किला, जहाँ दुरभिसंधियाँ नहीं, रचा जाता रहा संगीत
किला, जहाँ दुरभिसंधियाँ नहीं, रचा जाता रहा संगीत
(महान संगीत इतिहास को सन्नाटे में लिये बैठा है औरंगाबाद स्थित देवगिरी उर्फ दौलताबाद का किला।)
यहीं रची थी गोपाल नायक ने राग देवगिरी बिलावल
संगीत साधक शारंगदेव ने लिखा था संगीत रत्नाकर
सारंग उपाध्याय
इतिहास के गलियारों से निकलने वाले किलों की दास्ताँ कभी जंग के मैदानों से होकर सत्ता को महफूज बनाने वाली सुरंगों तक पहुँचती रही है, तो कभी दुश्मनों से निपटने के लिये उसमें रचे जाने वाले छल, षडयंत्रों और रहस्यमयी दुरभिसंधियों की कहानियों तक, लेकिन कुछ किले ऐसे होते हैं जिनकी हिफाजत के बंदोबस्त उन्हें दुनिया में इस कदर अजेय बना देते हैं कि उनके भीतर पराजय के डर से हिंसा की जघन्य इबारत और जंग को जीतने के खतरनाक मंसूबे नहीं गढे जाते, बल्कि गढी और रची जाती हैं कला, साहित्य, नृत्य और संगीत की एक ऐसी कोमल दुनिया जिसके स्वर सभ्यताओं के काल बाह्य हो जाने पर भी समय के अनंत प्रवाह में दीर्घकाल तक गूंजायमान रहते हैं, जबकि उन स्वरों के कला साधक और उनका सृजन काल के कपाल पर अमिट हो जाता हैं।
देवगिरी उर्फ दौलताबाद, संगीत और ज्ञान का महान केन्द्र
बौद्धकालीन और मुगलकालीन इतिहास को हर समय अपनी आंखों में जिंदा रखने वाले ऐतिहासिक शहर औरंगाबाद से तकरीबन 25 किलोमीटर की दूरी पर स्थित देवगिरी का किला एक ऐसा ही किला है जो आज भी अपने भीतर हजारों सालों के संगीत, वाद्य और नृत्य परम्परा के अनूठे संगम का लंबा इतिहास संजोए हुये है। कभी हिंदू राजा कृष्ण देवराय की विरासत रहा और बाद में 13वी शताब्दी में यादव वंशियों के अधीन रहा देवगिरी का यह किला ही दुनिया का एकमात्र ऐसा किला है जिसके भीतर दुरभिसंधियां कम और कला की साधनाएं ज्यादा हुयी। यहीं पर महान साधक शारंगदेव ने उनकी अमूल्य संगीत रचना संगीत रत्नाकर लिखी, और महान पखावज वादक गोपालनायक ने राग देवगिरी बिलावल की रचना की।
इतिहास खंगालने पर पता चलता है कि देवगिरी का शासक यानी की यादव वंश विद्याओं, कलाओं, विशेष रूप से आयुर्वेद का संरक्षक होने के साथ-साथ विद्वानों का प्रेमी और उन्हें आश्रय देने वाला रहा था। इस किले का कलाकारों, ज्ञानियों और विद्वानों से प्रेम इतना प्रगाढ रहा कि न केवल इस वंश ने उन्हें किले में आश्रय दिया बल्कि संरक्षण भी दिया।
अपने कला प्रेम के लिये प्रख्यात रहे इस किले की कीर्ती का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता था कि यही वह किला रहा जहाँ भारत की पहली संगीत सभा आयोजित की गयी। इसके अलावा महान संगीत साधक और संगीत रत्नाकर के रचियता शारंगदेव ने खुद संगीत रत्नाकर की शुरूआत में ही इस किले के कला प्रेमी शासक वर्ग की प्रशंसा में न केवल बहुत कुछ लिख दिया बल्कि यह भी कहा कि उनके महान विद्वान, और शास्त्रों के ज्ञाता रहे पूर्वजों की असली पूछ परख भी इस किले में हुयी और वे कश्मीर छोडकर यहाँ आ बसे। खासकर उनके पितामह भास्कर जो यादव वंशियों के कला, संगीत, साहित्य और ज्ञान प्रियता से इतने प्रभावित हुये थे कि उन्होंने कश्मीर को अलविदा कहना ही ठीक समझा। वे यहाँ देवगिरी में वे यादव नरेश भिल्लम के राज्याश्रय में लम्बे समय तक रहे।
