुए चैदह साल के वनवास जा सकते हैं वे बचपन में राजा दशरथ की बात मानने की बजाय अपने दोस्तों के साथ खेलना कूदना ज्यादा पसंद करते हैं। तुलसी दास ने लिखा है ‘भोजन करत बुलावहिं राजा, नहिं आवत तजि बाल समाजा‘ तथा ‘अनुज सखा संग भोजन करहीं।‘

दुर्भाग्य से रामलला के इसी बाल समाज की जो दुर्गति देश में हो रही है, वह किसी से छुपी नहीं है। तथाकथित सम्पन्न और सभ्य समाज में माता पिता अपने ही व्यापार, मौज मस्ती और दोस्तों में मशगूल रहते हैं जबकि उनके बच्चे उपेक्षित महसूस करके कई प्रकार की मानसिक कुन्ठाओं व विकृतियों के शिकार हो जाते हैं। वे किशोर अवस्था तक पहुंचते-पहुंचते नशा, सैक्स और हिंसा तक के बुरी तरह शिकार बन जाते है। दूसरी ओर गरीबो के बच्चों को जानवरों से भी कमतर समझकर लोग उनके शरीर, इज्जत आबरू, बचपन और भविष्य को बर्बाद करने में कतई नही हिचकते। इन रामललाओं और उनके सखा समाज के साथ मित्रता और सम्मान दूर-दूर तक नजर नहीं आता।

बच्चों के मामले में वयस्कों में एक स्वस्थ सोच आज तक नहीं बन पाई है। बच्चों के प्रति अधिकार की चेतना तो शायद बहुत दूर की चीज है। अनुचित लाड़-प्यार, रहम, उपकार, शोषण, असंवेदनशीलता अथवा सरोकारहीनता के इस वातावरण में बच्चों के प्रति दोस्ती की बात कुछ अजूबा सा लगती है। दोस्ती का मतलब है एक दूसरे में विश्वास और एक दूसरे के प्रति सम्मान, एक दूसरे से सीखने की इच्छाशक्ति, खुलकर बात करने का साहस, एक दूसरे की मदद करने में खुशी का अहसास आदि इत्यादि। जरा सोचिए हममें से कितने लोग हैं जो बच्चों से सिर्फ लाड़ नहीं बल्कि उनकी इज्जत भी करते हैं? महज दिखावा नहीं बल्कि उनकी योग्यता में भरोसा रखते हैं? जरा ईमानदारी से सोचिए कि कितनी बार आप उनसे सीखने का साहस जुटा पाते हैं? फिर दोस्ती किस बात की ?

बचपन के बारे में बीमार मानसिकता

हमारे समाज में तो गलती, नादानी और मूर्खता का पर्याय ही बचपन है। बड़ी उम्र के लोग भी जब कुछ गलती करते हैं तो अच्छी भाषा में उन्हें बेवकूफ कहने की बजाय कहा जाता है कि वह ‘बचपना कर रहा है’ अथवा ‘अभी तक उसका बचपना नहीं गया‘। किसी वयस्क द्वारा कोई बड़ी उपलब्धि हासिल करने या बुद्धिमत्तापूर्ण बात करने पर मैने आज तक दूसरों के मुंह से यह नहीं सुना ’भई तुमने कमाल का बचपना दिखा दिया‘। हमारी मानसिकता की शुरूआत यहीं से होती है कि बच्चे अनजान, मूर्ख अथवा नादान या शरारती होते हैं जबकि सभी बड़े या तो ज्ञानी हंै या बुद्धिमान। हमारे जन्म से लेकर बड़ी उम्र तक यही सिखाया जाता है। हमारा संस्कार ही यही है।

हमारी मानसिक यात्रा की शुरूआत पूर्णविराम से होती है, प्रश्नवाचक चिन्ह से नहीं। मानने से शुरू होती है, जानने से नहीं। सदियों से हमने यही आत्मसात् किया है कि जो हमारे धर्म ने कहा है या हमारे विज्ञान ने वही सत्य है। हम भूल जाते हैं कि धर्म और विज्ञान दोनों दिखते अलग-अलग हैं लेकिन मान्यताओं तथा अवधारणाओं के समर्थन में जुटाए गए तर्कों पर ही टिके हैं। यानि जो किसी और ने अपने मन में गढ़ा या अहसास किया अथवा किसी और ने खोजा, उसे ही सच समझकर मान लिया जाय। हमारा ज्ञान हमें सीखने के लिए प्रेरित नहीं करता बल्कि सिखाने में आत्मसंतुष्टि दिलाता है। हम वही दूसरों के ज़ेहन में उड़ेलना चाहते हंै जिसे हम मानते हैं। चाहे ईसा मसीह के कहने से मानें या पड़ोसी पंडित के। डार्विन या न्यूटन के प्रयोगों से मानंे अथवा हमारे शिक्षक की छड़ी से आखिर हमें तो मानना ही है।

