भारत शर्मा

मेरा स्पष्ट मानना है, कि अगर 2014 के लोकसभा चुनाव के पहले कांग्रेस नेतृत्व ने दो बड़ी गलतियां नहीं की होतीं, तो शायद भाजपा यहां तक नहीं पहुंचती। पहली गलती थी अन्ना हजारे के विरोध को कमतर आंकना, उसी से जुड़ी दूसरी गलती निर्भया को लेकर जो आंदोलन शुरु हुआ था, उससे कांग्रेस का किनारा करना।
जब अन्ना हजारे ने आंदोलन की शुरुआत की थी, उस समय अगर कांग्रेस नेतृत्व की तरफ से कोई जाकर मंच से भ्रष्टाचार के खिलाफ होने वाली जंग के प्रति एकजुटता प्रदर्शित करता और वहीं से लोकपाल विधेयक पास करने की घोषणा करता, तो शायद सीन कुछ और होता। बाद में कांग्रेस ने लोकपाल विधेयक पास भी किया और उस पर अन्ना की सहमति भी ली, पर उस समय तक काफी देर हो चुकी थी। दूसरा दामिनी को लेकर चल रहे आंदोलन में भी अगर राहुल गांधी शामिल हो जाते, तो युवाओं में नाराजगी को कम किया जा सकता था।
यह अलग बात है, कि बाद में यूपीए सरकार ने जस्टिस वर्मा आयोग का गठन भी किया और उसकी सिफारिशों को लागू भी किया। पर ये दो बड़ी रणनीतिक चूक थीं। कांग्रेस के खिलाफ माहौल अन्ना हजारे के आंदोलन के बाद बनना शुरु हुआ था, जिसकी शुरुआत अन्ना की गिरफ्तारी के साथ हुई थी। इस पर कांग्रेस के नेताओं के बयान जनता को और भड़का रहे थे, इस काम में दिग्विजय सिहं, कपिल सिब्बल, मनीष तिवारी जैसे नेता बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे थे। केजरीवाल को राजनीति में आने की चुनौती भी इसी समय दी गई। यह वह दौर था, जब कांग्रेस मीडिया को भी मैनेज नहीं कर सकी और पूरा माहौल उसके हाथ से निकल गया। संघ ने इसका भरपूर फायदा उठाया, पूरे देश में अन्ना हजारे के आंदोलन को फैलाया और उन्हें दूसरा गांधी बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
अब माहौल एक बार फिर वैसा ही बनता जा रहा है। इसकी शुरुआत साहित्यकारों ने अपने पुरस्कार वापस करने से की है और नेताओं की बयानबाजी लगभग उसी तरह की है, जैसी कांग्रेस के नेताओं की थी। भाजपा नेताओं के साथ दूसरा मामला है, वो कैडरबेस पार्टी है, इसलिेए उसके पास पूरा कैडर है, जो उनके बयानों को नीचे तक पहुंचाने की पूरा काम करता है, कांग्रेस इस मामले में कमजोर थी। भाजपाई इस समय हर उस व्यक्ति को गाली देने में लगे हैं, जो देश में बढ़ रही असहिष्णुता के खिलाफ बोल रहा है। उसे सीधे मोदी सरकार की खिलाफत से जोड़ा जा रहा है। वे रघुराज रमन और नारायण मूर्ती जैसे लोगों को भी औकात में रहने की सलाह दे रहे हैं। क्या एक आसान तरीका नहीं था, कि जब इस विरोध की शुरुआत हुई थी, उस समय खुद नरेन्द्र मोदी आगे बढ़कर आते और इस माहौल के खिलाफ बयान देते। पर उनसे ऐसी उम्मीद करना बेमानी है, क्योंकि बिहार चुनाव में वे खुद सांप्रदायिक ऐजेंडा खेलने में लगे हैं। वे शायद पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं, जिन्होंने इस प्रकार का बयान दिया है, जिसकी उम्मीद एक धर्म निरपेक्ष देश के किसी भी राष्ट्र प्रमुख से नहीं की जा सकती।
