बिजेंद्र त्यागी जाने माने फोटो पत्रकार हैं. उन्हें कई प्रधानमंत्रियों के साथ काम करने का अनुभव है. नॉर्थ ब्लॉक में चलने वाले सत्ता संघर्ष को उन्होंने बहुत नज़दीक से देखा है। पांच दशक की पत्रकारिता के दौरान राजदरबार में उन्होंने जो जो देखा उसे हम हस्तक्षेप डॉट कॉम पर आपके साथ साझा कर रहे हैं-

मेरी पत्नी और पुत्री एक दिन मुझसे पूछने लगे कि जिन्दगी में आपने क्या किया है? आप उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री बहुगुणा जी, प्रधानमंत्री चंद्रशेखर और अन्य लोगों के बारे में इतनी बातें करते हो, उन्होंने आपको क्या दिया? मैं देख रही हूं तुम्हारे बाद में काम करने वाले लोगों के पास गाड़ियां हैं, अच्छे मकान हैं, सब सुविधाएं हैं। उनके इस प्रश्न को सुनकर मैं स्तब्ध रह गया और मैंने कोई उत्तर नहीं दिया। वह तो उन लोगों के साधनों को देखकर अपने मन की पीड़ा को व्यक्त करते हुये अपनी भड़ास निकाल रही थीं। आधुनिक परिस्थितियों को देखते हुए उसकी बात ठीक थी। परन्तु पत्रकारिता में सम्पन्न लोगों के चेहरों को देखता हूं तो मन में एक टीस और उनका पत्रकारिता के पीछे छुपा चेहरा देखकर वेदना के साथ भय भी लगता है। दिल्ली के एक प्रमुख पत्रकार अपने को देश में प्रधानमंत्री के बाद नम्बर दूसरा मानते हैं। परन्तु पत्रकार जगत में इस व्यक्ति के बारे में जो चर्चायें चल रही थीं कि टाइम्स ऑफ इंडिया के मालिक समीर जैन ने अपने सम्पादक को बुलाया और कहा- ‘‘पडगांव कर जी, यह कुछ चिट्ठियां हैं इन पर नीचे बैठकर पत्र लिखिये।’’ यह बात सुनकर दिलीप पडगांवकर सन्न रह गये। तभी समीर जैन ने कहा- ‘‘चौंकिए नहीं, यह काम आपको ही एक घण्टे यानि निर्धारित समय में करना है।’’ मरता क्या न करता। उन्होंने उनका आदेश मानकर काम तो पूरा कर दिया परन्तु अन्दर की छटपटाहट ने उनको हिला दिया था। यह संकेत दिलीप पडगांवकर के अहम् को तोड़ने के लिए काफी था।
दरअसल बड़े समाचार पत्र के कर्मचारी उस समाचार पत्र की चादर को ओढ़कर गलत फहमी का शिकार बन जाते हैं।
सम्पादक महोदय ने तत्कालीन सूचना प्रसारण सचिव भास्कर घोष की बेटी सागरिका घोष को टाइम्स ऑफ इंडिया में नौकरी दी थी। दिलीप पडगावकर इस बेइज्जती को सहन नहीं कर रहे थे। आखिर में दिलीप पडगांवकर ने भास्कर घोष से सम्पर्क साधा। भास्कर घोष ने उन्हें सुबह के दूरदर्शन में खबरों का प्रोग्राम ‘‘ब्रेक फास्ट न्यूज’’ के नाम से आधा घण्टे का प्रोग्राम दे दिया। इस प्रोग्राम के बदले दूरदर्शन इन्हें भुगतान करता था। इस प्रकार प्रतिदिन इन्हें रूपया मिलता रहा। अगले छह महीने के पश्चात भास्कर घोष ने इन्हें स्पोन्सर्ड प्रोग्राम दिया। जिसके लिए इन्हें विभिन्न कंपनियों से विज्ञापन लेना पड़ता था। फिर उसी आधार पर कंपनियां इन्हें पैसा देती थी। परन्तु भास्कर घोष के माध्यम से दिलीप पडगांवकर दूरदर्शन के मनी मेकिंग प्रोसीजर के नेटवर्क में आ गये। फिर दिलीप पडगांवकर को डेढ़ वर्ष तक काश्मीर पर दूरदर्शन के लिए प्रोग्राम मिला जो लगभग डेढ़ वर्ष तक चलता रहा। उन्हें उस ऐपीसोड पर प्रति प्रोग्राम 1.5 लाख मिलता था। इस प्रोग्राम के आधार पर उन्होंने अपने को काश्मीर का एक्सपर्ट घोषित कर दिया। आज हालत यह है कि वहां पर श्रीनगर में लोग नहीं हैं। राजधानी तो जम्मू में चली आई वहां तो आजकल हुर्रियत के नेतागण ही हैं। हुर्रियत के नेतागण वार्ताकारों से मिलते नहीं हैं। वह तो घरों में बैठे रहते हैं। वार्ताकार केवल सरकारी अधिकारियों या मुख्यमंत्री और उनके अधिकारियों से मिलते हैं। मुख्यमंत्री श्रीनगर में कम दिल्ली में ज्यादा रहते हैं।
फिर एक दौर आया, जब काश्मीर में आतंकवाद चरम सीमा पर था। उस समय दिलीप पडगांवकर उस कमेटी में थे जो वहां के अलगाववादियों से वार्ता करती थी। उसकी बैठक कभी-कभी केन्द्रीय मंत्री राम जेठमलानी के घर पर भी होती थी। अन्त में दिलीप पडगांवकर ने टाइम्स ऑफ इंडिया के मालिक समीर जैन से सुलह कर ली। बताते हैं कि तब समीर जैन इनके दूरदर्शन के कार्यक्रम में हिस्सेदार बन गये थे। कुछ लोगों का कहना है कि दिलीप पडगांवकर आई.बी. की पे रोल पर कार्य करते हें। विदेश में यानि नेपाल और मॉरिशस में समाचार पत्र प्रकाशित कर रहे हैं। यह दोनों देश भारतीय आबादी के बहुमत के देश हैं। नेपाल में आजकल भारत विरोधी प्रचार है। इसलिए नेपाल में सरकार का पक्ष रखने के लिए इन्होंने यह समाचार पत्र निकाला है। सरकारी तन्त्र जनता की भावनाओं को समझने के लिए अखबारों और न्यूज चैनलों के माध्यम से जन भावनाओं की प्रतिक्रिया को रिकॉर्ड करते हैं। फिर उसी के अनुरूप आगे भी कार्यवाही होती है। एसे कार्यों के लिए सरकार की एजेंसी पैसा देती है। दिलीप पडगांवकर को भारत सरकार ने उनके कार्यों को देखते हुए उन्हें अल्पसंख्यक आयोग का सदस्य नियुक्त किया था। जिसके बदले में इन्हें भारी रकम और सभी सुविधायें प्राप्त हुयीं। भारत सरकार ने सरकारी भक्त समझकर अब कश्मीर में मुख्य वार्ताकार नियुक्त किया है।
जब सइयां भये कोतवाल को डर काहे का।
प्रेस ऐक्रीडिटेशन कमेटी की मीटिंग में एक सदस्य ने जब पी.आई.ओ. यानि नये पद (डायरेक्टर जनरल) से पूछा कि पत्रकारिता में जो मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं उनमें से कितने सरकार की जासूसी संस्थाओं के साथ जुड़े हैं। पहले तो उन्होंने उत्तर देने में आना-कानी की परन्तु बाद में बताया, आप तो जानते हैं सरकार को पत्रकारों के बीच में भी ऐसे लोगों को रखना पड़ता है।
वर्तमान समय में दिलीप पडगांवकर की जगह हिन्दुस्तान टाइम्स के एक पत्रकार को नियुक्त किया गया है।