ऐसी स्थिति में तथाकथित जानकारी, सूचना और दूसरों के ज्ञान व मान्यताओं को अपने जे़हन में भरकर एक अनजाने अहंकार से भरे हुए हम वयस्क उन बच्चों से दोस्ती कैसे कर सकते हैं जिनके मस्तिष्क को न तो अभी तक मुल्ला या पुजारी ने प्रदूषित किया है और न ही विज्ञान की आड़ में तकनीक का बाजारू उपभोग कराने वालों ने।

बच्चों के साथ तो हमारा रिश्ता ऐसा है जैसे वे अभी पहली मंजिल की सीढि़यां चढ़ना सीख रहे हों और हम बीस-पच्चीस मंजिल वाली इमारत में दस-बारहवीं मंजिल पर बैठे हों। आखिर हाथ मिलें तो कैसे? कदम साथ चलें तो कैसे? मेरी बात आपको अटपटी जरूर लग रही होगी लेकिन तनिक अपने गिरेबान में झांककर देखें, असलियत तो यही है। बच्चों के पास हम दोस्ती का संदेश लेकर कैसे जा सकते है ?

समता पर आधारित दोस्ती की मिसाल-कृष्ण सुदामा

हमारे समाज में सुदामा और कृष्ण की दोस्ती का उदाहरण दिया जाता है। कृष्ण राजा थे और सुदामा दाने-दाने से मोहताज गरीब आदमी। पत्नी के कहने पर बड़ी मुश्किल से सुदामा जब कृष्ण से मिलने गए तो कृष्ण ने सुदामा पर कोई दया नहीं दिखाई बल्कि बराबरी का व्यवहार किया। यहां तक कि अपनी कुर्सी पर बिठाकर पैर धोकर उनकी फटी हुई बिवाइयों में मरहम लगाया। बिना बोले और बताए कुछ ऐसा चमत्कार किया जिससे सुदामा का घर एक महल में तब्दील हो सका। कृष्ण की पत्नी अगर उन्हें न रोकती तो शायद सुदामा धन-दौलत के लिहाज से कृष्ण बन जाते और कृष्ण, सुदामा। इस दोस्ती में उपकार नहीं, आदर था। अहंकार नहीं, बराबरी का गहरा अहसास था। इस कहानी में कृष्ण को कुर्सी से नीचे उतरकर आना पड़ा, भागकर दरवाजे के बाहर तक। हम सब कुर्सियों पर बैठे हैं और बच्चे नीचे खड़े हैं। डिग्री की कुर्सी, गांव तक मोटरसाइकिल या कार से पंहुचने की कुर्सी, पदों की कुर्सी, रिश्तों की कुर्सी। जाने कितनी कुर्सियां हैं जो हमें उन बच्चों से अलग करती हैं जिनके बीच में हम काम कर रहे होते हैं। हममे से कितनों में इतना साहस है कि अपने दोस्त बच्चों से मिलते वक्त इन कुर्सियों से उतरकर उस जमीन पर खड़े हों जहां वे बच्चे खड़े हैं। फिर कृष्ण की तरह उनके साथ-साथ चलकर कुर्सी तक आएं और उन बच्चों को वहां बैठा दें। ऐसा नहीं कर सकेंगे तो दोस्ती किस बात की।

यह बड़ा मुश्किल अभ्यास है। ज्ञान, समझदारी, परम्परा, विश्वास वगैरह के कचरे से अपने दिमाग को खाली कर देना हंसी-खेल नहीं है। खासकर तब जब आप उनसे मिल रहे हैं जो आपके लिहाज से अनजान और नादान हैं।

कहां हैं बाल अधिकार?

अब मैं दूसरे मुद्दे पर चर्चा करना चाहूंगा जिसका जिक्र हम ऊपर कर आए हैं-बाल अधिकार। अधिकार का बोध आमतौर पर कानून की तरफ इशारा करता है। इसका अर्थ यह हुआ कि एक व्यवस्था जो उन वर्गों को न्याय दिला सके, जो उनसे वंचित हंै। समाजी इदारों, सरकारों और अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों ने समाज में समरसता लाने के अनेकों उपाय किए हैं। उन्हीं उपायों में से एक मानव अधिकारों और बाद में बाल अधिकारों की परिकल्पना रही थी। यूं तो मानव अधिकारों का घोषणापत्र द्वितीय विश्व युद्ध के बाद पैदा हुई राजनैतिक व मानवीय विसंगतियों और चुनौतियों का मुकाबला करने के लिए तैयार किया गया था जो सभी देशों के लिए मान्य हुआ। इसमें दुनियाभर की औरतों-आदमियों और बच्चों के अधिकार शामिल थे। इसके ठीक चालीस साल बाद बच्चों के अधिकारों पर अलग से एक दस्तावेज स्वीकार किया गया। इसे संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार संधि कहा गया।