बहरहाल सरकार, संघ और भाजपा तीनों को ही यह उम्मीद नहीं थी, कि यह आग इतनी बढ़ेगी, कि पूरी सरकार पर ही सवालिया निशान खड़े हो जाएंगे, और आगे जाकर इसमें कलाकार, इतिहासकार और वैज्ञानिक तक शामिल हा जाएंगे। पूरा कुनबा इस समय पशोपेश में है, कि इस नई परिस्थिति की सामना किस प्रकार किया जाए। खुद संघ को इस मु्द्दे पर बोलने के लिए सामने आना पड़ा। संघ के संगठन इस विरोध को प्रायोजित करार देने में लगे हैं और यह साबित करने में लगे हैं, कि यह विरोध वामपंथियों द्वारा प्रायोजित है। ऐसा कहने वाले यह भूल जाते हैं, कि पश्चिम बंगाल में खुद वामपंथियों की सरकार के खिलाफ साहित्यकारों और कलाकारों ने ही मोर्चा खोला था। यह नंदीग्राम और सिंगूर की घटना के बाद हुआ था, जिसकी अगुवा महाश्वेता देवी थीं। उस समय वामपंथियों का रुख भी लगभग वही था, जो आज भाजपा के लोगों का है, उन्होंने भी इस विरोध को प्रायोजित कहा था।
तत्कालीन मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य के बारे में कहा जाता था, कि वे खुद साहित्य प्रेमी हैं और उनके साहित्यकारों और कलाकारों से अच्छे संबंध हैं, पर वे भी मामले को संभाल नहीं पाए, उसके बाद जो माहौल बंगाल में बनना शुरू हुआ, उसने 34 साल पुरानी वामपंथियों की सरकार को अपदस्थ कर दिया।
आज भाजपा जिन साहित्यकारों को दरबारी और चुके हुए साहित्यकार बताने में जुटी है, वे कितने चुके हुए हैं, इसकी भनक उन्हें लग चुकी है। उदय प्रकाश से शुरू हुई इस चिंगारी में भारतीय सैनिक भी शामिल होने जा रहे हैं, वे अपना वीरता पुरस्कार लौटाने की बात कर रहे हैं।
जो माहौल असहिष्णुता के खिलाफ बना था, वह वादाखिलाफी तक पहुंचने लगा है। भाजपावाले जो तर्क दे रहे हैं, जनता उसके सहमत है या नहीं, यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा।
फिलहाल भाजपा के सामने इस माहौल से निपटने के अलावा महंगाई और आर्थिक विकास भी बड़ी चुनौती हैं, जो लोगों में नाराजगी पैदा कर रही है। हालात यही रहे, तो आगे आने वाला समय और भी कठिन होने वाला है, जिसके लिए संघ के कार्यकर्ताओं को और बड़ी-बड़ी गालियों का स्टाक रखना पड़ेगा।
मुझे न जाने क्यों लगता था, कि कांग्रेस 2014 का चुनाव हारना चाहती थी। सीधा कारण था, दुनिया के अर्थ तंत्र की जो बैंड बजी बड़ी है, कांग्रेस को उसके लिए किसी बकरे की तलाश थी, जिससे वह उसकी बलि के सके। 2008 की आर्थिक मंदी को तो भारत सह गया, पर हालात उसके बाद देश और दुनिया के सुधरे नहीं हैं। हमारे यहां भी अलग-अलग क्षेत्रों की जो हालत है, उससे निपटना इतना आसान नहीं है।
अगर अरुण शैरी जैसे नेता यह कहते हैं, कि लोगों को कांग्रेस का जमाना याद आने लगा है, तो इसे सिर्फ इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता, कि उन्हें मंत्री नहीं बनाया, इसलिए वे बोल रहे हैं। मनमोहन सिहं बड़े अर्थ शास्त्री थे, मोदी नहीं हैं, वे सांप्रदायिकता को विकास के आवरण से और विकास की असफलता को सांप्रदायिकता की चादर से ढकने के माहिर हैं। इस बार यह नहीं हो पा रहा है, क्योंकि इसकी शुरुआत से पहले ही तमाम बुदि्धजीवी एकजुट हो गए हैं और उन्होंने सरकार के आगे के रास्ते बंद कर दिए हैं। अब जो भी हरकत होगी, उसके अंतरराष्ट्रीय परिणाम होंगे।
भारत शर्मा, लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।