एक समय कला, साहित्य और ज्ञान-विज्ञान का बडा केन्द्र रहा देवगिरी किला , कला, संस्कृतिधर्मी और विद्वानों के लिये लम्बे समय तक आकर्षण का केन्द्र रहा। वैसे तो इसका अपना एक लंबा इतिहास रहा है, लेकिन जैसा कि पहले कहा यहाँ के राजा भिल्लम तो कला ज्ञान-विज्ञान के प्रेमी रहे ही बल्कि उनकी पीढियां भी उनकी कला प्रेमी परम्परा को आगे बढाती रही, यही वजह रही कि भिल्लम के बाद उनका पुत्र जैत्रपाल राजा हुआ, जिसने शारंगदेव के पिता सोढल को देवगिरी में महालेखापाल के पद पर नियुक्त किया। इसके बाद जैत्रपाल के बेटे सिंघण देव ने ईस्वी सन 1210-से 1247 तक यहाँ शासन संभाला।
कहा जाता है कि राजा सिंघणेदव यहाँ के एक ऐसे राजा हुये जो न केवल प्रतापी और वीर रहे, बल्कि अपनी पूरी पीढी के वे सबसे महान कला प्रेमी और विद्याओं के संरक्षक हुये। इसी महान कला प्रेमी ज्ञानप्रिय, और आयुर्वेद प्रियंकर सिंघणदेव के शासन में महालेखापाल पर रहते हुये संगीत के महान संगीतकार और संगीत तपस्वी शारंगदेव ने भारतीय संगीत के प्राणों यानी कि संगीत रत्नाकर की रचना की।
कहानी महान संगीत साधक शारंगदेव की
देवगिरी का किला जिसे आज दौलताबाद के किले के नाम से जाना जाता है, लडाइयों और सत्ता के मद में चूर शासकों का गढ न होकर एक ऐसी कला नगरी के रूप में विकसित हुआ था जिसके चर्चे भारत के दूर-सुदूर के इलाकों में होते रहे। इसकी मुख्य वजह शारंगदेव जैसे संगीत रत्न तो थे ही इसके अलावा रही सही कसर उनके द्वारा रचित संगीत रत्नाकर ने पूरी कर दी, जिसे पढकर उस दौरान उनकी कीर्ति न केवल चरम पर थी बल्कि इसे आज भी पढकर संगीत का हर महाविद्वान उनका यशोगान करता नहीं थकता। वैसे संगीत के इतने बडे महान साधक की अपनी दुनिया भी बडी रोचक ही रही। संगीत रत्नाकर की मानें तो वे जिस वंश परम्परा के थे वह न केवल विचारशील और विद्वान पंरपरा थी बल्कि उनकी प्रतिभा कई आयामों में विराट थी। निश्चित ही उनका खुद का व्यक्तित्व भी इतना बहुआयामी और बहुप्रतिभाशाली था कि वे न केवल कई शास्त्रों के ज्ञाता थे बल्कि आयुर्वेद के तो महानतम जानकार थे। यही वजह रही कि उन्होंने संगीत रत्नाकर के दूसरे अध्याय पिण्डोत्पत्ति में ही आयुर्वेद के अनुसार जीव के गर्भ में आने से लेकर उसके जन्म लेने की प्रक्रिया तक के बारे में विस्तार से वर्णन किया।
गोपाल नायक की पखावज से गूंजता है देवगिरी
ऐसा नहीं है कि देवगिरी का संगीत और नृत्य कला का इतिहास महज शारंगदेव और संगीत रत्नाकर तक आकर ही सिमट जाता है, बल्कि वह तो महान पखावज वादक गोपालनायक तक भी पहुँचता है जिनके बारे में कहा जाता था कि उनकी पखावज सुनकर हाथियों के झुण्ड के झुण्ड मस्ती में झूमकर खुदको उनके आगे नतमस्तक कर देते थे।
पण्डित गोपाल नायक ने ही यहाँ राग देवगिरी बिलावल की रचना की थी जो आज के समय में संगीत का एक अतिमहत्वपूर्ण राग है।
क्या है संगीत रत्नाकर?