काश्मीर का मुख्य मसला युवकों में बेरोजगारी का है। वहां पर 20 लाख लोग बेरोजगार घुम रहे हैं। उनके पास काम नहीं है। वहां पर कारखाने या सरकारी प्रोजेक्ट नहीं हैं। सड़कों का अभाव, स्कूलों की कमी है। जो पैसा केन्द्र से जाता है वह वहां पर सार्वजनिक कार्यों पर खर्च नहीं होता है। वह नेता और अफसर और बाबुओं की जेब में जाता है। विकास पर यदि पैसा खर्च होगा तो वहां पर बेरोजगारों को काम मिलेगा। रोजगार न मिलने के कारण लोग विरोध करते हैं। इसलिए प्रस्टेशन के कारण वहां के नौजवान पत्थर फेंकते हैं और दिलीप पडगांवकर सरकार से वार्ता करते हैं।

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लेखक बिजेंद्र त्यागी देश के जाने-माने फोटोजर्नलिस्ट हैं. पिछले चालीस साल से बतौर फोटोजर्नलिस्ट विभिन्न मीडिया संगठनों के लिए कार्यरत रहे. कई वर्षों तक फ्रीलांस फोटोजर्नलिस्ट के रूप में काम किया और आजकल ये अपनी कंपनी ब्लैक स्टार के बैनर तले फोटोजर्नलिस्ट के रूप में सक्रिय हैं. "The legend and the legacy: Jawaharlal Nehru to Rahul Gandhi" नामक किताब के लेखक भी हैं विजेंदर त्यागी. यूपी के सहारनपुर जिले में पैदा हुए बिजेंद्र मेरठ विवि से बीए करने के बाद फोटोजर्नलिस्ट के रूप में सक्रिय हुए. वर्ष 1980 में हुए मुरादाबाद दंगे की एक ऐसी तस्वीर उन्होंने खींची जिसके असली भारत में छपने के बाद पूरे देश में बवाल मच गया. तस्वीर में कुछ सूअर एक मृत मनुष्य के शरीर के हिस्से को खा रहे थे. असली भारत के प्रकाशक व संपादक गिरफ्तार कर लिए गए और खुद विजेंदर त्यागी को कई सप्ताह तक अंडरग्राउंड रहना पड़ा. विजेंदर त्यागी को यह गौरव हासिल है कि उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से लेकर अभी के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की तस्वीरें खींची हैं. वे एशिया वीक, इंडिया एब्राड, ट्रिब्यून, पायनियर, डेक्कन हेराल्ड, संडे ब्लिट्ज, करेंट वीकली, अमर उजाला, हिंदू जैसे अखबारों पत्र पत्रिकाओं के लिए काम कर चुके हैं.