कहाँ है भारत, कैसा डिजिटल इण्डिया ? सोचियेगा...
कहाँ है भारत, कैसा डिजिटल इण्डिया ? सोचियेगा...
जिला -आजमगढ़
तहसील -निज़ामाबाद
धुटने से ऊपर धोती। पैरों की नसें गुर्चियाई हुई, जो कड़ी मेहनत की गवाह थीं। आधी बांह की कमीज़, पुरानी सायकिल के हैंडिल में लटकता तराजू।
दुख्खी केवट अपने गांव शाहपुर से करीब 2 किलोमीटर दूर नेवादा चौक पर सब्जी बेचते हैं। अचानक मुझे सड़क पर देखकर हड़बड़ा कर सायकिल से उतर जाते हैं कि कहीं सायकिल लड़ न जाये।
अपराध बोध से मैं बात-चीत शुरू करता हूँ। का बेचे आयल रहला ह ?
दुख्खी जबाब देते हैं -सरपूतिया।
कितना किलो थी।
दुइ किलो बाबू, दुख्खी जल्दी में जबाब देते हैं।
त आज लेट हो गया है का ?
नहीं बाबू, आज त जल्दी जात हाईला, नहीं त नौ बजी जाला।
त आज जल्दी कैसे ? दुख्खी दादा की जल्दबाजी के बावजूद मैंने ढिठाई से पूछा।
वो बताते हैं कि आज बगल के दुकान वाले ने ले लिया सोलह रूपया में। कहा कि कब तक बैठोगे।
मैं बातचीत जारी रखना चाहता था - अच्छा,सोलह रूपया में।
हाँ त पांच रूपया परसों क उधार कटा देहनी अउर ग्यारह रूपया क समान लेके घरे जात बाटी।
मैं फिर सवाल करने की जुगत में था कि दुख्खी दादा ने तपाक से कहा- बाबू घरे आज जल्दी जाये के बा, खाने बनावे के खातिर बिटिया अगोरत होई। आज जल्दी जाइब त खुश होई कहकर दुख्खी दादा सायकिल पर बैठ जातें हैं।
चर-चर की आवाज करती साईकिल अँधेरे में गुम हो जाती है, पर मेरे सामने हज़ारों दुख्खी दिखने लगते हैं, जो गांव के चट्टी पर दो-तीन किलो सब्जी लेकर डेबरी के उजाले बैठे होते हैं।
आज जब हम लखनऊ-दिल्ली जैसे शहरों में पंद्रह रुपये की चाय पीकर गरीबी पर बहस करते हैं तो न जाने कितने दुख्खी के साथ अन्याय करते होंगें ? जो ग्यारह रुपये में पूरे घर को खाना खिलाते हैं.… कहाँ है भारत, कैसा डिजिटल इण्डिया ?सोचियेगा।
अनिल यादव