देवगिरी के संगीत इतिहास का आज क भी नहीं जानने वाले समय में शारंगदेव द्वारा रचे गये संगीत रत्नाकर को भारतीय संगीत का प्राण कहा जाता है। भारतीय संगीत का ये एक ऐसा अनुपम ग्रन्थ है जिसमें शारंगदेव ने संगीत सिद्धान्तों का अद्वितीय, व्यवस्थित, सूक्ष्म, स्पष्ट और ऐसा प्रामाणिक वर्णन किया है कि जिसकी आज कल्पना भी असम्भव है।
इस ग्रन्थ में शारंगदेव के संगीत ज्ञान के महासागर की गहराइयों का इसी बात से अँदाजा लगाया जा सकता है कि संगीत के अत्यन्त विशाल, और व्यापक क्षेत्र को बताने के लिये शारंगदेव ने अपने समय के लक्ष्य को ध्यान में रखकर पूर्व संगीत परम्परा के लगभग 40 पूर्वाचार्यों के मतों का सार निकाला है। शारंगदेव ने संगीत के इस व्यापक ज्ञान को जैसी संक्षिप्तता, सूक्ष्मता और स्पष्टता के साथ समेटा है वह आश्चर्य में डालने वाला है।
संगीत रत्नाकर में कुल सात अध्याय हैं और ये चार खण्डों में प्रकाशित है। जानकर आश्चर्य होगा कि ये संगीत के संस्कृत में लिखे गये अब तक के सबसे लम्बे ग्रन्थों में से एक है, जिस पर सबसे ज्यादा टीकाएं लिखी गयीं और जिसके सबसे ज्यादा संस्करण प्रकाशित हुये और जो सबसे ज्यादा भाषाओं में अनुवादित हुआ।
बौद्धों, मुगलों की निशानियों के साथ जीने वाले औरंगाबाद स्थित देवगिरी के इस किले में संगीत के एक ऐसे महान साधक ने अपनी तपस्या को फलीभूत किया है जिसके बिना आज भी भारतीय संगीत के प्राचीन सिद्धान्तों को समझना कठिन तो छोड दीजिए असम्भव माना जाता है।
गुमनाम है संगीत का महान मन्दिर
कहते हैं काल के विराट और विकराल मुँह में संस्कृति और सभ्यताएं तो क्या खुद काल भी एक बिन्दु पर आकर बाह्य हो जाता है। शायद ये काल का विकराल रूप ही रहा कि इस समय हजारों साल पुरानी बौद्ध गुफाओं की शिल्पकारी, अजंता की चित्रकला और औरंगजेब की सल्तनत की विरासत की निशानियों के ठिकाने के रूप में मशहूर मराठवाड़ा की राजधानी औरंगाबाद में दुनिया भर से पर्यटक ये सब कुछ देखने आते हैं, लेकिन हँसी तब छूटती है पर्यटक यहाँ स्थित देवगिरी के किले को औरंगजेब के दौलताबाद के किले के रूप में देखने जाते हैं और बाहर आकर पूछते हैं देवगिरी का किला कहाँ है?
