कटते भी चलो बढ़ते भी चलो

बाजू भी बहुत हैं, सर भी बहुत

- फैश

अब आनंद तेलतुम्बडे के लिखे और हमारे मंत्रालय पर एक फतवा भी जारी किया गया है। यह फतवा हमारे सिर माथे। दागी होना बुरा भी नहीं है उतना, जितना कि आंखें होने के बावजूद अंधा होना जानना।

आइये इस भागलपुरी का मुकाबला करें। हर देश में, हर समय। पलाश विश्वाश

दरबारे-ए-वतन में जब इक दिन सब जाननेवाले जाएंगे

कुछ अपनी सठा का पहुंचेंगे कुछ अपनी जठा ले जाएंगे

ऐ झाकनशीनों, उब बैट हो, वह वघ्त घिरीब आ पहुंचा है

जब तंत्र गिराए जाएंगे, जब ताज उछाले जाएंगे

अब टूटी गिरेंगी झंजीरेें, अब झिंदानों की नैर नहीं

जो दरिया झूम के उठते हैं, तिनकों से न ताले जाएंगे

कटते भी चलो, बढ़ते भी चलो, बाजू भी बहुत हैं, सर भी बहुत

चलते भी चलो के अब डेरे मेंझिली ही पे डाले जाएंगे

ऐ झुल्म के मातो लब खोलो, चुप रहननेवालो, चुप कब तक

कुछ हशर तो उनसे उठेंगे, कुछ दूर तो नाले जाएंगे