दरअसल अधिकारों की अवधारणा और उन्हें सही शब्दों में पिरोना बड़ा मुश्किल काम है। यह हजारों साल से चली आ रही परम्पराओं, मान्यताओं, रूढि़यों, मानसिकताआंे, राजनैतिक व्यवस्थाओं, आर्थिक दबावों व लालच, संस्कृतियों के नकारात्मक मूल्यों आदि के अन्तर्विरोधों को सुलटाते हुए न्याय व समता के दर्शन को कानूनी जामा पहनाने का दुरूह काम है। इसीलिए बच्चों, महिलाओं और गरीबों के हितों में राष्ट्रीय या अन्तर्राष्ट्रीय कानून बनाने में मुश्किल आती है। उन्हें लागू कराना तो और भी कठिन। खासकर तब जब वे कानून अधिकारों से संबंधित हों। यही कारण है कि समाज और अधिकार के बीच हमेशा दूरी बनी रहती है। जिनके अधिकार छिन रहे हैं, वे इतने सशक्त नहीं कि कानून के हथियार का ठीक-ठीक इस्तेमाल कर सकें और जो तबका अधिकार छीनता है वह कानून और न्यायतंत्र को भी कहीं न कहीं अपनी जेब में रखने में सिद्धहस्त है।

बाल अधिकारों का यही हश्र हुआ। आम बच्चों को तो अपने अधिकारों की जानकारी और समझ होना मुश्किल था किन्तु उनके माता-पिता तथा बहुसंख्यक अभावग्रस्त जनों के बीच इसकी चेतना पहंुचाना भी आसान नहीं। नब्बे के दशक में बाल अधिकारों की रेसिपी (व्यंजन) को खूब चटकारेदार बनाकर बेचा व परोसा गया। जानकारों, पढ़े-लिखों, शोधकर्ताओं, विश्लेषकों, विश्वविद्यालयों के समाजशास्त्र विभागों, सरकारों के बाल कल्याण मंत्रालयों और एनजीओ की तो समझिए पौ बारह हो गई। अनगिनत राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार और कान्फे्रंसें वगैरह हुईं। नई-नई संस्थाएं खुल र्गइं। बाल अधिकारों के नाम पर करोड़ों, अरबों पन्ने काले कर दिए गए। एयरलाइनों, होटलों, प्रकाशकों, प्रिंटरों की भी चांदी हो गई। लेकिन बुनियादी सवाल जस का तस खड़ा रहा। इस शोर-शराबे में बारह साल का कालीन मजदूर नागेश्वर कहां था जिसे ऐन दिवाली के दिन आतिशबाजी के अनार और फुलझडि़यांे से जला डाला गया। लगभग सत्तर फीसदी जल चुके नागेश्वर को जब मैं अपने साथियों के साथ मुक्त कराकर अस्पताल ले गया तो डाक्टरों तक को कानून और संविधान की व्यवस्था पर कोफ्त होने लगी थी। नागेश्वर का कुसूर सिर्फ इतना ही था कि वह दिवाली मनाने में मशगूल कालीन कारखाना मालिक से नजर बचाकर गुलामी से भागने का कोशिश कर रहा था। कहां थे वे सारे बाल अधिकार के दस्तावेज जब भयानक टीबी की शिकार 14 वर्षीय भट्ठा मजदूरिन गुलाबो ने ’मुझे बचा लो-मुझे बचा लो‘ की गुहार लगाते हुए मेरी गोद में दम तोड़ दिया था। सेमिनार, कांफ्रेंसें और प्रशिक्षण तब भी चल रहे थे जब मध्य प्रदेश के तत्कालीन बिलासपुर जिले के एक गांव में ऊंची जाति वालों ने सतनामियों के घरों को आग लगा दी थी क्योंकि, उन्होंने अपने बच्चों को ऊंची जाति के स्कूल में भेजने की जु़र्रत की थी।

मैं बाल अधिकारों के प्रयासों को नकार नहीं रहा हूं। न ही उनका निरादर या उन्हें अनेदखा करना चाहता हूं। परन्तु मैं बात कर रहा हूं अधिकारों की दुकान चलाने वालों के भीतर की अन्तःश्चेतना तथा उसे अपनी जिन्दगी में ढालने के खोखलेपन की। अधिकार व कानून महज़ किताबी बातें नहीं हुआ करतीं। उन्हें एक जीवन पद्धति, एक सभ्यता और एक संस्कृति में ढालना जरुरी होता है। बच्चों के अधिकारों की बात करना एक चीज है और अपनी बोलचाल, रहन-सहन एवं जीवनचर्या में जीना बिल्कुल दूसरी। सबसे पहले हममें से प्रत्येक को अपने भीतर झांकना होगा कि हम बाल अधिकार की भाषा बोलते हैं या बाल अधिकार की जिन्दगी जीते हैं। हमें अपने आप से यह भी पूछना होगा कि क्या हम सचमुच ईश्वर की इन संतानों अथवा दूसरे अर्थो में सच्चे रामललाओं से सखा भाव अथवा दोस्ती का नाता कायम कर सके हैं?