तिरुवनंतपुरम से आशुतोष सिंह
कोवलम (तिरुअनंतपुरम )। देश के इस अंतिम छोर पर एक रोचक चुनाव हो रहा है। यह चुनाव है केंद्रीय मंत्री शशि थरूर का। हालत यह है कि इस चुनावी माहौल का असर दक्षिण के सबसे खुबसूरत समुद्र तट पर साफ़ नजर आ रहा है। जहाँ शाम ढलते ही रिसार्ट के बार में थरूर के चुनाव पर चर्चा गर्म हो जाती है। सुनंदा पुष्कर की खुदकुशी के बड़े झटके से वे अभी उबर नहीं पाएं है और अब राजनैतिक मोर्चे पर संघर्ष करना पड़ रहा है।
तिरुअनंतपुरम में लोगों की मानें तो इस बार उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ रहा है। थरूर अपनी लोकसभा सीट बचाने के लिए गम्भीर प्रयास कर रहे हैं। यह सिर्फ उनकी ही नहीं कांग्रेस की भी प्रतिष्ठा का भी सवाल बन गया है। कांग्रेस को दक्षिणपंथियों के साथ वामपंथियों से भी मुकाबला करना पड़ रहा है। पार्टी को यहाँ भाकपा और भाजपा से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। भाकपा की सीट एलडीएफ उम्मीदवार बेनेट अब्राहम है, वहीं पर भाजपा ने अपने एक वरिष्ठ नेता राजगोपाल को मैदान में उतारा है। ऐसा ही समीकरण 2004 में भी था। यह निर्वाचन क्षेत्र वैसे तो पढ़े लिखे तबकों का काफी प्रगतिशील माना जाता है पर जाति और धार्मिक मान्यताएं भी भारी पड़ सकती हैं।
इसी कारण से भाकपा ने बेनेट अब्राहम को चुना है, जो कि नादर बिरादरी से हैं और चर्च से जुड़े भी हैं। वे इस चर्च की तरफ से संचालित मेडिकल कालेज के निदेशक के पद पर हैं। वहीँ पर राजगोपाल और थरूर दोनों ही नायर समुदाय के हैं।
जानकारों के मुताबिक अगर भाकपा का समीकरण चला तो तो थरूर की जीत का रास्ता आसान हो जायेगा पिछले 2009 के चुनाव में भाकपा उम्मीदवार ने 2.6 लाख वोट हासिल किया था। माना जा रहा है कि नादर वोट वामपंथी रुझान के मतदाता यहाँ नया गुल खिला सकते हैं। 2009 के लोक सभा चुनाव में नादर समुदाय के बसपा उम्मीदवार नीलालोहिता को 80000 वोट मिले थे।
पर कांग्रेस का कहना है कि चुनाव का परिणाम राजनीतक मुद्दों और उम्मीदवारो के कद पर होता है। शशि थरूर का आरोप है कि उनके विरोधी उनकी निजी जिन्दगी को राजनैतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। चुनाव अभियान शुरू करने से पहले कुछ एलडीएफ नेताओं की अपमान जनक टिप्पणी की शिकायत वे चुनाव आयोग से कर चुके हैं। जब पार्टी द्वारा 2009 के चुनावी माहौल में थरूर को इस सीट से टिकट देने का फैसला किया गया तो उनकी राजनैतिक क्षमता पर कुछ सवाल भी उठे पर थरूर एक लाख वोटों से जीतकर लोगों को अपनी राजनैतिक प्रतिभा भी दिखा चुके हैं।
विवादों में घिरे होने के बावजूद थरूर अपने सौम्य और मिलनसार व्यवहार से लोगों का समर्थन हासिल करने की कोशिश में जुटे है। उन्होंने अपनी एक चुनावी सभा में कहा- मेरे विरोधी मेरे अच्छे कामकाज की बजाए मेरे निजी जीवन को लेकर मेरे ऊपर कीचड़ उछाल रहे हैं।
उधर कांग्रेस रणनीतिकारों का कहना है कि एलडीएफ नेताओं की यह भूल है कि भाकपा उम्मीदवार का नादर समुदाय से होना उनके लिए लाभकारी होगा उनका तर्क है कि केरल और निकटवर्ती तामिलनाडु के जिलों में नादर बड़ी संख्या में कांग्रेस समर्थक हैं और नादर समुदाय को वोट करने में कोई समस्या नहीं है। गौरतलब है कि 2011 विधानसभा चुनाव में यूडीएफ ने तिरुवनंतपुरम लोकसभा सीट के अंतर्गत सात क्षेत्रों में से चार पर सफलता प्राप्त की और उपचुनाव में भी एक सीट जीत कर अपनी जीत को मजबूत बनाया।
उधर यूडीएफ और एलडीएफके दावों को ख़ारिज करते हुए भाजपा का कहना है कि मोदी ही प्रधानमंत्री पद के प्रबल उम्मीदवार है। जिसका फायदा इसबार के चुनाव में मिलेगा। पार्टी के सूत्रों का कहना है कि राजगोपाल संघ के अलावा अन्य वर्गों के लिए भी एक लोकप्रिय चेहरा है| पार्टी के जिलाध्यक्ष सुरेश के अनुसार यह चुनाव मूलरूप से केंद्र में किस पार्टी कि सरकार बनेगी और इसकी बानगी फरवरी माह में हुई मोदी कि सफल रैली से साफ़ हो चुकी है। दूसरी तरफ आम आदमी पार्टी अपने उम्मीदवार पूर्व आईपीएस अफसर अजित जॉय को मैदान में उतरा है जो कि अरविन्द केजरीवाल के बैचमेट हैं और उन्हें युवाओं का समर्थन हासिल है। बहरहाल थरूर को तिरुवनंतपुरम में भाकपा और भाजपा दोनों से चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। फिलहाल तिरुअनंतपुरम का मौसम अभी ज्यादा गर्म नहीं हुआ है पर चुनावी गर्मी बढ़ रही है। थरूर लगातार चर्चा में रहे हैं इसलिए केरल के राजनैतिक हलकों में इस सीट पर सभी नजर है।
जनादेश न्यूज़ नेटवर्क