मोहम्मद ज़फ़र
काश कुछ आँसू बहे होते उन मज़लूमों के नाम

जो जलते घरों को अपने रो रो के देखते रहे

काश कुछ आँसू बहे होते उन बच्चों के लिए

जो यतीम हो माँ बाप को तरसते रहे

कुछ आँसू बह जाते उन लोगों के लिए भी

जो इन्साफ की आस में अदालतें तकते रहे

काश कुछ आँसू बह जाते “कौसर बी” के नाम

कुछ दर्द आ जाता “बिलकिस” के लिए भी

कुछ अश्क बह निकलते हैवानियत के मंज़र पर

काश कुछ आँसू बहे होते इंसानियत के नाम

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