नरेंद्र मोदी ने दूसरे देशों में जमा कर के रखा गया सारा काला धन वापस देश में लाने का जो शेखीभरा दावा किया था, बड़ी तेजी से एक प्रहसन में तब्दील होता जा रहा है।

लोकसभा चुनाव के समय मोदी ने यह वादा किया था कि अवैध रूप से दूसरे देशों में जमा कर के रखा गया लाखों करोड़ रुपए का काला धन वह वापस देश में लाएंगे। उन्होंने तो यह भी दावा किया था कि देश का यह पैसा वापस आने पर, हरेक देशवासी को पंद्रह-पंद्रह लाख रु0 मिलेंगे।
बाद में मोदी सरकार ने संसद में काला धन (अवैध विदेशी आय व परिसंपत्तियां) करारोपण कानून, 2015 पारित कराया। इस कानून के तहत सरकार ने अवैध विदेशी संपत्तियां रखने वालों के लिए एक बार की माफी योजना पेश की थी, बशर्ते वे 30 सितंबर 2015 तक अपनी इन अवैध परिसंपत्तियों का एलान कर देते। ऐसी विदेशी परिसंपत्तियां घोषित करने वाले, इन परिसंपत्तियों पर 30 फीसद टैक्स और 30 फीसद जुर्माना भरकर, इन परिसंपत्तियों को वैध कर सकते थे।
इस कानून के तहत ऐसी परिसंपत्तियों की घोषणा करने के लिए जो तीन महीने की अवधि दी गयी थी, उसके आखिर तक सरकार के सामने, कुल 4,147 करोड़ रु0 की, 638 घोषणाएं ही आयी हैं।
जाहिर है कि यह तो दूसरे देशों के कर स्वर्गों में तथा विदेशी खातों में जमा कर के रखे गए अरबों डालर का बहुत छोटा सा हिस्सा भी नहीं होगा। इस 4,147 करोड़ में से भी, कर व जुर्माना मिलाकर, सरकार के हाथ में सिर्फ 60 फीसद ही आएगा, जो 2,488 करोड़ रु0 बैठता है।
अगर नरेंद्र मोदी इस रकम को देश की जनता के बीच बांटने भी जाएंगे, तो 130 करोड़ की मौजूदा आबादी में, हरेक व्यक्ति के हिस्से में सिर्फ 19 रु0 आएंगे। कहां यह और कहां 15 लाख रु0 जिनका वादा किया जा रहा था!
इस माफी योजना के जरिए बहुत ही मामूली सी रकम आने के बाद, वित्त मंत्री अरुण जेटली को बड़ी देर बाद अब इसका एहसास हुआ है कि ज्यादातर काला धन तो भारत में ही है, जहां यह पैदा होता है। लेकिन, यहां से आगे बढक़र वह यह गलत दावा करने लग जाते हैं कि कर दरों को तर्कसंगत बनाने यानी घटाने के जरिए काले धन की व्यवस्था को खत्म किया जा सकता है। कर घटाए जाएंगे, तो लोगों के लिए कर देना आसान हो जाएगा और बड़े पैमाने पर कर चोरी पर रोक लग जाएगी। लेकिन, सचाई यह है कि काला धन कोई इसलिए पैदा नहीं होता है कि कर की दरें ज्यादा हैं। खुद सरकार की द्वारा लागू की जा रही नीतियां कर चोरी को तथा काला धन पैदा करने को बढ़ावा देती हैं। विदेशी संस्थागत निवेशकर्ताओं द्वारा जारी किए जाने वाले पार्टिसिपेटरी नोट, एक ऐसा ही जरिया हैं। ये पार्टिसिपेटरी नोट (पी नोट), जिनके धन का स्रोत उजागर नहीं करना होता है, व्यावहारिक मानों में विदेशों में जमा कर के रखी गयी अवैध संपत्तियों के भारतीय बाजारों में लौटने का रास्ता खोलते हैं। इसके बावजूद, पार्टिसिपेटरी नोट पर कोई रोक नहीं लगायी जाती।
इसी प्रकार, कर चोरी के लिए फर्जी दीर्घावधि लाभ दिखाने की तिकड़म की जाती है।

मोदी सरकार ने एचएसबीसी जैसे बहुराष्ट्रीय बैंकों द्वारा किए जाने वाले धन-शोधन के खिलाफ भी कार्रवाई नहीं की है। उसने ऐसे देशों के साथ भी जोर-शोर से इस काले धन का मामला नहीं उठाया है, जहां विदेशी खाताधारकों की जानकारियां उपलब्ध हैं।
अचल संपत्ति कारोबार का क्षेत्र, काले धन के सृजन का एक प्रमुख स्रोत है। मोदी सरकार ने अनगिनत सुझाव दिए जाने तथा कदम सुझाए जाने के बावजूद, मोदी सरकार ने इस क्षेत्र में काले धन के उपयोग पर अंकुश लगाने के लिए भी कुछ नहीं किया है।
काले धन के मुद्दे पर सारी लंबी-लंबी हांकना अपनी जगह, सच्ची बात यह है कि मोदी सरकार बड़े पूंजीपतियों, अचल संपत्ति बाजार के सटोरियों और बड़े कारोबारियों के स्वार्थों पर कोई चोट कर ही नहीं सकती है, जबकि वही हैं जो न सिर्फ कर चोरी करते हैं बल्कि बाकायदा काले धन की समांतर अर्थव्यवस्था भी चलाते हैं।
0 प्रकाश कारात