खैर, वे तो भारत से बाहर जाने पर भी ये नहीं जान पाते कि जिसे दौलताबाद के किले को वे घूम आये हैं वह किला पहले कभी देवगिरी के नाम से जाना जाता था और यहीं पर ही भारतीय संगीत की लम्बे समय तक साधना- चली और यहाँ एक ओर शारंगदेव जैसे महान संगीत साधक और गोपालनायक जैसे महान पखावज वादक हुये, जिन्होंने संगीत की महत्वूपर्ण राग देवगिरी बिलावल का सृजन किया।
सोया है पुरातत्व विभाग, सरकारें बदलती रहीं
इसे त्रासदी कहा जाये या फिर कुछ और कि बरसों से पर्यटन स्थल केन्द्र के रूप में विकसित हो चुके और भारतीय पुरातत्व विभाग के अधिकार में आने वाले औरंगाबाद जिले के आसपास के तमाम पर्यटन स्थल रख-रखाव के तौर पर तो समय के साथ बदलते रहे, खुद पुरातत्व विभाग ने भी दौलताबाद उर्फ देवगिरी के किले में दुनिया भर के काम करवाए, लेकिन आज तक उसके भीतर छिपे कला, संगीत, ज्ञान-विज्ञान, यहाँ के विद्वानों और उनकी ज्ञान साधनाओं के इतिहास के बारे में जानने की कोशिश भी नहीं की। सच पूछा जाये तो पुरातत्व विभाग के आला अधिकारी ही ये नही जानते हैं कि यहाँ संगीत की साधनाएं होती रहीं और ये वही देवगिरी का महान किला है जिसके भीतर शारंगदेव ने भारतीय संगीत के प्राणों को रचा और इसी देवगिरी के नाम पर गोपालनायक जैसे संगीत तपस्वी ने राग देवगिरी बिलावल की रचना की।
तिरस्कृत और उपेक्षित, सन्नाटे में खडा देवगिरी
ये दुर्भाग्य ही है कि एक ओर जहाँ दुनिया की संगीत बिरादरी में अपना अग्रणी स्थान रखने वाला और संगीत गुरू कहलाने वाला भारतीय संगीत महानता के शिखर पर तो जा बैठा है, वहीं इस महान संगीत की तपस्या कर संगीत रत्नाकर लिखकर इसे जनसुलभ बनाने वाले शारंगदेव का तो देवगिरी के दरवाजे पर लगे इतिहास अभिलेखागार में नाम तक नहीं है। पुरातत्व विभाग को तो छोड़िये सरकार ने आज तक इतनी बडी संगीत विरासत को सहजने के नाम पर एक फूटी कौड़ी नहीं दी। यहाँ तक कि एक संगीत एकादमी भी यहाँ नहीं है कि संगीत के इतिहास के महान केन्द्र को कुछ आगे बढ़ाया जाये।
हाल ही में यहाँ स्थित एक निजी संगीत संस्था की ओर से पहली बार आयोजित शारंगदेव समारोह में सरकार ने उसमें कोई सहयोग तो छोड़िये कोई नुमाइन्दा भी पूछ परख के लिये नहीं भेजा।
कभी 12वीं 13वी और 14वीं सदी में देश में संगीत का सबसे महत्वपूर्ण केन्द्र रहा देवगिरी इस समय सन्नाटे में खड़ा अपने अहातों में बजने वाली पखावज के सुरों की तान की रौनक को फिर से सुनने के लिये आस लगाये बैठा है। देवगिरी जो देश की पहली संगीत सभा का साक्षी रहा, जहाँ के संगीत स्वर और नृत्य की मुद्राएं निकलकर ऐलोरा की गुफाओं में शिल्पकारों की मूर्तियों की मुद्राएं बन गयीं , देवगिरी जहाँ ताण्डव की नृत्य मुद्रायें निकलकर अजंता की सबसे प्रसिद्ध चित्रकला पद्मपाणि में प्रवेश कर गयी,
देवगिरी जहाँ संगीत को एक उपचार के तौर पर देखने की महान दृष्टि विकसित हुयी, देवगिरी जो आयुर्वेद से लेकर ज्ञान, विज्ञान से लेकर कई तरह की संस्कृति परम्परा और कलाओं के संगम का केन्द्र रहा, इस समय यह आस लगाये बैठा है कि कहीं से तो आकर उसकी संगीत की रौनक कोई फिर से लौटा दे, चाहे फिर वह झूठ का राग अलापने वाली सरकारें हो या फिर शारंगदेव से संगीत की परिभाषा गीतं वाद्यं तथा नृत्तं त्रयं संगीतमुच्यते सीखने वाले देश के महान नाम गिरामी संगीत साधक।


